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आवारा कुत्तों पर फैसला सुनकर रो पड़ी सुप्रीम कोर्ट की महिला वकील, बोली-ऐसे अन्याय नहीं होना चाहिए

Supreme Court: याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट की वकील ननिता शर्मा ने कहा कि मैं ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती हूं। ऐसे बेज़ुबान जानवरों के साथ ऐसा अन्याय नहीं होना चाहिए। एबीसी (पशु जन्म नियंत्रण) नियमों के तहत पुनर्वास वर्जित है।

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Supreme Court woman lawyer breaks down after Delhi-NCR stray dogs verdict in supreme court

दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों पर सुप्रीम फैसला सुनते ही रोने लगी महिला वकील और याचिकाकर्ता।

Supreme Court: दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश शुक्रवार को सामने आया, जिसने डॉग लवर्स और एनिमल एक्टिविस्ट्स को गहरा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट की वकील और याचिकाकर्ता ननिता शर्मा ने इस आदेश के बाद भावुक होकर कहा कि आज का फैसला 11 अगस्त के आदेश जैसा ही है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सरकारी संस्थानों, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से आवारा कुत्तों को हटाकर दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाएगा। इस काम की निगरानी के लिए एक नोडल ऑफिसर की नियुक्ति भी की जाएगी, जो सुनिश्चित करेगा कि हटाए गए कुत्ते वापस उन जगहों पर न लौटें।

महिला वकील ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की वकील और याचिकाकर्ता ननिता शर्मा ने एएनआई से कहा "आज का आदेश 11 अगस्त के पिछले आदेश जैसा ही है। सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक संस्थानों, रेलवे स्टेशनों और बस स्टॉप से ​​कुत्तों को हटाकर उनका पुनर्वास किया जाएगा। एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि वे इन संस्थानों में वापस न आएं। मुझे अभी भी उम्मीद है और मैं ईश्वरीय न्याय में विश्वास करती हूं। ऐसे बेज़ुबान जानवरों के साथ ऐसा अन्याय नहीं होना चाहिए। एबीसी (पशु जन्म नियंत्रण) नियमों के तहत पुनर्वास वर्जित है, लेकिन इसे काटने के आधार पर उचित ठहराया गया है। आज जो हुआ वह दुर्भाग्यपूर्ण है। आश्रय गृहों का भी अच्छी तरह से रखरखाव किया जाना चाहिए। हम आदेश का सम्मान कर रहे हैं, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट का है।"

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर क्या आदेश दिया?

दरअसल, शुक्रवार को दिल्ली-एनसीआर में घूम रहे आवारा कुत्तों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की विशेष पीठ ने सुनवाई की। इस दौरान अदालत ने आदेश दिया कि स्कूल, कॉलेज, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाकर तय शेल्टर हाउसों में भेजा जाए। कोर्ट ने कहा कि इन इलाकों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में बढ़ोतरी से आम जनता, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों, में भय का माहौल बना हुआ है।

हाईवे-एक्सप्रेसवे से भी हटाए जाएंगे मवेशी

बेंच ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि हाईवे और एक्सप्रेसवे से मवेशियों और अन्य आवारा पशुओं को हटाया जाए और उन्हें निर्धारित आश्रय स्थलों में सुरक्षित रखा जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी आवारा कुत्ता या जानवर इन संस्थागत परिसरों या राजमार्गों पर दोबारा न पहुंचे। कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) समेत अन्य एजेंसियां एक संयुक्त अभियान चलाकर उन जगहों की पहचान करें, जहां आवारा जानवर बार-बार दिखाई देते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2026 को होगी। तब तक कोर्ट के अंतरिम दिशानिर्देश लागू रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 3 नवंबर को कहा था कि वह उन संस्थागत क्षेत्रों में कुत्तों के काटने की गंभीर समस्या से निपटने के लिए अंतरिम दिशानिर्देश जारी करेगा, जहां कर्मचारी या स्थानीय लोग आवारा कुत्तों को खाना खिलाते और उन्हें संरक्षण देते हैं। कोर्ट ने इस साल 28 जुलाई को एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया था, जिसमें दिल्ली और आसपास के इलाकों में आवारा कुत्तों द्वारा काटने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि और रेबीज के बढ़ते मामलों का जिक्र किया गया था, खासतौर पर बच्चों के बीच।

अब पूरा मामला समझिए

दरअसल, दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ सालों से आवारा कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अस्पतालों और स्कूलों से लेकर पार्कों और रिहायशी इलाकों तक में कई दर्दनाक हादसे सामने आए हैं। इससे एक ओर जहां आम जनता में डर का माहौल है, वहीं दूसरी ओर एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट्स इसे कुत्तों के प्रति अन्याय बता रहे हैं। उनका कहना है कि कुत्तों को पकड़कर दूर भेजना या कैद करना एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों के खिलाफ है और इससे उनके प्रति हिंसा बढ़ सकती है। वहीं, प्रशासनिक पक्ष का तर्क है कि मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है और बढ़ते डॉग-बाइट केसों को रोकने के लिए यह कदम जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अब दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें इंसानों की सुरक्षा और जानवरों के अधिकार दोनों की रक्षा की चुनौती सामने है।


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