
Indian Coin making process: भारतीय सिक्कों की टकसाल में तैयार होने से लेकर आपके हाथों तक पहुंचने की रोचक यात्रा। (AI Creative)
Indian Coin Making Process: जब आप जेब से 1, 2,5 या 10 रुपए का सिक्का निकालते हैं, तो वह आपको केवल धातु का एक गोल टुकड़ा नजर आता है। आप उसके डिजाइन देख लेते होंगे, लेकिन क्या आपका दिमाग भी सोचता है कि ये सिक्के बनते कैसे हैं? इन्हें बनाना आसान है या फिर मुश्किल? दरअसल इसके पीछे छिला होता है इंजीनियरिंग, धातु विज्ञान और अत्याधुनिक मशीनों का लंबा सफर। भारत सरकार की टकसालों में बनने वाला हर सिक्का एक या दो नहीं, बल्कि कई चरणों से गुजरता है, तब जाकर वो आपके हाथों में पहुंचता है। क्या जानना चाहेंगे टकसाल में सिक्कों को तैयार करने की स्टेप बाय स्टेप कहानी?
हर सिक्का एक जैसी धातु से नहीं बनाया जाता। उसकी कीमत, मजबूती, टिकाऊपन और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए धातु या मिश्रधातु (Alloy) चुनी जाती है। अलग-अलग समय में भारत में स्टेनलेस स्टील, कॉपर-निकल (Copper-Nickel), निकल ब्रास (Nickel Brass) और द्विधातु (Bi-metallic) जैसी मिश्र धातुओं का उपयोग किया जाता है। हालांकि यह धातु पुराने सिक्कों में ही यूज की जाती थी। आजकल सिक्के बनाने के लिए फेरिटिक स्टेनलेस स्टील का यूज किया जाता है।
चुनी गई धातु बड़ी-बड़ी कॉइल या शीट के रूप में आती हैं। विशेष मशीनों के माध्यम से इन शीटों से बिल्कुल तय आकार के गोल टुकड़े काटे जाते हैं। इन्हें ब्लैंक कहा जाता है। यही ब्लैंक आगे चलकर सिक्का में ढाले जाते हैं।
ब्लैंक काटने के बाद उन्हें नियंत्रित तापमान पर गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया को एनीलिंग कहते हैं। इससे धातु इतनी लचीली हो जाती है कि उस पर बारीक डिजाइन भी किया जाए, तो वह स्पष्ट रूप से उभरकर आए। बाद में इन्हें साफ किया जाता है और फिर इन पर पॉलिश कर इन्हें तैयार करता है।
इसके बाद मशीनें ब्लैंक के किनारे को हल्का उभार देती हैं। यही उभरा हुआ किनारा बाद में सिक्के के डिजाइन को घिसने से बचाता है और सिक्कों को एक-दूसरे पर आसानी से टिकने लायक बनाता है।
अब बारी आती है सबसे अहम चरण की। बड़ी और भारी कॉइन प्रेस मशीनों में ऊपर और नीचे लगे डाई के बीच ब्लैंक को रख दिया जाता है। इसके बाद मशीनें चलाई जाती हैं। यह मशीनें सिक्के के ऊपर और नीचे से अत्यधिक दबाव डालती हैं। एक ही झटके में अशोक स्तंभ का चिन्ह, सिक्का तैयार करने का वर्ष, मूल्य और दूसरी सभी आकृतियां ब्लैंक पर उभर जाती हैं। यही वो स्टेप होता है जो एक ब्लैंक को असली सिक्के में बदल देता है।
टकसाल से बाहर जाने से पहले सिक्कों का वजन, मोटाई, व्यास और डिजाइन की गुणवत्ता की जांच की जाती है। खराब पाए जाने वाले सिक्कों को अलग कर दिया जाता है। केवल मानकों पर खरे उतरने वाले सिक्के ही भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से बैंकों तक पहुंचते हैं और फिर आपकी जेब में आते हैं।
आपको बता दें कि सिक्कों की जांच टकसाल में की जाती है। टकसाल का क्वालिटी कंट्रोल विभाग यह जांच करता है। भारत की चारों टकसालें SPMCIL (Security Printing and Minting Corporation of India Limited) के अंतर्गत आती हैं। इसीलिए जांच की यह प्रक्रिया इसी विभाग की टीम की निगरानी में होती है। जांच में पास होने वाले सिक्के ही आगे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास पहुंचते हैं। फिर इन सिक्कों को RBI जारी करता है। जहां से आपकी जेब तक पहुंचते हैं।
सिक्कों का डिजाइन तैयार करने और उनकी ढलाई की जिम्मेदारी सिक्का अधिनियम 2011 के तहत भारत सरकार की होती है। जबकि सिक्कों के डिजाइन में किसी भी तरह का बदलाव करना केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है। बताते चलें कि 20 रुपए के सिक्के के डिजाइन में अहमदाबाद के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) के छात्रों की मदद ली गई थी। इससे स्पष्ट है कि सरकार कई बार प्रोफेशनल डिजाइनरों/डिजाइन इंस्टीट्यूट्स से भी मदद लेती है। इस प्रक्रिया में केवल इंजीनियर ही शामिल नहीं होते।
दरअसल यह इंजीनियरिंग या कहें कि तकनीकी हिस्सा है। एक बार डिजाइन फाइनल होने के बाद टकसाल के इंजीनियर और स्किल्ड टेक्नीशियन/इंग्रेवर उस डिजाइन को स्टील की मास्टर डाई पर बारीकी से उकेरते हैं। यही डाई बाद में हजारों-लाखों सिक्कों पर छपती है। इसमें मेटलर्जी और प्रिसिजन इंजीनियरिंग की जरूरत होती है।
सिक्कों की ढलाई के लिए धातु की खरीदी या आपूर्ति भी भारत सरकार (SPMCIL के जरिए संचालित टकसालों) की जिम्मेदारी है, क्योंकि भारत में सिक्के ढालने का एकमात्र अधिकार भारत सरकार को है और सिक्का निर्माण अधिनियम 1906 के तहत यह उसी की जिम्मेदारी है। बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए सिक्कों का आयात भी किया है। यानी कभी-कभी तैयार सिक्के या कच्चा माल बाहर से भी मंगाया गया है।
Updated on:
21 Jul 2026 06:44 pm
Published on:
21 Jul 2026 06:44 pm
