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हंसी वही जो बांटे हर किसी को खुशी, न कि दिलों पर चोट

लोकेश त्रिपाठी, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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हंसी और मनोरंजन जीवन के लिए जरूरी हैं,लेकिन जब यह किसी के सम्मान पर चोट करे तो यह हंसी नहीं रहती, यह अपमान बन जाती है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगजनों का मज़ाक उड़ाने वाले इन्फ्लुएंसर व कॉमेडियन सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगें। यह आदेश उस मामले पर आया, जिसमें कॉमेडियन समय रैना पर आरोप लगे कि उन्होंने अपने वीडियो में गंभीर बीमारी ‘स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी’ से पीड़ित लोगों और दृष्टिहीन व भेंगापन झेल रहे व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाया। कोर्ट ने कहा कि यह केवल कुछ शब्द या वीडियो नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं पर चोट है।

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’ यानी गलत हाथों में ताक़त खतरनाक होती है। यही स्थिति सोशल मीडिया पर भी है। बिना सोचे-समझे बनाए गए कंटेंट से लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं। व्यू और लाइक्स की दौड़ में कई लोग यह भूल जाते हैं कि उनके मज़ाक से किसी की गरिमा आहत हो रही है। अदालत का आदेश इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। भारत हमेशा से संस्कारों वाला देश रहा है। यहां परंपरा है कि बच्चों को सिखाया जाता है कि किसी को उसकी कमी से न पुकारो। संवेदनशीलता हमारी संस्कृति की पहचान है, पर आज सोशल मीडिया के समय में कुछ कॉमेडियन व इन्फ्लुएंसर इस मूल भावना को ही भूल गए हैं। वे लाफ्टर के नाम पर ऐसे कंटेंट बना रहे हैं, जो न तो नैतिक है, न ही भारतीय समाज की आत्मा से मेल खाता है।

आँकड़े बताते हैं कि भारत में करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। जब एक वीडियो दस लाख दर्शकों तक पहुँचता है तो उसका असर भी दस लाख पर पड़ता है। यह असर भावनात्मक भी है और सामाजिक भी। कई बार इस तरह का मज़ाक आर्थिक नुकसान, सामाजिक दूरी और मानसिक पीड़ा का कारण भी बन जाता है। शोहरत अगर अपमान से आती है तो वह स्थायी नहीं होती। सम्मान वहीं टिकता है जहां संवेदनशीलता और जिम्मेदारी हो।

डिजिटल दुनिया का दायरा बहुत बड़ा है। विश्व में दो अरब से अधिक कंटेंट क्रिएटर्स हैं। भारत में इनकी संख्या लाखों में है। करोड़ों लोग रोज सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। बड़े सितारे करोड़ों फॉलोअर्स रखते हैं। जब इतना बड़ा मंच मौजूद हो तो एक छोटा-सा वीडियो भी करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है। ऐसे में मज़ाक की सीमा तय करना जरूरी हो जाता है। कुछ बुनियादी मानक मदद कर सकते हैं।

पहला है मंशा। क्या इरादा सच में अपमान करना था या केवल हंसी बाँटना? दूसरा है लक्ष्य। क्या मज़ाक मज़बूर और हाशिये पर खड़े समूह पर किया गया? तीसरा है पहुंच। वीडियो कितने लोगों ने देखा व कितनी बार साझा हुआ? चौथा और आखिरी है असर। मज़ाक से भावनात्मक, सामाजिक या आर्थिक नुकसान कितना हुआ? इन चार बिंदुओं से तय किया जा सकता है कि कोई मज़ाक सीमा लांघ रहा है या नहीं।

अब सबसे बड़ा सवाल है समाधान क्या है। पहला कदम है स्पष्ट नियम बनाना और उन्हें सख्ती से लागू करना। दूसरा कदम है शिक्षा। कंटेंट क्रिएटर्स को यह सिखाना होगा कि लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। तीसरा कदम है प्लेटफार्म की जवाबदेही। अगर कोई नियम तोड़े तो प्लेटफार्म को कार्रवाई करनी होगी। चौथा कदम है समाज की समझ। हमें फर्क करना होगा कि कौन-सा मज़ाक मनोरंजन है और कौन-सा अपमान।

अदालत का आदेश केवल कानून का मामला नहीं है। यह मानवीय संवेदनशीलता का संदेश है। स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि हम दूसरों की गरिमा तोड़ें। असली स्वतंत्रता वह है, जिसमें सभी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। अगर हम सब मिलकर एक संवेदनशील डिजिटल संस्कृति बना सकें तो यही सबसे बड़ी जीत होगी। छोटे-छोटे कदम बड़ा फर्क ला सकते हैं और यह समाज को ज़्यादा मानवीय, समझदार और न्यायपूर्ण बनाएगा। आखिरकार, हर हंसी का हिसाब होता है। सही हंसी वही है जिसमें किसी की आत्मा पर चोट न हो।