
आज जिसे देखो वही ससुर सामने वाले को मंत्रमुग्ध करने में जुटा है। बचपन में सपेरे अपनी पिटारी में काला नाग लेकर आते और बीन की धुन पर उसे नचाते थे। तब बड़े बूढ़े हमें बताते कि सपेरे ने काले नाग को मंत्र पढ़ कर मुग्ध कर रखा है। स्कूल में हमारे संगीत गुरु मातादीनजी हारमोनियम बजा कर कबीर का भजन गाते- 'मन लागो मेरो यार फकीरी में' तो हम मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते।
जवानी में एक सुन्दरी ने हमें लगभग मंत्रमुग्ध करके दीवाना बना डाला था पर अचानक उसने व्यापारी से ब्याह रचा डाला और हम इधर-उधर मुड़कड़ी मारते घूमते रहे। ये तो भला हो स्वामी भोगानंद का जिन्होंने एक ही प्रवचन में हमारा सारा दीवानापन उतार कर हमें गृहस्थ बना डाला। इधर रिटायर कवियों ने अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने का बीड़ा उठा रखा है। कवि लोग अपनी जवानी में लिखी रोमानी तुकबंदियों को सुना-सुना कर समय काट रहे हैं।
हैरत यह कि इन्हें आज की सामाजिक चुनौतियों से कोई लेना देना ही नहीं बचा। मंत्रमुग्ध करने का काम हमारे नेतागण भी खूब कर रहे हैं। सेना ने एक 'सर्जिकल स्ट्राइक' क्या की कि समस्त भक्तगण मंत्रमुग्ध होकर जैजैकार कर उठे हैं। वैसे हमारे प्यारे नेता चुनावों के वक्त भांति-भांति के जुमले बोल कर वोटर को मंत्रमुग्ध करने का काम करते ही रहते हैं।
हालांकि अब हमारी उम्र तो नहीं रही लेकिन कहावत है कि बंदर लाख बूढ़ा हो जाए पर 'कुलाबांदरी' 'खाना नहीं छोड़ता सो कल सांझ हम भी रंगबिरंगी ड्रेस पहन कर पहुंच गए गरबा-डांडिया करने। न वहां संगीत की सुरीली स्वरलहरियों पर नृत्य करती युवा नृत्यांगनाओं को देख मंत्रमुग्ध हो गए।
हमें मुग्धावस्था में देख श्रीमतीजी अपनी सहेली के कोहनी मार कर कहने लगी- चाहे मुंह में दांत और पेट में आंत जवाब दे चुकी हों पर रसिया बुड्ढा थाली में पकवान देख लार टपकाने लगता है। पता नहीं यह जुमला उन्होंने किसे देख कर कहा? आपको पता हो तो हमें बता देना।
व्यंग्य- राही की कलम से
Published on:
04 Oct 2016 01:18 am
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