
30 साल पुराने एक भ्रष्टाचार मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Delhi ASI Corruption Case: दिल्ली हाईकोर्ट में एक 30 साल पुराने भ्रष्टाचार के केस पर सुनवाई हुई। इस केस में दिल्ली के ASI बलदेव सिंह पर रिश्वत के आरोप लगे हैं। इस केस की सुनवाई न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। उन्होंने इस मामले की सुनवाई के दौरान निचली अदालत को तय नियमों का पालन न करने पर फटकार लगाई। इस दौरान बलदेव सिंह की ओर से कोर्ट में कुछ दलीलें भी पेश की गईं, जिन पर हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। बता दें कि बलदेव सिंह को अगस्त 2001 में एक विशेष न्यायाधीश ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और धारा 13(1)(डी) के साथ धारा 13(2) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
यह मामला साल 1995 का है, जब दिल्ली के शाकुर बस्ती पुलिस पोस्ट में तैनात सहायक उप-निरीक्षक (ASI) बलदेव सिंह पर रिश्वत मांगने का आरोप लगा। शिकायतकर्ता ने बताया कि उसके भाई ने शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसके कारण पुलिस उसे बार-बार परेशान कर रही थी। इसी परेशानी से बचाने और कार्रवाई रोकने के बदले ASI ने पहले दस हजार रुपये मांगे, लेकिन बाद में घटाकर 5 हजार कर दिए थे।
इस मामले में शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने एक प्लानिंग के तहत आरोपी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा। आरोपी के हाथों और उसकी जैकेट की जेब पर फिनॉल्फ्थलीन टेस्ट किया गया, जो पॉजिटिव आया। इसका मतलब था कि आरोपी ने रिश्वत की रकम को छुआ और स्वीकार किया था। कोर्ट ने इस सबूत को रिश्वत लेने का एक मजबूत सबूत माना।
हाईकोर्ट में आरोपी ASI बलदेव सिंह ने कोर्ट में दलील पेश की कि पुलिस और CBI को जिन गवाहों ने बयान दिए हैं, उनकी बातों में विरोधाभास है। खासकर पंच गवाहों की गवाही एक जैसी नहीं थी और कुछ गवाह बीच में अपनी बात से पलट भी गए। इसके अलावा आरोपी ने यह भी कहा कि रिश्वत के पैसों से जुड़े सैंपल्स को फॉरेंसिक लैब भेजने में काफी समय लग गया, जिससे यह शक पैदा होता है कि जांच सही तरीके से नहीं हुई।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि अगर गवाह पूरी तरह से अभियोजन के खिलाफ नहीं गए हैं, तो उनकी गवाही का वह हिस्सा माना जा सकता है जो केस का समर्थन करता है। छोटे विरोधाभासों से पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इन सब दावों से यह सच नहीं बदल जाता कि आरोपी ने रिश्वत मांगी थी और पैसे लेते हुए पकड़ा गया था।
हाईकोर्ट के अनुसार, इस मामले में निचली अदालत ने गवाहों से जुड़ा काम तय प्रक्रिया के अनुसार नहीं किया। जब गवाह पीड़ित पक्ष में नहीं गए तो उन्हें सीधे होस्टाइल मान लिया। इसके अलावा अदालत ने पीड़ित पक्ष को अपने ही गवाहों से जिरह करने दी, जैसे आमतौर पर विरोधी पक्ष के गवाह से की जाती है, जबकि कानून में ऐसा करने की साफ इजाजत नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि कानून यह नहीं कहता कि सीधे किसी गवाह को होस्टाइल घोषित कर दिया जाए। कोर्ट ने समझाया कि अपने ही गवाह से जिरह सिर्फ अदालत की अनुमति के साथ किया जा सकता है। इसके अलावा, अगर गवाह की बातों में फर्क दिखाना है, तो पहले गवाह को अपनी बात साफ करने का मौका देना जरूरी होता है और फिर जांच अधिकारी से उसी फर्क पर सवाल किए जाते हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज होने के बाद फैसला आने में लगभग 30 साल लग जाने वाले तर्क पर कहा कि केस में देरी हो जाने से केस पर शक नहीं किया जा सकता है। अगर सबूत मजबूत हैं तो सालों बाद भी सजा दी जा सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला सही माना और आरोपी की सजा को बरकरार रखा। इसमें ढाई साल की सख्त जेल की सजा भी शामिल है।
Published on:
29 Jan 2026 05:09 pm

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