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ओडिशा के गांवों में महिलाओं की पहल से जलवायु संकट का हल? जानिए कैसे!

Climate Action: ओडिशा के गांवों में महिलाएं ‘ड्रीम मैप्स’ के जरिए जंगल, जलस्रोत और सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा की दिशा में पहल कर रही हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी जलवायु-लचीले गांवों, जल संरक्षण और टिकाऊ खेती के मॉडल पर काम हो रहा है।
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भारत

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MI Zahir

Aug 28, 2026

Climate Action in Odisha News.

ओडिशा के गांवों में महिलाएं स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक भागीदारी के जरिए जलवायु बदलाव से निपटने की राह तलाश रही हैं। ( फोटो: AI.)

भारत के गांव अब जलवायु बदलाव की चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर नए रास्ते तलाश रहे हैं। ओडिशा में महिलाओं की भागीदारी से तैयार किए जा रहे ‘ड्रीम मैप्स’ सामुदायिक जंगलों, जलस्रोतों और खेती की ज़मीन जैसे संसाधनों को बचाने की दिशा में एक पहल हैं। वहीं, देश के दूसरे हिस्सों में जलवायु-लचीली खेती, जल संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा पर काम हो रहा है।

सपनों के नक्शे से संसाधनों की हिफ़ाज़त

ओडिशा के कुछ आदिवासी गांवों में महिलाओं ने ‘ड्रीम मैप्स’ तैयार किए हैं। इन नक्शों में वे अपने गांव को भविष्य में कैसा देखना चाहती हैं, यह दर्ज करती हैं। जंगल, जलस्रोत, खेती की ज़मीन और दूसरे सामुदायिक संसाधन इसमें अहम हिस्सा हैं।

इन नक्शों का मक़सद केवल गांव की तस्वीर बनाना नहीं, बल्कि स्थानीय ज़रूरतों और संसाधनों की पहचान कर उन्हें पंचायत और विकास योजनाओं से जोड़ना है। इससे समुदाय को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन संसाधनों का संरक्षण और पुनर्बहाली प्राथमिकता होनी चाहिए।

जलवायु जोखिम वाले जिलों की पहचान

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की राष्ट्रीय नवाचार जलवायु-लचीली कृषि पहल (NICRA) के तहत कृषि प्रधान जिलों में जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया गया है। इसके आधार पर स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक फसल, किस्म और कृषि प्रबंधन से जुड़े उपाय सुझाए जाते हैं।

इसका उद्देश्य सूखा, बाढ़, तापमान में बदलाव और बारिश की अनिश्चितता जैसी परिस्थितियों में किसानों की जोखिम सहने की क्षमता बढ़ाना है।

गांवों में जलवायु-लचीला मॉडल

जलवायु बदलाव से निपटने के लिए कई राज्यों में गांवों को अधिक लचीला बनाने पर भी काम हो रहा है। इनमें सौर ऊर्जा, कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण, हरित क्षेत्र और टिकाऊ कृषि जैसे उपाय शामिल हैं।

ऐसे मॉडल में स्थानीय समुदाय की भागीदारी अहम है। आधुनिक तकनीक के साथ स्थानीय मौसम और संसाधनों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल योजनाओं को अधिक उपयोगी बना सकता है।

खेती और जल संरक्षण पर ज़ोर

ग्रामीण इलाकों में जलवायु अनुकूलन का एक बड़ा हिस्सा खेती और जल प्रबंधन से जुड़ा है। वाटरशेड विकास, मिट्टी संरक्षण, जैविक खेती, वर्मी-कम्पोस्टिंग, मशरूम उत्पादन और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियां किसानों को आय के वैकल्पिक साधन देने के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद कर सकती हैं।

स्वच्छ और हरित गांव की दिशा

ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में स्वच्छ और हरित गांव की अवधारणा के तहत पेड़-पौधों का रोपण, जैविक खेती, नवीकरणीय ऊर्जा, कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों पर ज़ोर दिया जाता है।

इन प्रयासों की सफलता केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं करती। पंचायत, किसान समूह, महिला समूह और स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है।

महिलाओं की भागीदारी क्यों अहम?

गांवों में पानी, ईंधन, खेती और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े कामों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इसलिए संसाधनों की योजना और संरक्षण से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी स्थानीय ज़रूरतों को बेहतर ढंग से सामने ला सकती है।

ओडिशा के ‘ड्रीम मैप्स’ इसी सोच का एक उदाहरण हैं-जहां गांव के भविष्य की योजना बनाने में महिलाओं की आवाज़ को जगह दी जा रही है।

आगे का रास्ता

जलवायु बदलाव का असर हर गांव पर एक जैसा नहीं होता। इसलिए समाधान भी स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक होने चाहिए। कहीं जल संरक्षण प्राथमिकता हो सकता है, तो कहीं सूखा-सहने वाली फसलें, जंगलों की बहाली या वैकल्पिक आजीविका।

स्थानीय ज्ञान, आधुनिक तकनीक और समुदाय की भागीदारी को साथ लाकर गांव अपनी जलवायु-लचीलापन क्षमता मजबूत कर सकते हैं। यही प्रयास ग्रामीण विकास को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।