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हिमखंडों के पास बनने वाली झीलों पर गंभीर अध्ययन की जरूरत

डॉ. अनिल पी. जोशी, पर्यावरण विशेषज्ञ

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धराली की हालिया घटना ने एक बार फिर 2013 की केदारनाथ त्रासदी की भयावह यादें ताजा कर दीं। यह हादसा कई मायनों में उस त्रासदी से मिलता-जुलता है। खासतौर पर तब, जब इस क्षेत्र में 24 घंटे के भीतर मात्र 27 से 30 मिलीमीटर वर्षा रिकॉर्ड की गई हो तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फ्लैश फ्लड नहीं था, बल्कि इसके पीछे कुछ अन्य कारण रहे होंगे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक बार फिर पहाड़ों की दहाड़ और पीड़ा सामने आई और इस बार भी इसकी चपेट में स्थानीय लोग आ गए।

धराली, जो कभी जीवन से भरा था, अब वहां तबाही का मंजर नजर आता है। जितनी अजीब बात है कि वही जल, जो जीवन का स्रोत है, वही जीवन का विनाशक भी बन सकता है। यही विडंबना हमें हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्यों में देखने को मिल रही है। बीते वर्षों में इस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जो हमें यह सोचने को मजबूर करती हैं कि कुछ तो गड़बड़ है और यह भी स्पष्ट है कि इसके लिए पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को दोष नहीं दिया जा सकता। सवाल उठता है कि इतनी कम वर्षा के बावजूद इतना सारा पानी आखिर आया कहां से?

धराली के ऊपर के क्षेत्रों में अनेक हिमखंड (ग्लेशियर) मौजूद हैं, जो वर्षों से जमी झीलों का रूप ले चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये झीलें संभवत: लंबे समय से थमी हुई थीं और बारिश के दबाव या ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अनदेखे मौसमी परिवर्तनों के चलते अचानक टूट पड़ीं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश की मात्रा मापना कठिन होता है। संभवत: वहीं अत्यधिक वर्षा हुई, जिससे झीलों का संतुलन बिगड़ा और एक साथ अत्यधिक पानी व मलबा नीचे की ओर बह निकला, जिसने धराली को तबाह कर दिया।

यह कोई अकेली घटना नहीं है।

इससे पहले भी रेणी गांव की घटना, केदारनाथ की त्रासदी और हाल में हिमाचल प्रदेश में हुई घटनाएं हमें लगातार चेतावनी दे रही हैं। इन सभी का सबसे स्पष्ट संकेत यही है कि पहाड़ बेहद संवेदनशील होते हैं और अब जलवायु परिवर्तन की मार से और अधिक संवेदनशील हो चुके हैं। ग्लोबल वार्मिंग के चलते जब तापमान बढ़ता है, समुद्र गर्म होते हैं तो उससे उठने वाली आर्द्र हवाएं पहाड़ों में पहुंचती हैं और वहां भारी वर्षा का कारण बनती हैं। यह अनियमित और अत्यधिक बारिश बर्फ के रूप में भी जमा होती है और आगे चलकर तबाही का कारण बनती है। यही बर्फ के ग्लेशियर, जो कभी ‘वाटर बैंक’ थे, अब तबाही के कारण बन रहे हैं। प्रश्न यह है कि इसका दोष किसे दिया जाए? सच्चाई यह है कि सबसे पहले और सबसे बड़ी मार जलवायु परिवर्तन की पहाड़ों पर पड़ रही है। अब समय आ गया है कि इन घटनाओं पर समग्र और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां हिमखंड हैं और जहां उनकी तलहटी में मानवीय बस्तियां बसाई गई हैं।

वहां विशेष चेतावनी प्रणाली और अस्थायी पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि आपदा की स्थिति में जान-माल की हानि रोकी जा सके। साथ ही पूरे हिमालयी क्षेत्र में, विशेष रूप से हिमखंडों के पास बनने वाली झीलों की स्थिति पर एक गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। इन झीलों के टूटने की आशंका चाहे भारी बारिश हो या कम, दोनों परिस्थितियों में बनी रहती है। धराली और केदारनाथ की घटनाएं इसी का स्पष्ट उदाहरण हैं।

यह घटनाएं अब केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रह गई हैं। केरल सहित देश के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी त्रासदियां घट रही हैं और यह केवल भारत की समस्या नहीं है, बल्कि एक वैश्विक संकट बन चुकी है। आज जरूरत है कि हम सामूहिक रूप से सोचें कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। क्या हम अनजाने में प्रकृति को विनाश का आमंत्रण दे रहे हैं? अब वक्त है कि हम प्रकृति व उसके विज्ञान को समझने की ईमानदार कोशिश करें। केवल तभी हम आने वाले समय में अपने जीवन और भविष्य को सुरक्षित रख पाएंगे।