17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

प्रशिक्षण में भारतीयता का अभाव

Gulab Kothari Article: राज्य सेवा हो अथवा केन्द्रीय सिविल सेवा, नियुक्ति प्रक्रिया की खामियों ने देश के विकास को ह्रास में बदल दिया। सारा कार्य-वातावरण विषाक्त बना हुआ है। कुछ स्थानों पर जातिवाद की कट्टरता का प्रभाव भी देखा जा सकता है... देश के प्रशासनिक ढांचे की कुरूपता पर और उससे उपजे हालात बयां करता 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विचारोत्तेजक अग्रलेख-

5 min read
Google source verification
Gulab Kothari editor-in-chief of 'Patrika' group

Gulab Kothari editor-in-chief of 'Patrika' group

Lack of Indianness in training: भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में लोकतंत्र को प्रतिष्ठित रखना चुनौती भरा कार्य है। भूगोल-भाषा-स्थानीय संस्कृति इसका बड़ा कारण है। हजारों साल से देश एक अक्षुण्ण संस्कृति को जी रहा था। कितने ही आक्रमण हुए, अत्याचार हुए, गुलामी भोगी, उसके बाद भी हम सांस्कृतिक दृष्टि से अखण्ड हैं। आगे भी यह अखण्डता बनी रहेगी। युवा पीढ़ी जागरूक है। उसे भविष्य के प्रति आश्वस्त होना है। लेकिन आज हमारी नीतियां भविष्य को छू तक नहीं रहीं। क्या छोड़कर जाएंगे आने वाली संतानों के लिए- बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अंग्रेजी, भौतिक वाद, विदेशी उद्योग, विदेशी निवेश...वगैरह, वगैरह! अपने ही देश में अपने ही लोगों द्वारा गुलामी का सा व्यवहार, असीमित कर्जा, न जमीन, न पशुधन, न पर्यावरण, विषाक्त अन्न, पाखण्डी संत, जातिवाद, कट्टरता, मशीनी युग, कृत्रिम बुद्धिमता (एआई)। क्या इसमें कहीं भी भारत की आत्मा दिखाई देगी? अध्यात्म का प्रकाश क्या ढक जाने वाला नहीं है?

इसका उत्तर यदि कहीं है, तो हमारी प्रशासन व्यवस्था (कार्यपालिका) के हाथ में है। विधायिका नीतियां बनाने में भी सक्षम नहीं रही। शिक्षा के अभाव में समय के बहुत पीछे चल रही है। अत: नीति निर्माण का कार्य भी आंशिक या प्रमुख रूप में तो कार्यपालिका के क्षेत्र में ही आ चुका है। क्रियान्विति तो मूल कार्य है ही। आगे भी रहेगा। तब चिंतन का विषय क्या रह जाता है?

एक- भारत का अखण्ड स्वरूप।
दो- राज्यों की निजी संस्कृति।
तीन- प्रत्येक नागरिक का सम्मान और सुरक्षा।
चार- जीवनयापन के समान अवसर। समान नागरिक संहिता, भ्रष्टाचार मुक्ति, कानून व्यवस्था, आस्था प्रधान समाज। धर्म घरों में, बाहर सब भारतीय।
पांच- आर्थिक विकास के प्रति दूरदृष्टि। भावी परिवर्तनों पर दृष्टि।

विषय अनेक हैं। प्रश्न प्रतिबद्धता का है। राज्यों की सेवा के अधिकारी (राजस्थान में आरएएस) अपने राज्यों की संभावनाओं, चुनौतियों, स्थानीय भाषा एवं परम्पराओं से परिचित रहते हैं। ऋ तुएं, पैदावार, खेती, वन, स्वास्थ्य और भूगोल को समझते हैं।

अपने राज्य को एक इकाई के रूप में गतिमान ढंग से देश के समक्ष प्रस्तुत करने की क्षमता रखते हैं। केन्द्रीय कर्मचारियों का अपना कार्यक्षेत्र भिन्न होता है। एक ओर केन्द्रीय विभागों की राज्य में नीतिगत भागीदारी, उनका संचालन तथा दूसरी ओर, केन्द्र- राज्य के मध्य सेतु रूप संतुलन, समीक्षा व सलाह का कार्य।

हम आजादी का अमृत महोत्सव तो मना रहे हैं किन्तु जीवन में अमृत है कहां? कौन राहू छीन कर ले भागा? आज देश 'सिविल सेवा दिवस' मना रहा है। राहू का शीश काटकर अमृत लौटा लाने की संभावनाओं पर चिंतन करना चाहिए। सरकारों को भी बाध्य किया जाए कि लोकतंत्र के तीनों पहिए एकरूपता के साथ, एक ही दिशा में गतिमान रहें। भारत फिर से सोने की चिडिय़ा बने, विश्व गुरू बने।

पिछले 75 वर्षों की स्वच्छंद नीति, निजी स्वार्थपूर्ण दृष्टि, वंशवाद, क्षेत्रीयता, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने लोकतंत्र के इस पाए का स्वरूप ही खोखला कर दिया है। आश्चर्य तो यह है कि हम अपनी इस उपलब्धि पर गौरवान्वित हैं।

पैसे लेकर राज्य सेवा के अधिकारियों की भर्ती, इनकी परीक्षाओं का ताण्डव, अपराधियों को संरक्षण, दलाली आदि व्यवहारों ने सिद्ध कर दिया कि हमारी प्रशासनिक सेवाएं एशिया की निकृष्टतम स्तर की है। सन् 2009 का आर्थिक सर्वे (एशिया) इस तथ्य की पुष्टि करता है।

छोटे- छोटे देशों (ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि) से भी भारतीय सिविल सेवा का स्तर हद दर्जे तक कमतर, धीमा और कष्टप्रद है। इसी प्रकार सन 2012 की हांंगकांग की रिपोर्ट (राजनीतिक एवं आर्थिक रिस्क सलाहकार समूह की) ने भी भारतीय सिविल सेवा को भ्रष्ट और अक्षम बताया। दस में से 9.21 का पायदान मिला।


सन 1923 में 'ली कमीशन ' ने देश में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की स्थापना की सिफारिश की थी। राज्य सेवा के लिए निर्णय राज्यों एवं रियासतों पर छोड़ दिया था। राजस्थान की स्थापना के वक्त केवल तीन रियासतों (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर) में ही राज्य सेवा आयोग बना हुआ था।

जबकि रियासतें 22 थीं। रियासतों के विलय के बाद बीस अगस्त 1949 को राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की स्थापना हुई। लेकिन नियुक्ति बाबत गजट अधिसूचना के प्रकाशन के साथ ही आयोग की वास्तविक स्थापना 22 दिसम्बर 1949 को मानी जाती है।

राज्य सेवा के अधिकारियों को दो वर्ष के प्रशिक्षण का प्रावधान है। किन्तु इसकी पृष्ठभूमि आज भी अंग्रेजी ढांचागत स्वरूप की ही है। बस इस एक लाइन ने आज भी आजादी उपलब्ध नहीं कराई है। सम्पूर्ण कार्यपालिका (केन्द्रीय एवं राज्य स्तर पर) आज भी अंग्रेजियत की प्रतिनिधि संस्था बनी हुई है।

शेष नागरिक इनके आगे दूसरी श्रेणी के हैं। आज तो इनकी भर्ती, प्रशिक्षण, जीवन शैली, माटी की गंध सब कुछ प्रश्नों के घेरे में आ गई। कुछ तो भ्रष्टाचार और भोग के पर्याय हो गए। राज्य स्तर की भर्ती स्थानीय सत्ता के हाथ में होने से इसकी पवित्रता ही समाप्त हो गई।

राजस्थान में राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आर.ए.एस.) परीक्षा तो राज्य के माथे पर कलंक बन गई। भर्तियों की बोलियां- भाव-ताव होने लगे। पहले ही गुणवत्ता पर अनेक प्रश्न उठे हुए हैं। भ्रष्टाचार के इस ताण्डव ने राज्य में लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने में कसर नहीं छोड़ी है।

विडम्बना यह है कि सरकारें स्वयं ही इस 'यज्ञ' में यजमान हैं। अभावग्रस्त मानसिकता की हद ही है कि तुच्छ धनराशि के बदले भावी पीढिय़ों की उम्मीदों एवं राज्य के भावी विकास को तिलांजलि दे दी जाती है।

यह भी पढ़ें : जनता की बने कांग्रेस

राज्य सेवा हो अथवा केन्द्रीय सिविल सेवा, नियुक्ति प्रक्रिया की खामियों ने देश के विकास को ह्रास में बदल दिया। सारा कार्य-वातावरण विषाक्त बना हुआ है। कुछ स्थानों पर जातिवाद की कट्टरता का प्रभाव भी देखा जा सकता है। कोई सरकार राज्य की अखण्डता के प्रति चिंतित नहींं है। 'बांटो और राज करो' की अंग्रेजी नीति आज भी प्रभावी है।

राज्य सरकारें परोक्ष रूप से इन सेवाओं के माध्यम से राजनीति करती है, धन एकत्र तक करती है, चुनावों में परोक्ष रूप में सहयोग मांगती है। आज अधिकारियों की पदस्थापना गुणवत्ता और आवश्यकता पर आधारित नहीं रह गई। स्थानीय विधायकों की अनुशंसा तो कई -कई अधिकारियों को एक स्थान पर टिकने ही नहीं देती।

दूसरी ओर केन्द्रीय सेवा के अधिकारी हैं जो 'मेहमानों' की तरह मुख्य रूप से मंत्रियों की कार्यशैली में सीधे-सीधे भागीदार हैं। उनका स्थानीय माटी से कोई नाता नहीं है। मूल रूप से ये ही तंत्र को चलाते हैं। राज्य सेवा के कर्मचारी भी इनके आगे नीचे दर्जे के ही माने जाते हैं।

कभी कार्यपालिका में, एक विभाग में एक आइएएस होता था। आज सात-आठ हैं और कार्य होते ही नहीं। सारी योजनाएं लागत बढ़ाने और कमीशनखोरी की मशीनें बन गईं है। ये ही सारी योजनाओं के जनक-पालक-संहारक बने हुए हैं। लोकतंत्र के 'विष्णु' हैं। सेवानिवृत्त अधिकारियों का ऐश्वर्य इसका प्रमाण है।

हर सरकार का मुख्यमंत्री ही इनका 'ब्रह्मा' होता है। रक्षक भी, पोषक भी। इसका मूल कारण है शिक्षा में और अधिकारियों के प्रशिक्षण में भारतीय दर्शन का अभाव। अंग्रेजी जीवन शैली, भाषा और परंपराओं का निर्वहन। देश के विकास में सकारात्मक भूमिका इनके सपने का अंश ही नहीं हो पाती। इनको जनता के सेवक कहना जनता का अपमान ही है।

ये स्वयं भी जनता को स्वामी नहीं मानते। दोनों के बीच की दूरी बढ़ती ही गई 75 वर्षों में। आजादी का 'अमृत-घट' इन्होंने ही छीना है। जब तक इनकी मानसिकता भारत के रंग में नहीं रंगेगी, भारत तब तक सही अर्थों में आजाद नहीं होगा।

यह भी पढ़ें : पूतना का दूध

पाकिस्तान हमारे साथ ही आजाद हुआ था। वहां के सरकारी अधिकारी/ कर्मचारियों की यूनिफार्म है। हमारे अधिकारी अंग्रेजी सूट-बूट, बे्रड-बटर और क्लब लाइफ को ही श्रेष्ठ मानते हैं। बच्चों को भारत में न रखना चाहते हैं, न भारतीयता की छाप उनके जीवन में दिखाई देती है। कार्यशैली-जीवनशैली दोनों अंग्रेजी आधारित है।

दिल्ली की राजधानी से केन्द्रीय सेवा अधिकारी मूल रूप से अंग्रेजी मीडिया-संपादकों के संपर्क में ही वर्षों से रहे। भारतीय जनजीवन समझने का उन्हें अवसर ही नहीं मिला। अंग्रेजी मीडिया- उद्योग जगत का प्रतिनिधि था। जनता का नहीं। इस वातावरण ने भी देश की आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया।

यह भी पढ़ें : मूंगफली सरकार की, जनता को छिलके!

इतना ही नहीं, संविधान का स्वरूप, नए कानूनों की रूपरेखा, न्यायपालिका का दृष्टिकोण, पुलिस, वित्त, सेना जैसे ढांचे आज भी अपना पुराना स्वरूप नहीं छोड़ पाए। क्या आज पुलिस की छवि अंग्रेजों की पुलिस की तरह नहीं बन गई। नेता भी कमाने-खाने का रास्ता तलाशते हैं और अधिकारी इसमें सहायक होते हैं। बगुला भगत बनकर रह गए!

क्या कभी इनका जमीर कहेगा कि मां-बाप की उम्र भर की कमाई खर्च कर, जीवन के मक्खन जैसे संवेदनशील आश्रम की बलि चढ़ाकर हम क्या बन गए? हमें पढ़कर हमारे बच्चे कैसे भगत सिंह बनेंगे? कैसे हमारे रहते देश सोने की चिडिय़ा बनेगा? मैं तो दिन भर मांग-मांग कर ही जीवन गुजारता हूं!
gulabkothari@epatrika.com