
राजेन्द्रसिंह देणोक/ओम टेलर
पाली। शहर इन दिनों चुनावी माहौल में रंगा हुआ है। होर्डिंग पोस्टर, बैनर-झण्डे हर जगह नजर आ रहे हैं। चाय की थडिय़ों से लेकर ऑफिस के गलियारों तक सिर्फ सियासत की ही चर्चा है। किसकी सरकार बनेगी, कौनसा उम्मीदवार जीतेगा, जीत का समीकरण क्या रहेगा, हर किसी की जुबां और कान यही कहने-सुनने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इससे इतर पत्रिका टीम ने कुछ ऐसे इलाकों में जानना तय किया जहां न सरकारें बदलने का कोई प्रभाव धरातल पर नजर आता और न चुनावी सुर्खियों का। टीम ने सियासत के नजरिए से कच्ची बस्तियों की नब्ज टटोली।
अपराह्न कोई साढ़े तीन बजने को थे। हमने रामलीला मैदान से सटी शहीद नगर कच्ची बस्ती का रुख किया। नाम तो ऐसा कि सुनते ही सीना चौड़ा हो जाए, लेकिन बस्ती के हालात ऐसा करने को तनिक भी इजाजत नहीं देते। बस्ती में प्रवेश करने से पहले ही गली के कोने पर छोटी-सी दुकान चला रहे मुकेश से मुलाकात हुई। जैसे ही सियासत की बात छेड़ी मानो दुखती रग पर हाथ धर दिया हो। 22 साल के नौजवान मुकेश ने दर्जनों समस्याएं एक साथ गिना दी।
उसका कहा कि कोई चालीस-पैंतालीस साल पहले उसके पिता यहां आकर बसे थे। तब से लेकर आज तक बस्ती वैसी ही है। बिजली-पानी मिल और सीवरेज की लाइन जरूर बिछ गई। मुकेश को गुस्सा इस बात काभी है कि घरों के पट्टे अब तक नहीं बने। बातचीत सुन कई महिलाएं एकत्रित हो गई। सभी का एक ही स्वर में कहना था कि दयनीय जिंदगी की इंतहा है। लालाराम का गुस्सा भी सातवें आसमान पर था। यहां के लोगों की पीड़ा केवल पट्टे ही नहीं, रोजगार की भी बड़ी समस्या है। करीब डेढ़ सौ घरों की बस्ती के ज्यादातर लोग कमठा या दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। कई बार रोजगार का भी संकट रहता है। इससे बस्ती के लोगों का जीवन स्तर कभी नहीं बदल पाया। पतली गलियों में घूमे तो घरों के टिन-टप्पड़ साफ इशारे कर रहे थे कि सियासत की नजर सिर्फ वोटों पर ही रही है।
पांच दशक में 15 सरकारें बदलीं, पाली में पांच जनप्रतिनिधि
शहीद नगर और चारणिया कच्ची बस्ती पांच दशक पहले बसी थीं। पचास साल के इस सफर में प्रदेश में पन्द्रह सरकारें बदल गईं तो पाली में पांच जनप्रतिनिधि। इतना ही नहीं, कस्ती बस्ती के लोग आठ चुनावों का हिस्सा भी बन चुके हैं। इसके उपरांत लोकतंत्र के मायने अब भी उनकी समझ से परे हैं। शहर में ऐसी ही 26 बस्तियां और है। जिला कलक्टर पाली द्वारा वर्ष 1999 में चिह्नित कच्ची बस्तियों की अंतिम सूची वर्ष 2004 तक के अनुसार शहर में 28 कच्ची बस्तियां बसी हुई है। इन बस्तियों के बारे में शहर के हर व्यक्ति को भी जानकारी है। जनप्रतिनिधियों को भी, इसके बावजूद इन बस्तियों के हालात को सुधारने के लिए कोई विशेष प्रयास अब तक नहीं किए गए है।
बस्ती के ज्यादार रहवासी श्रमिक
शहर के पुराना बस स्टैंड के पास एक गली में घुसे तो मंदिर पर लिखे शब्दों से स्पष्ट हुआ कि यह चारणिया बस्ती है। पतली-सी गली में मोदी-वसुंधरा के मुखौटे लगाए चार-पांच बच्चे खेल रहे थे। बस्ती के निवासी युवा राहुल का कहना था कि यहां चारणिया समाज के 80 परिवार रहते हैं। ये पारंपरिक रूप से खेसले-पट्टू बनाने का काम करते थे। अब ज्यादातर फैक्ट्रियों में फोल्डिंग का काम करते हैं। ज्यादातर महिलाएं भी फैक्ट्रियां और घरों में मजदूरी करती है। राहुल को मलाल है कि कच्ची-बस्तियों के वोटों पर सबकी नजर रहती है, लेकिन उनकी पीड़ा कोई नहीं सुनता। उसका कहना है कि क्षेत्र में आवारा-गर्दी बढ़ गई। अंकुश लगाने के लिए बस्ती के प्रवेशद्वार पर लोहे का गेट लगाने की गुहार लगाई थी। कोई नहीं सुन रहा। नीरू के शब्दों में भी तल्खी इस बात की ही थी कि इन बस्तियों में कब बदलाव आएगा? यहां की महिलाओं को सफाई नियमित नहीं होने की भी शिकायत है।