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स्कूलों का खुलना और अभिभावकों की चिंता

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया स्कूल खोलने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि जिन इलाकों में संक्रमण दर कम है, वहां स्कूल खोलने में हर्ज नहीं है।
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स्कूलों का खुलना और अभिभावकों की चिंता

स्कूलों का खुलना और अभिभावकों की चिंता

देश में कोरोना के लगातार घटते नए मामलों के बीच स्कूलों में चहल-पहल लौटने के आसार नजर आ रहे हैं। कुछ राज्यों में बड़ी कक्षाओं के लिए स्कूल खुल चुके हैं, तो कुछ में इन्हें सभी कक्षाओं के लिए खोलने की तैयारी चल रही है। दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्य स्कूल खोलने से हिचक रहे हैं। दिल्ली सरकार बच्चों और शिक्षकों के टीकाकरण के बाद ही स्कूल खोलना चाहती है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया स्कूल खोलने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि जिन इलाकों में संक्रमण दर कम है, वहां स्कूल खोलने में हर्ज नहीं है। कोरोना काल में ज्यादातर राज्य सरकारें बड़े बच्चों के स्कूल खोलने को तरजीह देती रही हैं और छोटे बच्चों यानी नर्सरी से 5वीं या 8वीं तक के स्कूल खोलने से बचती रही हैं।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के प्रमुख डॉ. बलराम भार्गव ने हाल ही सुझाव दिया है कि कुछ एहतियात के साथ पहले प्राथमिक स्कूल खोले जा सकते हैं। माध्यमिक स्कूल बाद में खोले जाने चाहिए। उनके सुझाव के पीछे वैज्ञानिक आधार यह है कि छोटे बच्चे वायरस का मुकाबला करने में सक्षम होते हैं। सीरो सर्वे में पाया गया कि 6 से 9 साल के बच्चों में करीब-करीब उतनी ही एंटीबॉडी होती हैं, जितनी बड़ों में। एम्स व आइसीएमआर के सुझावों के बावजूद अभिभावकों की चिंताएं दूर नहीं हुई हैं। उन्हें यह सवाल घेरे हुए है कि क्या तीसरी लहर की आशंकाओं के बीच स्कूल खोलना सुरक्षित रहेगा? ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक है। नए मामलों का ग्राफ भले गिरा हो, कोरोना का खतरा टला नहीं है। डेल्टा वेरिएंट को लेकर अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में फिर बढ़ते मामले भारत के लिए भी खतरे के संकेत हैं। स्कूल खोलने के मामले में यह फूंक-फूंक कर कदम रखने का समय है। केंद्र व राज्य सरकारें चिकित्सा विशेषज्ञों से परामर्श कर ही इस दिशा में कदम उठाएं। शिक्षा विशेषज्ञों की यह चिंता अपनी जगह सही है कि पिछले सवा साल में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों पर काफी असर डाला है, पर इस दौरान कोरोना की दो लहरों ने जो कहर ढाया, उसे देखते हुए बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि थी। ऑनलाइन पढ़ाई बेहतर विकल्प साबित हुई है।

जहां स्कूल फिलहाल नहीं खुल रहे हैं, वहां ऑनलाइन पढ़ाई जारी रहनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बड़े शहरों की तरह छोटे गांव-कस्बों के बच्चों को भी लैपटॉप, स्मार्टफोन, नेटवर्क आदि की सुविधाएं मिलें, ताकि वे ऑनलाइन पढ़ाई से वंचित न रहें। जहां स्कूल खोले जा रहे हैं, वहां बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। कक्षाओं में सोशल डिस्टेंसिंग और अन्य एहतियात का पालन बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। छोटे बच्चों को छह फीट की दूरी पर बैठाना, लम्बे समय तक मास्क पहनाए रखना और बार-बार हाथ धुलवाना स्कूल प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा। बच्चों के समूह को अलग-अलग पारी में बुलाकर यह मुश्किल कम की जा सकती है।