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25 दिन में बीमाधारक की मौत, फिर भी पत्नी को दें 14.22 लाख रुपये- हाई कोर्ट का इंश्योरेंस कंपनी को आदेश

बीमाधारक की मौत पॉलिसी लेने के सिर्फ 25 दिन बाद हो गई थी। बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए कहा था कि व्यक्ति ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जानकारी छिपाई थी।
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नई दिल्ली

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Dinesh Dubey

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Updated: 22 May 2026, 10:06 AM IST

life insurance claim judgment

बीमा कंपनी ने लगाया था कैंसर छिपाने का आरोप (AI Image)

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बीमा कंपनी को बड़ा झटका देते हुए मृतक की पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें स्थायी लोक अदालत ने महिला को 14.22 लाख रुपये का बीमा क्लेम देने का निर्देश दिया था। दरअसल, इंश्योरेंस कंपनी ने महिला का क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक बीमाधारक ने पॉलिसी लेते समय अपनी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जानकारी छिपाई थी। बीमा लेने के महज 25 दिन बाद ही उसकी मौत हो गई। लेकिन अदालत ने कहा कि कंपनी अपने आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रही है।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के मुताबिक, महिला के पति समुद्र सिंह ने 23 मार्च 2018 को भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी (Bharti AXA Life Insurance) से जीवन बीमा पॉलिसी खरीदी थी। पॉलिसी की बीमित राशि 7.11 लाख रुपये थी, जबकि डेथ बेनिफिट 14.22 लाख रुपये तय किया गया था।

समुद्र सिंह ने पहली प्रीमियम किस्त के तौर पर 63,172 रुपये जमा किए थे। इसके बाद 25 अप्रैल 2018 को उनकी अचानक हार्ट अटैक से मौत हो गई। यानी पॉलिसी जारी होने के महज 25 दिन बाद ही उनका निधन हो गया।

बीमा कंपनी ने ठुकराया क्लेम, पत्नी पहुंची लोक अदालत

बीमा कंपनी ने 31 मार्च 2019 को महिला का क्लेम खारिज कर दिया। कंपनी का आरोप था कि समुद्र सिंह पहले से स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (Squamous Cell Carcinoma) नामक कैंसर से पीड़ित थे और फरवरी 2017 से उसका इलाज करा रहे थे। कंपनी का कहना था कि बीमा लेते समय उन्होंने अपनी बीमारी की जानकारी छिपाई, इसलिए क्लेम मान्य नहीं है।

बीमा कंपनी के इस फैसले से परेशान होकर मृतक की पत्नी ने स्थायी लोक अदालत का दरवाजा खटखटाया। लंबी सुनवाई के बाद 2 अप्रैल 2025 को लोक अदालत ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को क्लेम राशि देने का आदेश दिया।

इसके बाद बीमा कंपनी ने इस फैसले को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने साफ कहा कि बीमा कंपनी अपने आरोपों को विश्वसनीय सबूतों के जरिए साबित नहीं कर सकी। अदालत ने पाया कि कंपनी जिन मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर बीमारी का दावा कर रही थी, उनमें कई खामियां थीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी की ओर से पेश किये गए मेडिकल रिपोर्ट की फोटोकॉपी पर किसी डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे, न ही अस्पताल की ओर से उसे प्रमाणित किया गया था। इतना ही नहीं, दस्तावेजों में दर्ज सीआर नंबरों में भी विसंगतियां पाई गईं।

अदालत ने यह भी कहा कि कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि कथित कैंसर बीमारी और व्यक्ति की मौत के बीच कोई संबंध था। रिकॉर्ड के अनुसार समुद्र सिंह की मौत हार्ट अटैक से हुई थी।

कंपनी की याचिका की खारिज

हाईकोर्ट ने माना कि स्थायी लोक अदालत के आदेश में कोई कानूनी या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने बीमा कंपनी की याचिका खारिज कर दी और महिला को राहत देने वाला आदेश बरकरार रखा।

यह फैसला उन बीमा उपभोक्ताओं के लिए अहम माना जा रहा है, जो क्लेम खारिज होने के बाद न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हैं।