
Arvind Kejriwal Delhi High Court: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कानूनी उलझनें और बढ़ती नजर आ रही हैं। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच से रिक्यूजल अर्जी खारिज होने के बाद, अब अदालत में जिरह के दौरान बने वीडियो ने विवाद खड़ा कर दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को आम आदमी पार्टी के संयोजक, पार्टी के अन्य नेताओं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार के विरुद्ध दाखिल एक जनहित याचिका पर कड़ा संज्ञान लिया। कोर्ट ने सख्त निर्देश देते हुए सोशल मीडिया से संबंधित सभी वीडियो हटाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने जांच के दायरे को बढ़ाते हुए यह भी सवाल किया है कि आखिर इस वीडियो को सबसे पहले इंटरनेट पर किसने डाला था?
हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि इस तरह की रिकॉर्डिंग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए तय किए गए नियमों का उल्लंघन है, जिसे सोशल मीडिया पर साझा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। वकील वैभव सिंह की याचिका पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने अरविंद केजरीवाल, आप नेताओं, दिग्विजय सिंह और रवीश कुमार को औपचारिक नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है। इस पूरे प्रकरण पर अब अगली सुनवाई 6 जुलाई को मुकर्रर की गई है। पहले इस केस को जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस कारिया की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन जस्टिस कारिया ने खुद को अलग कर लिया तो दूसरी बेंच के सामने भेजा गया
फेसबुक-इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा और यूट्यूब की पैरेंट कंपनी गूगल के वकीलों ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। जब अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या उस व्यक्ति का पता लगाया जा सकता है जिसने सबसे पहले वीडियो डाला था, तो मेटा ने स्पष्ट किया कि उनके पास ऐसा कोई सीधा तरीका मैकेनिज्म नहीं है जिससे शुरुआती अपलोडर की तुरंत पहचान हो सके। हालांकि, मेटा ने बताया कि उनके पास यूआरएल और आईपी लॉग की जानकारी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी यूजर का ईमेल या मोबाइल नंबर मिलता है, तो वे उसके सिस्टम और आईपी एड्रेस से जुड़ी सूचनाएं अदालत को दे सकते हैं, क्योंकि अकाउंट बनाते समय ये विवरण जरूरी होते हैं।
गूगल ने अदालत को सूचित किया कि रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जो 13 लिंक URL उपलब्ध कराए गए थे, उन्हें प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया है। वहीं, मेटा ने साफ किया कि जब भी किसी अवैध सामग्री की शिकायत मिलती है, तो संबंधित एजेंसियां उनसे संपर्क करती हैं और वे उस पर कार्रवाई करते हैं। अदालत ने इस पर सवाल किया कि क्या भविष्य में दिए गए निर्देशों के आधार पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद ऐसे सभी लिंक को हटाया जा सकता है?
अदालत ने यह सवाल उठाया कि इन कंपनियों को हर बार निर्देश देने की जरूरत क्यों पड़ती है, वे खुद से ऐसी सामग्री क्यों नहीं हटाते? कोर्ट ने कहा कि वे संस्था की गरिमा और बड़े हितों को ध्यान में रखकर यह बात कह रहे हैं। जवाब में गूगल ने कहा कि जैसे ही मंत्रालय से यूआरएल मिलते हैं, उन्हें तुरंत हटा दिया जाता है। दूसरी तरफ, मेटा ने तर्क दिया कि वे खुद से किसी कंटेंट की समीक्षा करके उसे तुरंत डिलीट नहीं कर सकते। अंत में, हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इन कंपनियों को अगली सुनवाई में पूरी जानकारी के साथ आने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि सबसे पहले वीडियो किसने अपलोड किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उल्लंघन करने वाली किसी भी सामग्री को फैलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
Updated on:
23 Apr 2026 02:54 pm
Published on:
23 Apr 2026 02:01 pm
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