12 जून 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भारत आज भी नहीं भूला 26 अगस्त 1978 की वो रात! रंगा-बिल्ला कांड की दहला देने वाली कहानी फिर चर्चा में

Raakh true story: क्राइम सीरीज 'राख' के पीछे की असली कहानी एक दिलचस्प और अपराध से जुड़ी है, क्योंकि 26 अगस्त 1978 रंगा-बिल्ला का मामला समाज में एक बड़ा सनसनीखेज विषय बन गया था, जहां परिवार के अंदर झगड़े, सामाजिक दबाव और राजनैतिक प्रभाव चर्चा का केंद्र थे।

2 min read
Google source verification
भारत आज भी नहीं भूला 26 अगस्त 1978 की वो रात! रंगा-बिल्ला कांड की दहला देने वाली कहानी फिर चर्चा में

क्राइम सीरीज 'राख' (this photo from x:@indiaforums)

Raakh true story: OTT प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो की नई क्राइम सीरीज 'राख' 12 जून को प्रीमियर हुई और दर्शकों को 1970 के दशक की दिल्ली की उन गलियों में ले जाती है जहां भारत का एक सबसे दर्दनाक अपराध हुआ था। प्रोसित रॉय के निर्देशन में बनी इस सीरीज में अली फजल, सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर हैं। इसकी कहानी भारत के सबसे डरावने क्रिमिनल केस में से एक 1978 में भाई-बहन गीता और संजय चोपड़ा की किडनैपिंग और हत्या से जुड़ी है।

आखिर ऐसा क्या हुआ 26 अगस्त 1978 की रात

गीता चोपड़ा 16 साल की और उनके छोटे भाई संजय 14 साल के थे। दोनों दिल्ली के एक नेवी परिवार से थे। उस शाम दोनों ऑल इंडिया रेडियो पर एक युवा कार्यक्रम में हिस्सा लेने निकले। दिल्ली में भारी बारिश थी और रास्ते में दोनों ने एक लिफ्ट ली और फिर कभी घर नहीं लौटे। दरअसल, जब परिवार ने उस रात रेडियो पर गीता की आवाज सुनने के लिए ट्यून किया तो वो ऑन एयर नहीं थी। चिंता घबराहट में बदली और पुलिस की तलाश शुरू हुई।

रंगा और बिल्ला दो क्रिमिनल का काला खेल

जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला और कुलजीत सिंह उर्फ रंगा दोनों छोटे-मोटे अपराधी थे जो हाल ही में जेल से रिहा हुए थे। वे फिरौती के लिए किडनैपिंग की योजना लेकर दिल्ली में घूम रहे थे और भाई-बहन उनकी गाड़ी में आ गए। बता दें, उस रात दोनों बच्चों को दिल्ली छावनी के पास एक सुनसान इलाके में ले जाया गया। गवाहों ने बाद में बताया कि उन्होंने बच्चों को कार से मदद मांगते देखा था, लेकिन जो फिरौती से शुरू हुआ वो हत्या पर खत्म हुआ। दोनों बच्चों की लाशें बुद्ध जयंती पार्क के पास मिलीं और भी दो दिन बाद एक मवेशी चरवाहे ने उन्हें ढूंढा था।

इतना ही नहीं, इस गुनाह को अंजाम देते हुए रंगा और बिल्ला लगभग 2 हफ्ते तक भागते रहे। कालका मेल में सेना के डिब्बे में घुसने पर संदेह हुआ। तब अखबारों में छपी तस्वीरों से पहचान हुई और दिल्ली पहुंचते ही दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। ये मुकदमा भारत के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक बना। दोनों को मौत की सजा सुनाई गई और 31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में फांसी भी दे दी गई।

बच्चों के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार हर साल दिया जाने लगा

इसके बाद गीता और संजय चोपड़ा को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। दरअसल, सीरीज 'राख' इस दर्दनाक इतिहास को पर्दे पर उतारने की एक कोशिश है, जो ये याद दिलाती है कि कुछ जख्म कभी नहीं भरते।