
लौंडा नाच (फोटो-X@Rohini Acharya)
राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव द्वारा आयोजित कार्यक्रम में लोककला लौंडा नाच को लेकर उठे विवाद ने अब सियासी रंग ले लिया है। इस मामले में उनकी बेटी रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा पोस्ट कर आलोचकों को जवाब दिया है। रोहिणी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा पोस्ट लिखकर आलोचकों को जवाब दिया है। रोहिणी ने कहा कि इस पारंपरिक कला पर आपत्ति जताने वाले लोग बिहार की सांस्कृतिक विरासत से अनजान हैं और पूर्वाग्रह के आधार पर बयान दे रहे हैं।
रोहिणी आचार्य ने उन लोगों पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया जो राजकीय महोत्सवों में होने वाले फूहड़ प्रदर्शनों पर चुप रहते हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में कड़ा प्रहार करते हुए लिखा, 'सरकारी समारोहों और राजकीय महोत्सवों के मंचों पर बॉलीवुड के फूहड़ गानों पर अश्लील नृत्य की प्रस्तुति पर मौन रहने वाले लोगों को बयान देने से पहले ये जानना चाहिए कि लौंडा नृत्य बिहार और पूर्वांचल की एक पारंपरिक लोक नाट्य शैली है।'
रोहिणी ने इस बात पर जोर दिया कि यह नृत्य शैली केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि सामाजिक संदेश देने का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, विशेष रूप से शादियों और सामाजिक समारोहों के दौरान इसका आयोजना होता आया है। इसमें पुरुष कलाकार महिलाओं का वेश धारण कर नृत्य और अभिनय करते हैं।
रोहिणी ने इस कला के ऐतिहासिक महत्व को बताते हुए भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले महान लोक कलाकार दिवंगत भिखारी ठाकुर का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे भिखारी ठाकुर ने 'लौंडा नाच' की इस विधा को समाज सुधार का हथियार बनाया था। इस कला के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने दहेज प्रथा, ग्रामीण पलायन, शराबखोरी और महिलाओं की दुर्दशा जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को उठाया और उसे लोगों के बीच पहुंचाया।
बिदेसिया: इस नाटक के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने दुनिया का ध्यान पलायन की पीड़ा और उन महिलाओं के कष्टों की ओर खींचा, जिन्हें पीछे छोड़कर जाना पड़ता था और जो अलगाव तथा विरह की वेदना में जीवन बिताने को विवश थीं।
बेटी-बेचवा : इस नाटक के जरिए भिखारी ठाकुर ने उस समय समाज में फैली एक कुप्रथा 'बेमेल विवाह' (बेटी को किसी बुज़ुर्ग दूल्हे को बेचने की प्रथा) पर कड़ा प्रहार किया था।
इस नृत्य शैली के पीछे के ऐतिहासिक कारणों को समझाते हुए, रोहिणी ने लिखा कि यह परंपरा उस दौर में ज्यादा मशहूर हुई, जब महिलाओं के सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करने पर कड़े सामाजिक प्रतिबंध और रोक-टोक लागू थे। नतीजतन, पुरुषों ने महिलाओं का रूप धरकर इस कला का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।
रोहिणी आचार्य ने आगे कहा कि लालू प्रसाद यादव दशकों से इस लुप्त होती कला को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का यह प्रयास उनकी पहचान का एक अहम हिस्सा है। इसी वजह से लालू जी इस लोक परंपरा के प्रदर्शनों का आयोजन करते आ रहे हैं ताकि इसे विलुप्त होने से बचाया जा सके और साथ ही इसे सामाजिक संदेश देने का एक माध्यम भी बनाया जा सके। सच तो यह है कि लालू जी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं को बचाने के अपने समर्पण के लिए जाने जाते हैं।
मशहूर कलाकार और पद्म श्री से सम्मानित रामचंद्र मांझी का उदाहरण देते हुए रोहिणी ने आलोचकों को चुप कराने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि रामचंद्र मांझी जैसे कलाकारों ने 90 वर्ष की आयु तक इस परंपरा को जीवित रखने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह गौरव की बात है कि बिहार की इस कला को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक से नवाजा गया है।
रोहिणी ने यह भी बताया कि लौंडा नाच की पहचान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। कैरिबियन देशों (जैसे मॉरीशस, गयाना, त्रिनिदाद) में आज भी इस कला का आयोजन गर्व के साथ किया जाता है, जहां बड़ी संख्या में भोजपुरी भाषी लोग रहते हैं। उन्होंने साफ कहा कि जिन्हें बिहार की सांस्कृतिक जड़ों की जानकारी नहीं है, वही इसे गलत नजरिए से देख रहे हैं, जबकि यह बिहार की अस्मिता की पहचान है।
Published on:
03 Apr 2026 12:52 pm
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