
इलाज में मददगार बन रहा एआइ, चुनौतियां भी मौजूद
डॉ. पंकज जैन
फिजिशियन और एसोसिएट प्रोफेसर, मेडिकल कॉलेज, कोटा
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पिछले कुछ वर्षों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) का हर कहीं शोर मचा हुआ है और हो भी क्यों न, एआइ दिन प्रतिदिन हर किसी क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता भी सिद्ध करती जा रही है। व्यवसाय, खरीदारी, फैशन, खेती, मेडिकल व स्वास्थ्य देखभाल की जानकारी, एआइ हर क्षेत्र में मानव जाति की मदद के लिए तैयार है।
हाल ही के वर्षों में एआइ ने हेल्थकेयर व मेडिकल के क्षेत्र में भी पदार्पण किया है और एआइ के प्रयोगों के परिणाम भी उत्साहजनक साबित हो रहे हैं। देश के कई बड़े अस्पतालों ने एआइ आधारित उपचार की पहल भी की है। आलम यह है कि डेटा प्रदाता कंपनी स्टेटिस्टा के हाल में जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 में हेल्थकेयर बाजार में एआइ की वैश्विक भागीदारी 11 बिलियन डॉलर थी। स्टेटिस्टा ने यह अनुमान भी लगाया है कि वर्ष 2030 तक ये भागीदारी 188 बिलियन डॉलर हो सकती है यानी कि प्रतिवर्ष 37 प्रतिशत मिश्रित वृद्धि की दर। इसके अलावा, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की एआइ इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2022 में एआइ आधारित उत्पादों और सेवाओं की पेशकश करने वाले स्टार्टअप्स में निवेश प्राप्ति के मामले में पांचवे स्थान पर है।
वर्तमान में, एआइ के प्रयोग से चिकित्सा विज्ञान के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में ही फायदा मिल पा रहा है जिनमें धडक़न संबंधी विकार, मिर्गी रोग, शुगर का कम होना, रोगों के निदान हेतु ऊतक विकृति परीक्षण, एक्स-रे, सीटी स्कैन रिपोर्ट प्रमुखता से शामिल हंै। गौरतलब है कि हृदय की धडक़न संबंधी बीमारी एट्रियल फिब्रिलेशन का जल्द निदान एआइ के मेडिकल क्षेत्र में किए गए शुरुआती प्रयोगों में से एक है। मरीजों के डेटा विश्लेषण से हार्ट अटैक व हार्ट फेल्योर के संभावित जोखिम एआइ से पता लगाए जा रहे हैं। सर्जिकल क्षेत्र में एआइ से सर्जरी के संभावित जोखिमों का पता लगाकर सर्जरी के दौरान रक्त की कमी, दर्द व अन्य दुष्प्रभावों में कमी कर मरीज की रिकवरी जल्दी की जा सकती है। तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों में एआइ आधारित डिवाइस से मिर्गी का भी पता लगाया जा रहा है। रेडियोलॉजी के क्षेत्र में एआइ की मदद से एक्स-रे, सीटी स्कैन व एमआरआइ रिपोर्ट के विश्लेषण में भी काफी सटीकता आई है। हाल में कोविड के दौरान एक्स-रे व सीटी स्कैन विश्लेषण में एआइ का उपयोग काफी हद तक श्रमशक्ति को बचाने में सफल रहा है। इसी प्रकार मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री, आनुवांशिक जानकारी, जीवन शैली संबंधित डेटा तैयार करने में भी एआइ का योगदान अतुलनीय है।
अपनी बहुत सारी खूबियों के बावजूद चिकित्सा क्षेत्र में एआइ से जुड़ी कई चुनौतियां भी हैं। एआइ डेटा आधारित तकनीक है इसलिए डेटा संग्रहण, उसकी सुरक्षा एवं स्वामित्व वर्तमान में एक बड़ी चुनौती है। डेटा संग्रहण एवं उनका इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड में रूपांतरण चिकित्सा कर्मियों पर एक अतिरिक्त प्रशासनिक भार होगा। एआइ आधारित डिवाइस द्वारा आमजन के स्वास्थ्य पहलुओं पर लगातार निगरानी व व्यक्तिगत निजता के भंग होने से लाइलाज बीमारी से ग्रसित मरीजों व समाज से वंचित वर्ग में हीनता की भावना आ सकती है। एआइ के मेडिकल क्षेत्र में प्रयोग हेतु विकसित मूल अवधारणा एवं साधनों का मान्यकरण भी आने वाले वर्षों में एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। हालांकि कई शोध में एआइ के स्पष्ट अवसर और उनके सकारात्मक परिणाम मिले हैं, किंतु साथ ही एआइ के प्रयोग से संबंधित कई प्रतिवेदित सीमाएं एआइ के मान्यकरण को जटिल बनाती हैं। डिजिटल मेडिसिन में प्रशिक्षित मेडिकल पेशेवरों की कमी एवं चिकित्सकों में एआइ द्वारा पूर्णतया प्रतिस्थापन का संदेह भी इस क्षेत्र की राह में चुनौती है।
चिकित्सा क्षेत्र में एआइ के सफल क्रियान्वयन के लिए इन चुनौतियों से निपटना पहली जरूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बिना परीक्षण के एआइ को स्वास्थ्य क्षेत्र में लागू करना मरीजों के लिए हानिकारक हो सकता है जो कि एआइ के प्रति उनके विश्वास को खत्म कर सकता है। इसके लिए डब्ल्यूएचओ ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआइ की रूपरेखा विकसित करने व उसे लागू करने के लिए छह सिद्धांतों - 1.स्वायत्तता की रक्षा, 2.जनकल्याण, जनसुरक्षा व आमजन की अभिरुचि को बढ़ावा देना, 3.पारदर्शिता, विवेचनीयता व सुबोधता की सुनिश्चितता, 4.एआइ में जिम्मेदारी व जवाबदेही की सुनिश्चितता, 5.समग्रता व हिस्सेदारी की सुनिश्चितता, 6.जिम्मेदार व टिकाऊ एआइ को बढ़ावा - की अनुशंसा की है। इनकी पालना से एआइ की राह में आने वाली चुनौतियां स्वत: दूर हो जाएंगी।
Published on:
21 Jul 2023 09:45 pm
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