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तीन गांव ऐसे भी- जहां बाहर निकलने के लिए केवल नाव का सहारा

मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में ऐसी तीन गांव है, जहां से आवागमन के लिए ग्रामीणों के पास नाव के अलावा कोई सहारा नहीं है।

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तीन गांव ऐसे भी- जहां बाहर निकलने के लिए केवल नाव का सहारा

तीन गांव ऐसे भी- जहां बाहर निकलने के लिए केवल नाव का सहारा

पन्ना. जहां आज के समय में लोग बस, टे्रन और हवाई जहाज के माध्यम से चंद मिनटों और घंटों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर लेते हैं। वहीं पन्ना जिले में ऐसे तीन गांव के सैंकड़ों ग्रामीण है, जिन्हें थोड़ी सी दूरी तय करने में भी घंटों समय लगता है। क्योंकि यहां से बाहर या शहर की ओर जाने के लिए सड़क मार्ग ही नहीं है। ऐसे में जहां ग्रामीण परेशान हैं, वहीं बच्चों पढ़ाई भी अटक रही है।

भले ही सरकार गांव गांव पहुंचमार्ग बनवाने,गांव के हर बच्चे को शिक्षा देने,एवं हर नागरिक को स्वास्थ्य व्यवस्थाएं मुहैया कराने की बात कर रही है। लेकिन मध्यप्रदेश के बेशकीमती हीरों की मशहूर नगरी पन्ना जिले की अंतिम छोर पर बसे ललार पंचायत में सरकार के सभी वादे ,घोषणाएं एवं सिस्टम की जिम्मेदारी खोखली नजर आती है। क्योंकि ललार पंचायत के तीन गांव के ग्रामीण आज भी नाव के सहारे गांव से कैन नदी पर आवागमन करने के लिए मजबूर है।

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पन्ना जिले ललार पंचायत के आदिवासी लोग नाव के सहारे सफर करने को मजबूर है। यह हालात सिस्टम पर कई सवाल खड़े करते हैं। क्योंकि एक नाव में कई लोग सवार होकर नदी पार करते हैं । यह पन्ना जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर केन नदी किनारे स्थित ललार पंचायत के निवासी है। जो रहते है जिले में है, लेकिन इनका जीवन यापन छतरपुर जिले से चलता है। ऐसे में नाव ही ललार पंचायत के अंतर्गत आने वाले तीन गांवों के ग्रामीणों के आवागमन का एक मात्र सहारा है। पन्ना और छतरपुर जिले के बीच कैन नदी से सटे पन्ना जिले की ग्राम पंचायत लालार सहित राजापुरवा,भवानीपुरवा, और टपरियां गांव के ग्रामीणों को शासन की बुनियादी सुविधाएओ का लाभ आजादी के बाद आज तक नही मिला। गांव में सड़क नहीं होने से ग्रामीण वर्षो से एक नाव का सहारा लेकर नदी पार कर रहे हैं। ऐसे में अगर कोई बीमार हो जाए तो इलाज कराने में कड़ी मश्क्कत करनी पड़ती है। पन्ना टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में बसे इन गावों से पन्ना शहर जाने के लिए सड़क नहीं है। पहले जो कच्ची सड़क थी , वह पन्ना टाइगर रिजर्व द्वारा बंद कर दी गई है। ललार गांव से छतरपुर की ओर जाने के लिए एक रपटा था, वह भी क्षतिग्रस्त हो चुका है, नदी के पानी में डूब चुका है। अब ऐसे में ग्रामीणों का जीवन संकट में आ है।

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इस गांव वालों को शहर जाने के लिए खुद तो नाव से सफर करना ही पड़ता है, साथ ही अपनी बाइक को भी नाव में रखकर ले जाना पड़ता है, क्योंकि शहर जाने के लिए कोई साधन नहीं होने के कारण ये ग्रामीण बाइक से ही शहर जाते हैं, ऐसे में आते जाते उन्हें अपने साथ ही बाइक को भी नाव का सफर कराना पड़ता है।

शिक्षा की अगर बात करें तो लालार गांव में 8 वीं तक ही स्कूल है। ऐसे में 8 वीं कक्षा के बाद बच्चे आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे है। गांव में जो लोग सक्षम है। वह जैसे तैसे बच्चों को बाहर भेजकर पढ़ा रहे हैं। लेकिन गरीब मध्यम वर्गीय परिवारों की दशा बद से बद्तर होती जा रही है। आज भी गांव में सैकड़ों बच्चे हैं, जिनकी पढ़ाई छूट चुकी है। बच्चे कहते हैं कि हम पढऩा चाहते हैं। लेकिन गांव में सड़क नही होने से पढ़ नहीं पा रहे है। नाव से नदी पार करना जो बड़े हादसे को न्योता देने से कम नही है। गरीब माता पिता मजबूर है अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को लेकर कई बार जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियों को आवेदन दिए है। लेकिन गांव की दशा और दुर्दशा की तरफ अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।


इस समस्या को सरकार तक पहुंचाकर कोई हल निकालने का प्रयास किया जाएगा।
-संजय कुमार मिश्र, कलेक्टर, पन्ना