
trump jinping
वाइट हाउस में 24 सितंबर को जब डॉनल्ड ट्रंप और शी जिंगपिंग आमने-सामने होंगे, तो दुनिया की निगाहें केवल दो राष्ट्राध्यक्षों पर नहीं, बल्कि 21वीं सदी की निर्णायक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के अगले अध्याय पर होंगी। यह शी की लगभग एक दशक बाद पहली वाइट हाउस यात्रा होगी और इस वर्ष दोनों नेताओं की दूसरी शिखर-भेंट। मई में बीजिंग में हुई मुलाकात ने जिस 'रणनीतिक स्थिरता' की भाषा को जन्म दिया था, वाशिंगटन उसका अगला संस्करण तराशेगा।मगर इस मुलाकात को 'नई दोस्ती' की तलाश समझना शायद भूल होगी। असल सवाल यह होगा कि क्या दो प्रतिद्वंद्वी शक्तियां टकराव को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नियम बना सकती हैं, बिना अपनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा छोड़े। यही इस शिखर सम्मेलन की असली जिम्मेदारी होगी। सबसे पहले मेज पर व्यापार का मुद्दा होगा। पिछले वर्ष बनी अमरीकी-चीनी व्यापार-युद्धविराम व्यवस्था नवंबर में समाप्त होने वाली है। इसलिए 24 सितंबर की बातचीत में उसका विस्तार सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में होगा।
दोनों पक्ष लगभग 30-30 अरब डॉलर के सामान पर शुल्कों में संभावित कटौती और गैर-संवेदनशील वस्तुओं के व्यापार के लिए बनाए जा रहे तंत्र पर भी बातचीत कर रहे हैं। लेकिन यहां ट्रंप और शी की भाषा अभी तक अलग-अलग है। ट्रंप को ऐसे परिणाम चाहिए जिन्हें अमरीकी घरेलू राजनीति में आसानी से दिखाया जा सके जैसे अमरीकी कृषि उत्पादों व बोइंग विमानों की खरीद, चीन का बाजार खोलना।मई में चीन ने 200 बोइंग विमानों की प्रारंभिक खरीद तथा 2026-28 के दौरान सालाना कम-से-कम 17 अरब डॉलर के अमरीकी कृषि उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता जताई थी। शी की दृष्टि अधिक संरचनात्मक होगी। उनके लिए असली सौदा विमान या सोयाबीन की खेप में नहीं, बल्कि परस्पर निर्भरता की शर्तों में छिपा होगा। इस वार्ता का विस्फोटक मुद्दा दुर्लभ खनिज व रेयर-अर्थ मैग्नेट होंगे।
आधुनिक इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर मिसाइलों, रोबोटिक्स, चिप निर्माण और उन्नत रक्षा प्रणालियों तक सभी में इन खनिजों की आपूर्ति अब केवल व्यापार का प्रश्न नहीं रही। चीन ने इनके निर्यात पर नियंत्रण से यह दिखाया है कि वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाएं भी भू-राजनीतिक शक्ति का हथियार बन सकती हैं। अमरीका इस पर आपूर्ति-सुरक्षा और लाइसेंसिंग चाहता है जबकि चीन अमरीकी तकनीकी निर्यात-नियंत्रणों में राहत चाहता है। दोनों के हाथ में दूसरे की अर्थव्यवस्था के संवेदनशील नब्ज को दबाने की क्षमता है। शिखर वार्ता का तीसरा बड़ा मोर्चा कृत्रिम बुद्धिमत्ता होगा। अमरीका और चीन अब केवल बाजारों के लिए नहीं, बल्कि अगली तकनीकी सभ्यता की वास्तुकला के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। कौन उन्नत एआइ मॉडल बनाएगा? किसके पास विशाल कंप्यूटिंग क्षमता होगी? चिप्स और डेटा पर किसका नियंत्रण होगा? और एआइ के सैन्य उपयोग की सीमाएं कौन तय करेगा? यहीं प्रतिस्पर्धा और सहयोग का विचित्र सह-अस्तित्व बनाना होगा।
दोनों पक्षों को एक-दूसरे को तकनीकी बढ़त देने से बचकर, अनियंत्रित एआइ जोखिमों पर संवाद के लिए कुछ मापदंड बनाने होंगे। यदि व्यापार बातचीत का कठिन विषय है, तो ताइवान रणनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील मुद्दा रहेगा। चीन ताइवान के प्रश्न पर अमरीकी भाषा में अधिक स्पष्टता चाहता है, जबकि अमरीका अपनी दीर्घकालिक 'रणनीतिक अस्पष्टताÓ को बदलने से बचेगा। इस शिखर सम्मेलन की मेज पर ईरान भी मौजूद रहेगा।
ट्रंप बीजिंग से ईरान के संदर्भ में सहयोग या संयम की अपेक्षा करते हैं। चीन के लिए यह केवल ईरान का सवाल नहीं बल्कि तेल, ऊर्जा सुरक्षा व पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ती भूमिका का बड़ा प्रश्न है। यानी वाशिंगटन-बीजिंग की प्रतिस्पर्धा का भूगोल अब एशिया से बढ़कर वैश्विक हो चुका है। दुनिया को दो महाशक्तियों के बीच सहयोग चाहिए, पर दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है। ट्रंप-शी संबंध अब उस पुराने प्रश्नों से आगे निकल चुके हैं कि 'कौन जीतेगा?' 24 सितंबर का सवाल यह नहीं होगा कि ट्रंप और शी एक-दूसरे से कितने करीब आए। सवाल यह होगा कि वे कितनी दूर तक बिना टकराए समानांतर दिशा में चल सकते हैं।
पूर्व प्रोफेसर अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जेएनयू,
नई दिल्ली
Updated on:
24 Sept 2026 05:51 pm
Published on:
24 Sept 2026 05:51 pm
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