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किसी ने शायद सोचा नहीं होगा कि कुछ साल पहले तक जिस सोशल मीडिया को लोग सिर आंखों पर बैठा रहे थे वही सोशल मीडिया अपनी ‘स्वच्छंदता’ के कारण विश्व भर में चिंता का विषय बन जाएगा। विशेष तौर से जब से सोशल मीडिया में चलने वाली फेक न्यूज ने दुनिया भर में उथल-पुथल मचाना शुरू कर दिया। यहां तक कि अमरीका, जर्मनी सहित कई देशों में तो इन झूठे समाचारों ने पूरे देश की राजनीति तक को प्रभावित कर दिया है। कई जगह झूठे समाचारों और अफवाहों ने दंगे करवा दिए तो कई जगह शेयर मार्केट को धराशाई कर दिया। हालत यहां तक पहुंच गई कि अब तो सोशल मीडिया की अग्रणी कंपनी फेसबुक को विज्ञापन जारी करके उपभोक्ताओं को फर्जी खबरों से आगाह करना पड़ा। एक तरह से यह स्वीकार करना पड़ा कि वह स्वयं फर्जी खबरों पर रोक लगाने में अक्षम है इसलिए उपयोगकर्ताओं को ही सजग होना होगा।
सोशल मीडिया पर जब फर्जी खबरें चलती हैं और उपयोगकर्ता बिना सोचे समझे उन्हें अपने मित्रों को फॉरवर्ड कर देते हैं तो अंजाम कुछ भी हो सकता है। कभी भी ऐसी घटनाएं हो सकती हैं जिनकी चपेट में हम, हमारा परिवार, शहर या देश की जनता आ सकती है। इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया पर खबरें देखते समय यह अवश्य देखा जाए कि खबर किसी विश्वसनीय सूत्र से आई है या नहीं। विश्वसनीय स्रोत से आने वाली खबर को ही आगे फॉरवर्ड किया जाना चाहिए। अन्यथा हमारी जरा सी चूक कभी भी अनर्थ कर सकती है।
सोशल मीडिया को आज बहुत से लोग मीडिया का ही एक रूप मानने लगे हैं। सवाल यह है कि इसे मीडिया माना भी जाए या नहीं। आजकल जिस तरह अपमान की भाषा सोशल मीडिया में सुनाई दे रही है उसकी तो पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अगर इस तरह की भाषा हमारा मेनस्ट्रीम का मीडिया बोलने लगे तो क्या आप, हम या कोई भी उसे सहन करेगा? मेनस्ट्रीम मीडिया से एक विशेष प्रकार के अनुशासन की अपेक्षा की जाती है। उसकी लिखी एक-एक पंक्ति पर समाज और सरकारी नियम-कायदों की नजर होती है। वह स्वयं संविधान के दायरे में बंधा होता है। जबकि सोशल मीडिया एक तरह का अनुशासनहीन मीडिया है उस पर किसी भी तरह का अंकुश या बंदिश नहीं है। ना समाज की और न ही कानून की। यही वजह है इसमें कोई भी कुछ भी लिख देता है और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
दो दिन पूर्व उच्चतम न्यायालय ने भी सोशल मीडिया पर चलने वाली अभद्र भाषा पर टिप्पणी की है और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय करने के लिए मामले को संविधान पीठ को भेजने का निर्णय किया है। लेकिन अभद्र भाषा से भी ज्यादा गंभीर है झूठ का प्रचार। कहा तो यह जाता है कि झूठ के पांव नहीं होते पर आज ‘फर्जी सूचनाओं’ के रूप में झूठ के पांव उगाए जा रहे हैं। इन्हें सच जैसा बनाकर फैलाया जा रहा है। इंटरनेट का उपयोग करने वाली बड़ी आबादी इस झूठ को सत्य मान लेती है, जिससे रोज बड़े-बड़े खतरे खड़े हो रहे हैं।

Published on:
07 Oct 2017 09:58 am
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