
gulab kothari article
'राइट टू हैल्थ' यानी 'स्वास्थ्य का अधिकार' की जगह राजस्थान सरकार ने पिछले दिनों स्वास्थ्य की देखभाल कानून के मसौदे का झुनझुना दिखाकर जनता को ठेंगा दिखा दिया। एक ओर वह जनता को स्वास्थ्य का अधिकार देने के अपने चुनावी वादे से मुकर गई वहीं दूसरी ओर बीमारियों की अग्रिम रोकथाम, पर्यावरण संरक्षण व प्रदूषण नियंत्रण, मिलावट और नकली दवा पर नकेल जैसे गंभीर मुद्दों को इस मसौदे में शामिल तक नहीं कर पाई। ऐसे मामलों में दोषी कार्मिकों और अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही तक तय नहीं की। जनता के विश्वास की यह कैसी होली?
क्या स्वास्थ्य का अर्थ बीमारियों का मुफ्त इलाज करना ही है? इसके उदाहरणों से तो कोरोनाकाल के दस्तावेज भरे पड़े हैं। देखा जाए तो किसी भी व्यक्ति के स्वस्थ रहने का अधिकार तो स्वास्थ्य से जुड़ी सभी सेवाओं तक आसान पहुंच का अधिकार ही है। ऐसा अधिकार जिसमें स्वास्थ्य को समग्रता से देखा जाता हो। हकीकत यह है कि आज जयपुर जैसे शहर में सबको स्वच्छ पानी तक उपलब्ध नहीं है।
कुपोषण तो दूर का विषय है। यह कैसा अधिकार जिसमें न तो सरकार प्रदूषणमुक्त वातावरण की बात करे, न स्वच्छता की गारण्टी देना चाहे और न ही दवा नीति के साथ अस्पतालों-दलालों पर नियंत्रण की बात हो। नजदीक से देखें तो स्वयं सरकारी कर्मी ही अपने हितों में कार्य कर रहे हैं। इनको किसी अपराध के लिए किसी सजा का प्रावधान मसौदे में नहीं है।
यों कहें कि सरकार स्वास्थ्य को जिन्दगी-मौत से जुड़ा गंभीर विषय नहीं मानती। राज्य सरकार का तीन साल का रिकॉर्ड देखें तो ऐसा लग रहा है जैसे बच्चे को बहला रहे हों। इससे तो बेहतर है वह कुछ भी ना करे, मौन ही रहे।
समूचे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली एक मुखौटा बनकर रह गई है। यहां भी एक बड़ी लॉबी उभरकर निजी स्वार्थों के कारण इस प्रणाली को कमजोर करने में लगी है। संसद में स्वास्थ्य के अधिकार की मांग करने वाले प्राइवेट बिल भी पेश हुए, राजस्थान-छत्तीसगढ़-तमिलनाडु सरकारों ने भी स्वास्थ्य के अधिकार को कानूनी रूप देने की बातें कही जरूर।
राजस्थान का मसौदा देखकर लगता है कि सरकार कहकर पलट गई। इसके स्थान पर चिरंजीवी योजना चला दी। क्या यह स्वास्थ्य के अधिकार का स्थान ले सकती है? कौन नहीं जानता कि इस योजना का लाभ किसको मिल रहा है! अभी तक स्वास्थ्य नीतियों की नियमित समीक्षा, पुनर्गठन कार्य भी कहां होते हैं! स्वास्थ्य विभाग की बपौती लगती है स्वास्थ्य नीति। अन्य विभागों का तो जैसे सरोकार तक नहीं है।
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स्वास्थ्य के बजट पर दृष्टि डालें तो सरकार की जेबें खाली दिखाई देती हैं। उनमें भी छेद ही छेद हैं। कितना-सा बजट। सम्पूर्ण मसौदे का प्रारूप रोगी के उपचार तक सीमित है। हां, कानून बना तो उसकी पालना देखने के लिए सरकारी कमेटियां होंगी। यह नया इंस्पेक्टर राज होगा। कानून पालन की रिपोर्ट विधानसभा में रखी जाएगी। मरीज के इलाज के दस्तावेज उपलब्ध हो सकेंगे।
शिकायतों की सुनवाई होगी और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता को सुरक्षा की गारण्टी भी होगी। लेकिन आश्चर्य यह है कि प्रदूषण, मिलावट, नकली दवाएं, शुद्ध हवा-पानी जैसे गंभीर मुद्दों से सरकार ने हाथ ही झाड़ लिए। संक्रामक बीमारियों के नियंत्रण की चर्चा तक नहीं। स्वस्थ जीवनशैली में बाधक बनने वालों के विरुद्ध कार्यवाही का प्रावधान ही नहीं। मातृ-शिशु मृत्युदर जैसे विषयों पर नियंत्रण की योजना तक नहीं।
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दरअसल, खाद्य सुरक्षा की गारण्टी सरकार देना ही नहीं चाहती। यह भी एक उद्योग जैसा कमाई का कार्य हो गया। तब सरकार बेहतर पोषण की आशा कैसे करें। बच्चों के मिड डे मील की दुर्दशा, आंगनबाड़ी में गर्भवती महिलाओं-बच्चों के कुपोषण की कहानी, अस्पतालों में स्टाफ के हालात, दवा-टीकों की अनुपलब्धता सरकारों की मंशा को स्पष्ट करती है।
बोलने वाले और होते हैं, काम करने वाले कोई और। किसके भरोसे वादे, किसके भरोसे क्रियान्वयन! कमीशनखोरी के किसी दरवाजे-खिड़की को बंद करने की कोशिश नहीं की गई। बल्कि मुफ्त इलाज के नाम पर दवाइयों की खरीद कोरोना काल को पछाड़ देगी। देख लेना। इस देश पर नेता कितने मेहरबान हैं इसका प्रमाण 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स' की रिपोर्ट में दिखाई देता है। कुल 116 देशों की सूची में 101 वां स्थान। वाह!
वैसे स्वास्थ्य के नाम पर केन्द्र और राज्य सरकारों की कई योजनाएं हैं, किन्तु स्वास्थ्य सुरक्षा कानून ही देश में नहीं है। तब नागरिक, अधिकार के रूप में स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग कैसे करे! जो उपलब्ध है, उसी में संतोष करना हमारी लाचारी है। कानूनी अधिकार ही नहीं है, तब मूल अधिकार का सपना देखना मृगमरीचिका ही है न! तब तो सत्ताधीशों का स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा।
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समय-समय पर अदालतों ने जन स्वास्थ्य से जुड़े प्रावधानों की ओर ध्यान भी दिलाया है। किन्तु कहते हैं-अंधे के आगे रोए, अपना दीदा खोए। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन जीने के अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारण्टी देता है। उसमें स्वास्थ्य के सभी मुद्दे स्वत: समाहित हो जाते हैं। तब स्वास्थ्य की देखभाल के लिए अलग प्रावधान की आवश्यकता ही कहां है?
क्या मुफ्त इलाज का दावा सरकार ने कोरोना काल में नहीं किया था? फिर क्यों इलाज में इतने परिवार उजड़ गए। सरकारी वादे कुछ और होते हैं, किन्तु मुखौटे लगाकर ऐसे कानून बना देते हैं, जिनमें आम आदमी के बजाए कर्मियों को ही लाभ हो।
सरकार की संवेदनहीनता का उदाहरण यह भी है कि सेहत जैसे बड़े मामले में खाद्य पदार्थों की मिलावट की जांच तक की व्यवस्था पूरी नहीं है। राजस्थान में तो करीब सात करोड़ की आबादी पर महज 48 फूड इंस्पेक्टर तैनात हैं, यानी पन्द्रह लाख की आबादी पर महज एक। आम आदमी चाहे तो भी मिलावटी खाद्य पदार्थ की जांच नहीं करा सकता।
प्रदेश के हर जिले में फूड सैम्पल जांच प्रयोगशाला बनाने की घोषणा हो चुकी है लेकिन अभी 9 जिलों में ही ऐसी प्रयोगशालाएं काम कर रहीं है। दिसम्बर 2019 से जनवरी 2021 तक खाद्य पदार्थों के 8097 सैम्पल लिए गए, 2153 में मिलावट पाई गई, इनमें 308 को असुरक्षित भी माना था। क्या हुआ? क्या किसी को लम्बी सजा होती है? सरकार मिलावट कानून को और सख्त कर इसे विधानसभा से पारित करा चुकी है पर अभी तक संशोधित कानून केे प्रावधानों पर अमल करना बाकी है।
स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। केवल मुफ्त अनाज बांटना ही काफी नहीं है। कार्यपालिका के कार्यों की पारदर्शिता एवं जवाबदेही तय होती ही नहीं। बल्कि जनप्रतिनिधियों के ज्ञान के अभाव का लाभ भी इनको ही मिलता है। वास्तव में सरकार जनप्रतिनिधि नहीं, कार्यपालिका के नियंत्रण में चलती है। इसलिए सभी नीतियों में पहले इनका ध्यान रखा जाता है। यहां कुछ बचे, तो जनता तक पहुंचे।
gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
13 Apr 2022 12:29 pm
Published on:
13 Apr 2022 12:16 pm
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