
नोएडा। प्रदेश सरकार को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला नोएडा शहर देश के हाईटेक शहरों में शुमार है। नोएडा की गगनचुंबी इमारतें और मॉल कल्चर यहां खुलेपन का अहसास कराते हैं। इसका नाम न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के संक्षिप्तीकरण (नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण) से बना है। यह शहर संजय गांधी द्वारा बसाया गया था। इतना ही नहीं यह शहर जितना हाईटेक होने के लिए प्रसिद्ध है। उतना ही राजनीतिक रूप में भी यहां एक ऐसा मिथक है। जिसे बड़े-बड़े राजनीतिक नेता मान गये। और कई मुख्यमंत्रियों ने यहां आना ही बंद कर दिया।
संजय गांधी की पहल से बना नोएडा शहर
नोएडा 17 अप्रैल 1976 को प्रशासनिक अस्तित्व में आया इसलिए 17 अप्रैल को "नोएडा दिवस" के रूप में मनाया जाता है। नोएडा विवादास्पद आपातकाल (1975-1977) के दौरान शहरीकरण पर जोर के तहत स्थापित किया गया था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र और कांग्रेस नेता संजय गांधी की पहल से यूपी औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम के तहत बनाया गया था। जनगणना भारत की अनंतिम रिपोर्ट 2011 के मुताबिक नोएडा की आबादी 6,37,272 है; जिनमें से पुरुष और महिला आबादी क्रमश: 3,49,397 और 2,87,875 हैं।
भारत की आजादी भी जुड़ा है इतिहास
यहां दनकौर में द्रोणाचार्य तथा बिसरख में रावण के पिता विश्रवा ऋषि का प्राचीन मन्दिर आज भी स्थित है। ग्रेटर नोएडा स्थित रामपुर जागीर गांव में स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान 1919 में मैनपुरी षड्यंत्र करके फरार हुए राम प्रसाद 'बिस्मिल' भूमिगत होकर कुछ समय के लिये यहीं रहे थे। नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे के किनारे स्थित नलगढ़ा गांव में भगत सिंह ने भूमिगत रहते हुए कई बम-परीक्षण किये थे। यहां आज भी एक बहुत बड़ा पत्थर सुरक्षित रखा हुआ है।
ब्रिटिश आर्मी व मराठों के बीच हुए युद्ध का स्मारक है मौजूद
11 सितम्बर 1803 को ब्रिटिश आर्मी व मराठों की सेना के बीच हुए निर्णायक युद्ध का स्मारक आज भी नोएडा के गोल्फ कोर्स परिसर के अन्दर मौजूद है। जो ब्रिटिश जनरल गेरार्ड लेक की स्मृति को दर्शाता है। जिसे अंग्रेज वास्तुविद एफ लिस्मन द्वारा बनाया गया था। इसे जीतगढ़ स्तम्भ कहा जाता है।
राजनीति में मिथक है प्रसिद्ध
अगर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो नोएडा शहर को लेकर एक मिथक भी बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है कि जो भी नेता प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए नोएडा का दौरा करते हैं उनकी कुर्सी चली जाती है। इस मिथक का इतिहास काफी पुराना है। 1988तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह नोएडा में एक प्रोजेक्ट का उद्घाटन करने पहुंचे थे। इसके बाद उनकी सरकार गिर गई थी। इसी तरह साल 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी एक पार्क का उद्घाटन करने नोएडा के सेक्टर-11 में करने गए और उसके बाद उन्हें भी कुर्सी गवानी पड़ी। 1998 में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह एक नोएडा के एक प्रोग्राम में पहुंचे और इसके बाद उनकी भी सरकार गिर गई थी। ये सिलसिला 2004 में भी हुआ तब मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव एक स्कूल के उद्घाटन के लिए नोएडा गए और फिर वे दोबारा कुर्सी पर नहीं लौट सके। इसके बाद 2011 में मायावती नोएडा आईं और इसके बाद हुए चुनाव में सत्ता उनके हाथ से फिसल गई। इसके बाद से 2017 तक उत्तर प्रदेश का कोई भी मुख्यमंत्री नोएडा नहीं आया। वहीं 2017 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मिथक को तोड़कर नोएडा आए
Published on:
23 Sept 2019 04:40 pm
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