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केजरीवाल vs जस्टिस स्वर्ण कांता: वो 3 ‘विवादित’ मुद्दे क्या थे, जिन पर कोर्ट में छिड़ी तीखी जंग? जानें पूरी कहानी

Arvind Kejriwal: केजरीवाल ने स्वयं जिरह करते हुए तीन मुख्य आधारों पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता पर संदेह जताया था। हालांकि, अदालत ने उनकी सभी दलीलों को खारिज करते हुए हर आरोप का विस्तार से और तार्किक जवाब दिया।

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Arvind Kejriwal:दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को सोमवार शाम उस समय बड़ी कानूनी हार का सामना करना पड़ा, जब हाई कोर्ट ने उनकी उस याचिका को नामंजूर कर दिया जिसके लिए उन्होंने खुद वकील की भूमिका निभाई थी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट तौर पर कहा कि वह कथित शराब घोटाले से संबंधित इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करेंगी।

केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए यह याचिका लगाई थी। जिरह के दौरान पूर्व सीएम ने जस्टिस शर्मा के खिलाफ 10 अलग-अलग तर्क दिए और 3 मुख्य आरोपों के जरिए यह साबित करने की कोशिश की कि इस अदालत से उन्हें न्याय की उम्मीद नहीं है। हालांकि, अदालत ने एक-एक कर सभी बिंदुओं पर स्थिति साफ की और आरएसएस के कार्यक्रम, गृह मंत्री अमित शाह के बयान व बच्चों के सरकारी पैनल में होने जैसे आरोपों का विस्तार से जवाब दिया।

आरएसएस से जुड़े संगठन के कार्यक्रम पर स्पष्टीकरण

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें केजरीवाल ने उनके 'अधिवक्ता परिषद' आरएसएस समर्थित संगठन के कार्यक्रमों में शामिल होने पर संदेह जताया था। सोमवार को फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि वक्ताओं को वहां केवल कानूनी विषयों पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया था और देश के न्यायाधीश पहले भी ऐसे आयोजनों का हिस्सा बनते रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि किसी कानूनी सेमिनार में लेक्चर देना राजनीतिक पक्षपात का पैमाना नहीं हो सकता। जज ने यह भी जोड़ा कि याचिकाकर्ता ने केवल चुनिंदा कार्यक्रमों का जिक्र किया, जबकि वह एनएलयू, कॉलेजों, अस्पतालों और विभिन्न बार फोरम के कार्यक्रमों में भी समान रूप से शामिल होती रही हैं।

जजों और वकीलों के संबंधों पर टिप्पणी

जस्टिस शर्मा ने आगे स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को उनकी पद की गरिमा के अनुरूप आमंत्रित किया जाता है, जहां किसी भी राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं होता। उन्होंने कहा कि 'बार और बेंच' के बीच का रिश्ता सिर्फ अदालती कार्यवाही तक सीमित नहीं है और बार एसोसिएशन के कार्यक्रमों का आयोजन एक सामान्य प्रक्रिया है। जज ने यह भी रेखांकित किया कि कई वकील सक्रिय रूप से राजनीतिक दलों से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन जब वे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होते हैं, तो मामले की सुनवाई केवल कानून की मेरिट गुण-दोष के आधार पर होती है, किसी विचारधारा के चश्मे से नहीं।

अमित शाह के बयान पर अदालत का रुख

अरविंद केजरीवाल ने अपनी दलीलों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक टीवी इंटरव्यू का भी जिक्र किया था, जिसमें शाह ने कहा था कि केजरीवाल को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी और उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा। इस पर जवाब देते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि कोई भी राजनेता या मंत्री अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि राजनेताओं के सार्वजनिक बयानों पर अदालत का कोई नियंत्रण नहीं होता और यह एक सामान्य समझ की बात है कि राजनीतिक प्रतिद्वंदी एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह की बयानबाजी करते रहते हैं। अदालत ऐसे बयानों से प्रभावित हुए बिना केवल कानूनी तथ्यों पर काम करती है।