
Delhi High Court:दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। दरअसल, कोर्ट ने बलात्कार और जातिगत गाली देने के साथ मारपीट करने की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए स्पष्ट तौर पर कहा कि सहमति से बने संबंध को बलात्कार नहीं कहा जा सकता है। जज ने कहा कि व्हाट्सएप चैट देखकर नहीं लगता है कि संबंध बनाने के लिए किसी भी तरह से दबाव, ब्लैकमेल या मजबूर किया गया है। युवक और युवती दोनों ही वयस्क हैं और मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी प्रकार के चोट का जिक्र नहीं है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि निजी रिश्तों में आई असफलता या मनमुटाव के समाधान के लिए आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की एकल पीठ ने कहा कि मामले से जुड़े रिकॉर्ड और साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से एक प्रेम संबंध रहा था। ऐसे हालात में मुकदमे को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब किसी रिश्ते के टूटने के बाद बलात्कार जैसे गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उनकी जांच में विशेष सतर्कता बरतना जरूरी है, खासकर तब जब दोनों पक्ष वयस्क हों और उपलब्ध सबूत स्वेच्छा से बनाए गए शारीरिक संबंध की ओर इशारा करते हों।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपी पिछले चार सालों से एक-दूसरे से मिल-जुल रहे हैं। दोनों की मुलाकातें होती थीं और व्हाट्सऐप पर भी सामान्य बातचीत होती थी। चैट में की गई दोनों की बातचीत को देखा जाए तो किसी भी एंगल से नहीं लगता है कि आरोपी के द्वारा शिकायतकर्ता पर किसी भी प्रकार का दबाव बनाया जा रहा है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि एससी/एसटी कानून तभी लागू होता है जब अपराध जाति के कारण किया गया हो, लेकिन इस मामले में अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जो साबित करता हो कि पीड़िता के साथ जाति के आधार पर मारपीट या यौन उत्पीड़न किया गया हो।
कोर्ट ने माना कि यह मामला CrPC की धारा 482 के तहत स्वाभाविक शक्तियों के इस्तेमाल योग्य है और इसी आधार पर दर्ज एफआईआर तथा उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। अदालत ने एफआईआर दर्ज कराने में हुई पांच महीने की देरी का भी उल्लेख करते हुए कहा कि हालांकि यौन अपराध मामलों में देरी हमेशा घातक नहीं होती, लेकिन घटना के बाद भी शिकायतकर्ता का आरोपी से लगातार संपर्क में रहना इस देरी को अहम बना देता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल सबूतों में जबरन यौन हमले की पुष्टि नहीं होती और कानूनी नोटिस के बावजूद शिकायतकर्ता द्वारा मोबाइल फोन पेश न करना आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
Updated on:
22 Jan 2026 05:38 pm
Published on:
22 Jan 2026 05:37 pm
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