
वांगचुक के अनशन के बीच याद आए पोट्टी श्रीरामुलु
Sonam Wangchuk Protest: सोनम वांगचुक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 दिनों से लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। हर दिन उनकी सेहत बेहद खराब होती जा रही है, वांगचुक के इस कड़े रुख के बीच देश के इतिहास के दो ऐसे बड़े व्यक्तित्वों की यादें ताजा हो गई हैं, जिन्होंने जनहित और अपनी मांगों के लिए अनशन करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। इनमें से एक थे पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल और दूसरे थे स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु।
पोट्टी श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषियों के लिए एक अलग राज्य (आंध्र प्रदेश) की मांग को लेकर 58 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं चखा था। सरकार की बेरुखी और उनके निधन के बाद भड़के जन-आक्रोश के आगे आखिरकार तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू सरकार को झुकना पड़ा था।
पोट्टी श्रीरामुलु भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सेनानी थे, जिन्होंने निजी जीवन के गहरे दुख को देश सेवा में बदल दिया। उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान सैनिटरी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी और रेलवे में नौकरी भी की, लेकिन 1928 में पत्नी और बच्चे के निधन के बाद उन्होंने नौकरी और पारिवारिक जीवन त्यागकर स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता अपना लिया। इसके बाद वे महात्मा गांधी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह से जुड़े और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1946 में उन्होंने दलितों को मंदिर प्रवेश का अधिकार दिलाने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया, जिसे महात्मा गांधी के आग्रह पर समाप्त किया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक इंडिया आफ्टर गांधी में उल्लेख किया है कि गांधी, श्रीरामुलु को बेहद दृढ़ निश्चयी और संघर्षशील कार्यकर्ता मानते थे, जो अपने उद्देश्य के लिए अंत तक डटे रहते थे। जब नेहरू सरकार ने अनशन को 'नजरअंदाज' करने का दिया आदेश
लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, आजादी के बाद संयुक्त मद्रास राज्य से तेलुगु भाषी क्षेत्रों को अलग कर स्वतंत्र आंध्र राज्य बनाने की मांग तेजी से उठने लगी थी। 1952 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा और पार्टी 145 में से केवल 43 सीटें ही जीत सकी। इसके बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और मद्रास के मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी अलग आंध्र राज्य के गठन के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि राज्य के विभाजन से मद्रास (वर्तमान चेन्नई) पर नियंत्रण खोने की स्थिति पैदा हो सकती है।
राजनीतिक गतिरोध के बीच पोट्टी श्रीरामुलु ने अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके समर्थन में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। अनशन के छह सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद सरकार की ओर से कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं पहुंचा। उस दौरान मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नेहरू को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया, लेकिन जवाब में नेहरू ने स्पष्ट संदेश दिया कि सरकार को इस अनशन के दबाव में नहीं आना चाहिए और इसे अनदेखा किया जाए।
अनशन के 52वें दिन तक पीएम नेहरू का मानना था कि अनशन के दबाव में आकर फैसले लेने से लोकतांत्रिक सरकारें कमजोर होंगी। हालांकि, 12 दिसंबर को नेहरू ने राजगोपालाचारी को पत्र लिखकर माना कि अब मांगें मान लेनी चाहिए, वरना जनता को संभालना मुश्किल होगा। लेकिन सरकार की तरफ से कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ और श्रीरामुलु ने भी अनशन जारी रखा।
58वें दिन तक आते-आते श्रीरामुलु की हालत अत्यंत भयावह हो गई। वह बोलने की शक्ति खो चुके थे, आंखें बंद थीं, त्वचा पीली पड़ चुकी थी और वह पानी भी नहीं पी पा रहे थे। इसके बाद उन्हें खून की उल्टियां होने लगीं। डॉक्टरों ने उनसे कुछ खाकर जान बचाने की भीख मांगी, लेकिन श्रीरामुलु ने अपने होठों पर उंगली रख ली, मानो वह कह रहे हों कि- 'अब रहने दो, प्राण त्यागने में ही सुकून है।' अंततः 15 दिसंबर 1952 को 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
पोट्टी श्रीरामुलु के निधन की खबर फैलते ही पूरे इलाके में कोहराम मच गया। उनके शव को सड़क किनारे रखा गया, जहां रोती-बिलखती जनता का हुजूम उमड़ पड़ा। स्कूली बच्चे काले झंडे लेकर सड़कों पर उतर आए। इसके बाद तेलुगु भाषी क्षेत्रों में भीषण हिंसा भड़क उठी। गुस्साई भीड़ ने ट्रेनों को रोककर उनमें तोड़फोड़ की, रेलवे संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया और टेलीग्राफ के तार काट दिए। भड़की हिंसा को काबू करने के लिए की गई पुलिस फायरिंग में कई प्रदर्शनकारियों की जान चली गई।
पोट्टी श्रीरामुलु के निधन के बाद आंध्र क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन और हिंसा तेज हो गई, जिससे हालात लगातार बिगड़ने लगे। बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार पर अलग राज्य की मांग पर फैसला लेने का दबाव बढ़ गया। आखिरकार, श्रीरामुलु के निधन के चार दिन बाद, 19 दिसंबर 1952 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अलग आंध्र राज्य के गठन की घोषणा कर दी। इसके बाद 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य आधिकारिक रूप से अस्तित्व में आया और कुरनूल को इसकी पहली राजधानी बनाया गया। बाद में 1956 में राज्य पुनर्गठन के दौरान हैदराबाद राज्य के तेलंगाना क्षेत्र को आंध्र के साथ मिलाकर आंध्र प्रदेश का गठन किया गया। हालांकि, लंबे आंदोलन के बाद 2014 में तेलंगाना को फिर से अलग राज्य का दर्जा दे दिया गया।
Updated on:
17 Jul 2026 07:46 pm
Published on:
17 Jul 2026 07:46 pm
