8 नवंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

नाउम्मीदी के अंधेरे को चीरने के प्रयास

- कोरोना के कहर और नाउम्मीदी के अंधियारे को चीरने के तमाम प्रयास किए जा रहे हैं।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

नई दिल्ली

•

image

Vikas Gupta

•

Updated: 29 Apr 2021, 7:10 AM IST

नाउम्मीदी के अंधेरे को चीरने के प्रयास

नाउम्मीदी के अंधेरे को चीरने के प्रयास

कोरोना के कहर के बीच देश के कई राज्यों में संक्रमण की रफ्तार ने जो हालात पैदा किए हैं, वे चिंता बढ़ाने वाले ही हैं। ऑक्सीजन की कमी, जीवन रक्षक दवाइयों व इंजेक्शनों की मारामारी के बीच मरीज बेहाल हैं और अस्पताल भी हांफते जा रहे हैं। चिकित्सा सुविधाओं का इंतजाम और कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने के काम में सरकारों का आपदा प्रबंधन भी गड़बड़ा रहा है। कोरोना के कहर और नाउम्मीदी के अंधियारे को चीरने के प्रयास भी कम नहीं हो रहे। ऐसे प्रयास, जिसमें आम से लेकर खास तक सब अपने-अपने तरीकों से कोरोना की मार झेल रहे लोगों और उनके परिजनों के लिए फरिश्ते बनकर उभरे हैं।

कोरोना महामारी के बीच मददगारों के ऐसे-ऐसे उदाहरण पिछले दिनों सामने आए हैं, जिनमें किसी ने अपनी जीवन भर की कमाई कोरोना पीडि़तों की मदद के लिए समर्पित कर दी, तो किसी ने अपनी संतान के विवाह के लिए जमा की गई रकम ऑक्सीजन का इंतजाम करने के लिए सौंप दी। कोई संक्रमितों व उनके परिजनों के लिए नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था में जुटा है, तो कोई मरीजों को नि:शुल्क दवाइयां उपलब्ध कराने मेंं। हमारे मजबूत सामाजिक ताने-बाने का अहसास कराने वाले ये प्रयास सेतुबंध के वक्त गिलहरी के योगदान जैसे भले ही हों, लेकिन यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि देशवासी किसी भी आपदा का मिलजुल कर मुकाबला करने में सक्षम हैं। कोरोना की पहली लहर का दौर लंबे लॉकडाउन का भी था। तब भी ऐसे ही सहायता के हाथ खूब उठे थे।

सरकारी तंत्र जब बदइंतजामी का शिकार होने लगे, तो मदद के ऐसे प्रयास काफी कारगर होते हैं। साथ ही सरकारों को अपना आपदा प्रबंधन मजबूत करने का मौका भी देते हैं, लेकिन हमारे यहां तो सिस्टम की आदत ही हो गई है कि आग लगने पर ही कुआं खोदने का काम होता है। साल भर पहले के हालात भी कम भयावह नहीं थे। तब भी मदद के हाथ ऐसे ही आगे आए थे, लेकिन सरकारों ने कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से निपटने के पुख्ता इंतजाम करने की चिंता की ही नहीं। इसके नतीजे सामने हैं।

खुशी की बात यह है कि वैश्विक मंच पर भी दुनिया के देश आपदा में एक-दूसरे के मददगार बन रहे हैं। भारत में भी ऑक्सीजन, मेडिकल उपकरणों और दवाइयों की मदद दूसरे देशों से पहुंचने लगी है। यह बात सही है कि सबकी मदद की अपनी सीमाएं भी हैं। वक्त पडऩे पर भारत ने भी दुनिया के दूसरे देशों को मदद पहुंचाई है। यह आदान-प्रदान संबंधों की नई परिभाषा गढ़ेगा, यह भी उम्मीद की जानी चाहिए।