
प्राकृतिक खेती, एफपीओ मॉडल और सटीक खेती अपनाकर किसान खर्च घटाने के साथ मिट्टी और फसल दोनों को बेहतर कर सकते हैं। ( फोटो: AI )
खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, डीज़ल और सिंचाई की बढ़ती लागत आज किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे समय में कुछ वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके अपनाकर खर्च कम किया जा सकता है, बिना उत्पादन की गुणवत्ता से समझौता किए।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती, संसाधन-संरक्षण तकनीक, मशीनों का साझा उपयोग और सटीक खेती जैसी विधियाँ किसानों को लागत घटाने के साथ दीर्घकालिक लाभ भी दे सकती हैं। इन उपायों से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, पानी और ऊर्जा की बचत होती है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है।
प्राकृतिक खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह स्थानीय संसाधनों से तैयार जैविक विकल्पों का उपयोग किया जाता है। इनमें सबसे लोकप्रिय विकल्प जीवामृत है।
जीवामृत गोमूत्र, गुड़, बेसन, मिट्टी और पानी से तैयार होने वाली प्राकृतिक तरल खाद है, जिसे किसान अपने खेत पर ही बना सकते हैं।
नीति आयोग की प्राकृतिक खेती संबंधी गाइडलाइन के अनुसार, लगभग 10,000 लीटर जीवामृत तैयार करने की पुनरावृत्ति लागत करीब 11,400 रुपये आती है। इसमें गुड़, बेसन, बिजली और श्रम का खर्च शामिल होता है, जो कई मामलों में रासायनिक उर्वरकों की तुलना में कम पड़ता है।
इससे क्या फायदा होगा?
रासायनिक खाद पर निर्भरता घटेगी।
मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ेगी।
दीर्घकाल में उत्पादन लागत कम होगी।
कर्नाटक में प्राकृतिक खेती पर हुए अध्ययनों में किसानों ने उत्पादन लागत में 24 से 45 प्रतिशत तक कमी और लाभ-लागत अनुपात में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया।
संसाधन-संरक्षण तकनीकों का उद्देश्य कम संसाधनों में अधिक उत्पादन हासिल करना है। इसमें कई आधुनिक तकनीकें शामिल हैं।
प्रमुख तकनीकें
जीरो-टिलेज (बिना जुताई खेती)
लेजर लैंड लेवलिंग
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, इन तकनीकों से पानी, उर्वरक और ऊर्जा की बचत होती है तथा खेती की लागत में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी संभव है।
Bureau of Energy Efficiency (BEE) का कृषि मांग-पक्ष प्रबंधन (AgDSM) कार्यक्रम किसानों को ऊर्जा-कुशल पंप अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इससे बिजली की खपत घटती है और सिंचाई की लागत भी कम होती है।
हर किसान के लिए ट्रैक्टर, सीड ड्रिल या हार्वेस्टर खरीदना आर्थिक रूप से संभव नहीं होता। ऐसे में कस्टम हायरिंग सेंटर और किसान उत्पादक संगठन (FPO) बेहतर विकल्प बन सकते हैं।
मशीन खरीदने का बड़ा खर्च नहीं आएगा।
श्रम लागत कम होगी।
समय पर बुवाई और कटाई हो सकेगी।
छोटे किसानों को भी आधुनिक मशीनों का लाभ मिलेगा।
इसके अलावा, एफपीओ के माध्यम से खाद, बीज और अन्य कृषि सामग्री की सामूहिक खरीद करने पर कीमत भी कम पड़ सकती है।
सटीक खेती यानी खेत की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार उर्वरक, पानी और कीटनाशकों का उपयोग करना।
इसकी शुरुआत मिट्टी परीक्षण से होती है। परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर किसान सही मात्रा में पोषक तत्व डाल सकते हैं, जिससे अनावश्यक खर्च रुकता है।
इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) अपनाने से कई मामलों में कीटनाशक स्प्रे की संख्या 30 से 40 प्रतिशत तक घट सकती है, जिससे लागत कम होती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
सोलर पंप जैसे नवीकरणीय ऊर्जा विकल्प डीज़ल और बिजली दोनों का खर्च कम करने में मदद करते हैं।
| भाग | जानकारी |
|---|---|
| 1. प्राकृतिक खेती | जीवामृत अपनाएँ |
| 2. खाद खर्च | रासायनिक लागत घटाएँ |
| 3. संरक्षण तकनीक | पानी बचाएँ |
| 4. ऊर्जा बचत | बिजली खर्च कम करें |
| 5. FPO मॉडल | मशीनें साझा करें |
| 6. श्रम बचत | समय और पैसा बचाएँ |
| 7. Precision Farming | मिट्टी परीक्षण करें |
| 8. IPM अपनाएँ | स्प्रे खर्च घटाएँ |
| 9. सोलर पंप | ईंधन खर्च बचाएँ |
यदि आप इन तकनीकों को अपनाना चाहते हैं, तो अपने जिले के कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या स्थानीय एफपीओ से संपर्क करें।
मिट्टी परीक्षण कराएँ।
जीवामृत बनाना सीखें।
प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लें।
मशीनों के साझा उपयोग की व्यवस्था करें।
ऊर्जा-कुशल या सोलर सिंचाई विकल्पों की जानकारी लें।
छोटे-छोटे बदलाव खेती की लागत कम करने के साथ आय बढ़ाने और खेती को टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
Updated on:
25 Aug 2026 05:05 pm
Published on:
25 Aug 2026 05:05 pm
