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पढि़ए…पाली की पॉलिटिक्स के अंदरूनी किस्से…

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पाली

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Suresh Hemnani

May 14, 2019

Politics Special Column In Pali

पढि़ए...पाली की पॉलिटिक्स के अंदरूनी किस्से...

-तूफानी मौसम में शांत सियासत

-राजेन्द्रसिंह देणोक
पाली। ऐसी कहावत है कि जब भी तूफान की आहट होती है तो पहले का माहौल ऊपरी तौर पर एकदम शांत दिखाई पड़ता है। यही हाल इन दिनों pali की सियासत में नजर आ रहा है। Lok Sabha Elections के बाद से सन्नाटा पसरा हुआ है। कहीं कोई हलचल नहीं। न सत्ता में और न ही विपक्ष में कोई उठापटक। ऐसा लग रहा है कि मानो जैसे वाकई में कोई तूफान आने वाला हो। वैसे, भी इन दिनों मौसम तूफानी हो रखा है। रात होते ही तेज अंधड़ शुरू हो जाता है। बिजली गुल होती है तो नींद में खलल पडऩा भी स्वाभाविक है। सियासत में भी अंदर खाने कुछ ऐसा ही चल रहा है। तूफान से पहले की शांति ने कइयों की नींद उड़ा रखी है। सबको चिंता है 23 के दिन के Elections result की। परिणाम आशानुरूप नहीं रहे तो कई नेताओं की चमक फीकी पडऩी तय है।

चिंता सिर्फ परिणाम की, पानी की नहीं
पाली की जनता को इन दिनों सबसे ज्यादा चिंता अपने हलक तर करने की है। चिंता तो सियासत में भी है। लेकिन, यहां पानी की नहीं, चुनावी परिणाम की है। पानी वाला महकमा नित नए प्रयोग जरूर कर रहा है। लेकिन नेताजी और उनके जैकारे लगाने वाले कार्यकर्ताओं की टोलियां पर्दे से पूरी तरह से गायब है। 29 April से पहले तक तो हर गली-नुक्कड़ पर सफेदजख कुर्ता-पायजामा पहने नेताजी और उनके सागिर्द चक्कर काटने कई दिन तक नजर आ रहे थे। अब उन्हें झांकने तक की फुर्सत नहीं। Cloth town पहले ही Pollution की समस्या के दुख में दुबली हो रही। ऊपर से पानी की चिंता सो अलग। अब कपड़ा नगरी के बाशिंदे करे तो भी क्या? वोटों की फसल तो पानी का संकट मुखर होने से पहले ही कट गई। पीड़ा झेलने के सिवाय अब कोई चारा भी तो नहीं।

अब चंद दिन शेष...कौन किसे निपटाएगा?
हाथ वाली पार्टी में कई नेता अब एक-दूसरे को ‘निपटाने’ की पूरी तैयारी में है। Assembly elections के चार महीने बाद ही देश की पंचायत के चुनाव आ गए। इसलिए मजबूरी में सबने अपने-अपने जख्म छिपा लिए। अब परिणाम आने तक की देर है। अंदर ही अंदर सबको खबर है कि परिणाम क्या रहेंगे? फिर भी कइयों ने कुछ दिन और चुप्पी साध रखी है। मूंछों वाले नेताजी भी खार खाए बैठे हैं। परिणाम उलट-सुलट रहे तो वे भी हिसाब चुकता करेंगे। संगठन की कुर्सी पर जमे नेताजी पर कइयों का गुबार फूटने वाला है। इन नेताजी ने अपना पाया तो मजबूती से पकड़ रखा है। फिर भी उन पर कइयों की नजरें है। हाथ वाली पार्टी में अब यहां सत्ता-संगठन में सीधा टकराव होगा। कौन भारी पड़ेगा? कौन किसे निपटाएगा? इसके खुलासे में अब चंद दिन ही शेष है।