30 मई 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बिहार के 42 विधायकों को हाई कोर्ट ने क्यों भेजा नोटिस? क्या स्पीकर और मंत्रियों को गंवानी पड़ेगी अपनी कुर्सी?

पटना हाई कोर्ट ने बिहार के 42 विधायकों को नोटिस जारी किया है। जिसके बाद से सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन MLA की सदस्यता सच में रद्द हो सकती है। क्या बिहार विधानसभा के स्पीकर और कैबिनेट मंत्रियों को अपनी सीट गंवानी पड़ेगी? तो, आइए जानते हैं कि मामला क्या है और नियम क्या कहते हैं।

3 min read
Google source verification

पटना

image

Anand Shekhar

Feb 20, 2026

Patna high court premises

पटना हाई कोर्ट

Bihar News: बिहार की राजनीति में हलचल उस वक्त तेज हो गई जब पटना हाई कोर्ट ने एक साथ 42 विधायकों को नोटिस जारी कर दिया। इनमें विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार, ऊर्जा एवं वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव, पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा, जदयू विधायक चेतन आनंद समेत कई बड़े नाम शामिल हैं। मामला 2025 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा है, जिसमें हारने वाले प्रत्याशियों ने विजयी उम्मीदवारों के खिलाफ इलेक्शन पिटीशन दाखिल की थीं।

कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई में पाया कि कुछ विधायकों के चुनावी हलफनामों (एफिडेविट) में कथित तौर पर गलत या अधूरी जानकारी दी गई है। इसके बाद 40 चुनाव याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सभी संबंधित विधायकों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मामला क्या है?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आने के बाद, कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रहा। ऐसे में हारने वाले उम्मीदवारों (याचिकाकर्ताओं) ने जीतने वाले विधायकों के खिलाफ पटना हाई कोर्ट में 'चुनाव याचिका' (Election Petition) दायर की। कुल 40 अलग-अलग याचिकाओं पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए जस्टिस शशि भूषण प्रसाद सिंह की बेंच ने पाया कि आरोपों में दम है, जिसके बाद विधायकों को 21 जनवरी और फिर 19 फरवरी को नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि नामांकन के समय दायर किए गए शपथपत्र (Form-26) में कई जरूरी कॉलम खाली छोड़े गए या तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।

नोटिस क्यों भेजा गया?

याचिकायों में विधायकों पर प्रमुख रूप से चार आरोप लगाए गए हैं। जिस पर हाई कोर्ट ने उनसे जवाब मांगा है। आरोप है कि विधायकों ने हलफनामे में जानकारी छुपाई है, यानि कि विधायकों ने 'फॉर्म 26' (नामांकन पत्र) में अपने खिलाफ पेंडिंग आपराधिक मामलों या सजा का जिक्र नहीं किया।

कई याचिकाओं में दावा किया गया है कि विधायकों ने अपनी असल संपत्ति, गाड़ियां, और बैंक बैलेंस को चुनावी शपथपत्र में कम करके दिखाया। गोह और मोहनिया जैसे क्षेत्रों के याचिकाकर्ताओं ने मतदान के दौरान धांधली और मतगणना में 'वोट चोरी' के गंभीर आरोप लगाए हैं।

निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, हर उम्मीदवार को यह बताना अनिवार्य है कि उसने अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी अपनी पार्टी को दी है या नहीं। कई विधायकों ने यह कॉलम खाली छोड़ दिया था।

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत किसी चुनाव परिणाम को केवल हाई कोर्ट में चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट सीधे ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई करता है।

पटना हाई कोर्ट ने इन याचिकाओं की सुनवाई के लिए विशेष रूप से न्यायमूर्ति शशि भूषण प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडेय को अधिकृत किया था। फिलहाल मामला प्रारंभिक चरण में है और विधायकों से जवाब मांगा गया है।

कानून के तहत क्या सजा संभव है?

यह पूरा मामला रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1951 के तहत आता है। अगर कोर्ट को लगता है कि किसी कैंडिडेट ने करप्ट काम किया है या जानबूझकर गलत जानकारी दी है, तो धारा 100 के तहत उनकी मेंबरशिप रद्द की जा सकती है। सेक्शन 125A के तहत, झूठा एफिडेविट जमा करने पर छह महीने तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। हालांकि, सिर्फ टेक्निकल गलती के आधार पर सदस्यता रद्द करना आसान नहीं है। कोर्ट तभी सदस्यता रद्द कर सकता है जब यह साबित हो जाए कि गलत जानकारी जानबूझकर दी गई थी और वोटर्स को प्रभावित किया गया था, जिससे चुनाव के नतीजे पर असर पड़ा।

आगे क्या होगा?

फिलहाल मामला शुरुआती दौर में है। विधायकों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 4 सप्ताह का समय दिया गया है। विधायक अपने वकीलों के जरिए जवाब दाखिल करते हुए आरोपों को बेबुनियाद बताने की कोशिश करेंगे। यदि कोर्ट संतुष्ट नहीं होता, तो चुनाव आयोग से रिपोर्ट मांगी जाएगी और गवाहों के बयान दर्ज होंगे। मामला जटिल हुआ तो डिवीजन बेंच को भेजा जा सकता है