
तीन मंत्री-एक उप मुख्य सचेतक, फिर भी नासूर बना प्रदूषण
राजेन्द्रसिंह देणोक
पाली. केन्द्र में एक और सूबे की सरकार में दो मंत्री तथा एक उप मुख्य सचेतक। फिर भी प्रदूषण की समस्या पाली के लिए नासूर बन गई। वसुंधरा सरकार में पाली का प्रतिनिधित्व कर रहे मंत्रियों को शायद ही किसान-उद्यमियों की समस्या से कभी सरोकार रहा हो। कैबिनेट मंत्री सुरेन्द्र गोयल हो चाहे ऊर्जा राज्य मंत्री पुष्पेन्द्रसिंह राणावत या उप मुख्य सचेतक मदन राठौड़। प्रदूषण की समस्या के स्थायी समाधान के लिए वे सिद्दत से कभी आगे नहीं आए। यहां तक की प्रभारी मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने भी यहां का दर्द महसूस करने का प्रयास नहीं किया।
अब सत्ता में वापसी के लिए अगले माह मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सुराज गौरव यात्रा के नाम पर पाली आ रही है। किसानों के आक्रोश का भय सरकार को सताने लगा है।
इसलिए मुख्यमंत्री के निर्देश पर राज्यमंत्री राणावत ने पहली बार बांडी नदी और नेहड़ा बांध का जायजा लिया। उप मुख्य सचेतक राठौड़ ने कुछ मौकों पर जरूर मरहम लगाने का प्रयास किया था, लेकिन ये प्रयास भी पाली के लिहाज से नाकाफी ही रहे हैं।
कब-कब किसने समझी पीड़ा
ठ्ठ वर्ष २००३ में खारची से विधायक बने खुशवीरसिंह और रायपुर विधायक सीडी देवल ने विधानसभा में किसानों का मुद्दा उठाकर सरकार से समाधान करने का अनुरोध किया था।
ठ्ठ वर्ष २००३ में भाजपा सरकार में पर्यावरण मंत्री रहे लक्ष्मीनारायण दवे ने कई बार बांडी-नेहड़ा का जायजा लिया। उन्होंने अधिकारियों को भी कपड़ा उद्योग पर पर्याप्त मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए थे।
ठ्ठ वर्ष २००८ में कांग्रेस सरकार की काबिना मंत्री बीना काक ने किसानों की मांग पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष को हालात का जायजा लेने पाली भेजा था। उस दौरान करीब २० दिन तक फैक्ट्रियां भी बंद कराई गई।
ठ्ठ तत्कालीन सांसद बद्रीराम जाखड़ ने सीइटीपी से इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि सीइटीपी नियमों के तहत नहीं चल रहा। एेसे संस्थान में वे सदस्य नहीं रह सकते।
इसलिए ये हुआ हश्र
ठ्ठ कपड़ा उद्योग का सालाना टर्नओवर दस करोड़ से आधा हो गया।
ठ्ठ २४ घंटे चलने वाली फैक्ट्रियां अब १२ घंटे ही चल रहीं। वह भी सप्ताह में पांच दिन।
ठ्ठ पुनायता औद्योगिक क्षेत्र की २१५ फैक्ट्रियों पर ताला लटका। ५७ अन्य बड़ी फैक्ट्रियां भी बंद हुई।
ठ्ठ २५ से ३० बड़े उद्यमी अन्य शहरों में शिफ्ट हुए। करीब डेढ़ सौ उद्यमियों ने धुलाई इत्यादि कार्य अन्य शहरों में शुरू किया।
ठ्ठ मानसिक प्रताडऩा झेलने के लिए मजबूर।
यहां के मंत्री-विधायक इत्तफाक नहीं रखते, पड़ौसी उठा रहे मुद्दा
पाली जिले की छहों सीटों पर भाजपा काबिज है। छह में से दो मंत्री और एक को मंत्री का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद स्थानीय मंत्री और विधायक किसानों की पीड़ा नहीं समझ रहे। जलदाय मंत्री सुरेन्द्र गोयल अपनी जैतारण विधानसभा तक सिमटे हुए हैं। वहीं ऊर्जा राज्य मंत्री पुष्पेन्द्र राणावत बाली और विधानसभा में उप मुख्य सचेतक मदन राठौड़ सुमेरपुर विधानसभा से बाहर इत्तफाक नहीं रखते। पाली विधायक ज्ञानचंद पारख, सोजत विधायक संजना आगरी और मारवाड़ जंक्शन विधायक केसाराम चौधरी भी पुरजोर ढंग से कभी पैरवी नहीं कर रहे। पाली के विधायक उद्यमियों की पैरवी के लिए कई जरूर आगे आए हैं, लेकिन किसान को उनसे साथ न देने की अक्सर शिकायत रहती है। जबकि सिवाणा, लूणी और सांचौर के विधायकों ने प्रदूषण की समस्या को प्रमुखता से उठाया।
चुनावी लॉलीपोप पकड़ा गए थे गहलोत
एेसा भी नहीं है कि कपड़ा उद्योग की दुर्दशा के लिए मौजूदा सरकार ही जिम्मेदार है। पिछली कांगे्रस सरकार ने भी समस्या का हल निकालने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया था। चुनावी फायदा उठाने के खातिर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आचार संहिता से एक दिन पूर्व पाली में जेडएलडी के फोल्डर का विमोचन जरूर किया था। अगले ही दिन आचार संहिता लागू हो गई। चुनाव में गहलोत सरकार का सफाया हो गया। तब से जेडएलडी का निर्णय खटाई में पड़ा है। नई सरकार ने जेडएलडी लगाने पर भी कोई कदम नहीं उठाया।
जनप्रतिनिधियों ने कभी नहीं समझा हमारा दर्द
& यहां के जनप्रतिनिधियों ने कभी भी इस पीड़ा को नहीं सुना-समझा। मौजूदा सरकार में पाली जिले के तीन जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व है। इसके बावजूद किसानों की पीड़ा जानने के लिए वे कभी आगे नहीं आए। सरकार और जनप्रतिनिधि चाहते तो इसका समाधान कभी हो सकता था। सत्ता की विमुखता के कारण हमें न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
महावीरसिंह सुकरलाई व पुखराज पटेल, किसान पर्यावरण संघर्ष समिति
Published on:
01 Aug 2018 12:21 pm
