
फोटो- पत्रिका
पाली। एक समय केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित माना जाने वाला दूध आज ग्रामीण और शहरी परिवारों की आर्थिक मजबूती का आधार बन गया है। जिले में कई लोगों के जीवन की दिशा पशुपालन और दुग्ध उत्पादन ने बदल दी है। किसी ने सरकारी नौकरी के साथ पशुपालन अपनाकर नई कहानी लिखी तो कहीं महिलाओं ने बंद पड़ी दुग्ध समिति को फिर से शुरू कर आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। विश्व दुग्ध दिवस पर हम आपको ऐसी ही कहानियां बता रहे हैं, जो यह बताती हैं कि दूध केवल शारीरिक पोषण का माध्यम नहीं, बल्कि समृद्धि का सशक्त जरिया भी है।
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जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में सहायक अभियंता पद पर रहे हरिराम चौधरी ने सात वर्ष पहले गौपालन की शुरुआत की थी। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उनके पास 50 गायें हैं। इन गायों के दूध से वे परंपरागत बिलौना पद्धति से घी तैयार करते हैं, जिसकी मांग बैंगलूरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे महानगरों तक है। वे दूध का विक्रय भी करते हैं। हरिराम बताते हैं कि उनके बुजुर्ग खेती और पशुपालन से जुड़े रहे हैं, इसलिए उन्होंने भी इस क्षेत्र में कदम रखा। बेहतर देखभाल के कारण उनकी गायें औसतन 6 से 7 लीटर दूध देती हैं। बिलौने का घी 1200 से 1500 रुपए प्रति किलो तथा दूध 70 से 80 रुपए प्रति लीटर तक बिकता है। उनका बेटा भी इसी क्षेत्र में कदम बढ़ा रहा है।
पाली के बेडकलां गांव में महिला दुग्ध समिति ने ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति में नया बदलाव लाया है। करीब 20 साल तक बंद रहने वाली समिति को गांव की ममता ने 19 अक्टूबर 2024 को डेयरी की विजयलक्ष्मी के कहने पर फिर शुरू किया। वर्तमान में समिति से 80 महिलाएं जुड़ी हुई हैं, जो प्रतिदिन 400 लीटर से अधिक दूध का उत्पादन करती हैं। इससे प्रत्येक महिला को औसतन 10 से 15 हजार रुपए मासिक आय प्राप्त हो रही है।
दांतीवाड़ा की दुग्ध समिति महिलाओं के सशक्तीकरण का उदाहरण है। गांव में करीब 100 महिलाएं समिति से जुड़ी हैं और कई महिलाएं प्रतिमाह 18 हजार रुपए तक की आय अर्जित कर रही हैं। समिति सदस्य तुलसी और लालकी प्रतिदिन 40 से 50 लीटर तक दूध का उत्पादन करती हैं। इनके जैसी अनेक महिलाएं पशुपालन से अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं। इनमें से कई महिलाओं के बच्चे आज अपनी माताओं के साथ दूध उत्पादन कर इसे व्यवसाय के रूप में अपना चुके हैं।
Updated on:
01 Jun 2026 05:01 pm
Published on:
01 Jun 2026 05:01 pm
