
Laddakh Superfruit transform Rajasthani farmers fortune
Laddakh Superfruit transform Rajasthani farmers fortune: लद्दाख से राजस्थान तक फैल रही सी-बकथॉर्न की खेती एक नई उम्मीद जगा रही है। जहां हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर मरुस्थलीय राजस्थान तक, यह पौधा किसानों की आमदनी और ग्रामीण आजीविका में नया बदलाव ला रहा है। लेकिन कैसे, जानने के लिए जरूर पढ़ें patrika.com का ये लेख-
लद्दाख के उपराज्यपाल ने 14 अगस्त 2026 को केंद्रीय कृषि मंत्री को पत्र लिखकर नुब्रा घाटी में सी-बकथॉर्न पर शोध केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य इस पौधे पर वैज्ञानिक अध्ययन, मूल्यवर्धन और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 21 अगस्त को इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की, जिसकी अध्यक्षता डॉ. वी.बी. पटेल कर रहे हैं। समिति ने 24 अगस्त को क्षेत्रीय दौरा कर किसानों, अधिकारियों और अन्य पक्षों से मुलाकात की और 45 दिनों में विस्तृत व्यवहार्यता रिपोर्ट तथा डीपीआर तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
सी-बकथॉर्न (वैज्ञानिक नाम Hippophae rhamnoides) एक ठंडे रेगिस्तानी इलाकों का पौधा है, जो -40°C से +40°C तक तापमान सहन कर सकता है और खराब मिट्टी में भी उग सकता है। भारत में इसकी खेती मुख्य तौर पर लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में होती है।
दिसंबर 2025 में नुब्रा घाटी के निमू में स्थापित सी-बकथॉर्न सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उद्घाटन हुआ। लद्दाख में देश की लगभग 64% सी-बकथॉर्न की खेती होती है, लेकिन उत्पादन कम है क्योंकि पारंपरिक तरीके, अनियमित कटाई और प्रसंस्करण की कमी है। यह केंद्र इन कमियों को दूर करने, वैज्ञानिक खेती, प्रशिक्षण और मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने का काम करेगा।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल‑स्पीति में एक तकनीकी केंद्र जहालमा गांव में स्थापित किया गया, जहां सी-बकथॉर्न के प्रसंस्करण के लिए माइक्रोवेव ड्रायर, सोलर ड्रायर, फ्रूट पुलपर, वैक्यूम सीलिंग मशीन आदि लगाए गए। लगभग 150 महिला स्वयं सहायता समूहों ने इस पहल में भाग लिया। 2023-24 में लगभग 1500 पौधे वितरित किए गए, जिनकी जीवित रहने की दर अगस्त 2024 तक लगभग 70% रही। महिलाओं ने लगभग 1000 किलोग्राम ताजे फल, 400 किलोग्राम पत्तियां और 500 किलोग्राम सूखे पत्तों का प्रसंस्करण कर लगभग 6 लाख रुपए की आय अर्जित की।
लद्दाख में बढ़ती मांग और चुनौतियां
अगस्त 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि लद्दाख में स्थानीय कारोबारी सी-बकथॉर्न से जूस, पाउडर, साबुन, तेल और कॉस्मेटिक्स जैसे उत्पाद बना रहे हैं। एक बेरी में तीन संतरे जितना विटामिन C होता है। लेकिन जंगली पौधों से केवल 5% ही फल तोड़ा जाता है क्योंकि कांटेदार झाड़ियों से कटाई मुश्किल होती है और फल जल्दी खराब हो जाते हैं। कंपनियां 200-300 टन की मांग करती हैं, लेकिन एक सीजन में केवल 100-110 टन ही उत्पादन हो पाता है।
नवंबर 2024 में लद्दाख प्रशासन ने “सी‑बकथॉर्न मिशन” की रूपरेखा तैयार की। इसमें 2023 में 315 मीट्रिक टन और 2024 में 666 मीट्रिक टन सी-बकथॉर्न की कटाई हुई। अधिकारियों ने आग रोकने के लिए फायर लाइन बनाने, नर्सरी स्थापित करने और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठाए हैं।
सी-बकथॉर्न की खेती बीज या कटिंग से की जा सकती है, लेकिन फल पाने के लिए नर और मादा दोनों पौधे जरूरी हैं। पौधा 3-4 साल में फल देना शुरू करता है। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और कटाव रोकता है।
हालांकि राजस्थान में अभी तक सी-बकथॉर्न की खेती व्यापक रूप से नहीं हुई है, लेकिन राज्य के शुष्क और रेतीले इलाके जैसे थार मरुस्थल में यह पौधा उगाया जा सकता है। यह मिट्टी कटाव रोकने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक है। यदि राजस्थान में भी लद्दाख जैसे केंद्र स्थापित किए जाएं, प्रशिक्षण और प्रसंस्करण की सुविधा मिले, तो यह किसानों के लिए एक नया आय का स्रोत बन सकता है।
यदि आप सरपंच, पंचायत सदस्य या किसान हैं, तो यह जानना आवश्यक है कि सी-बकथॉर्न जैसी फसल आपके क्षेत्र में कैसे लाभकारी हो सकती है। ठंडी ऊंचाई वाले इलाकों में यह पहले से सफल हो रही है। यदि मिट्टी और जलवायु अनुकूल हों, तो यह खेती आपके गांव में नई आजीविका ला सकती है। इसके लिए
स्थानीय कृषि विभाग से संपर्क करें। नर्सरी और प्रसंस्करण सुविधाओं की जानकारी प्राप्त करें। महिला समूहों और युवाओं को शामिल करें। बाजार और मूल्य श्रृंखला की योजना बनाएं।
सी-बकथॉर्न केवल एक पौधा नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास का एक मॉडल बन सकता है। जहां शोध, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार मिलकर किसानों की आमदनी और आजीविका को सशक्त कर सकते हैं।
Updated on:
28 Aug 2026 12:23 pm
Published on:
28 Aug 2026 12:22 pm
