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Health Insurance Saves Lives : क्या स्वास्थ्य बीमा सचमुच जीवन-मृत्यु का सवाल है? वैज्ञानिकों का चौंकाने वाला खुलासा!

Health Insurance Saves Lives : क्रोनिक के शुरुआती झटके से लेकर ACA एक्सपेरिमेंट तक, दशकों के शोध ने आखिरकार पुष्टि की: स्वास्थ्य बीमा जीवन बचाता है।

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Health Insurance Saves Lives

Health Insurance Saves Lives : वैज्ञानिकों ने किया 'खुलासा' - हेल्थ इंश्योरेंस सचमुच जान बचाता है (फोटो सोर्स: Patrika Design Team)

Health Insurance Saves Lives : 2009 की बात है। अमेरिका में ओबामाकेयर (Obamacare) को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी थी लोग इस बात पर लड़ रहे थे कि लाखों अमेरिकियों को हेल्थ इंश्योरेंस मिलना चाहिए या नहीं। इसी बीच, सैन डिएगो के मशहूर हेल्थ पॉलिसी रिसर्चर, रिचर्ड क्रोनिक, एक ऐसा रिसर्च पेपर छापने जा रहे थे, जिसने उन्हें सीधे इस बहस के बीच खड़ा कर दिया।

क्रोनिक की सोच बिलकुल साफ थी वो साबित करना चाहते थे कि हेल्थ इंश्योरेंस सच में जान बचा सकता है। उन्हें लग रहा था कि उनका रिसर्च शायद देशभर की सोच बदल देगा। उनकी बात में दम था, और कुछ महीनों बाद वो खुद ओबामा प्रशासन में हेल्थ पॉलिसी की नौकरी भी ज्वाइन करने वाले थे, जब Affordable Care Act लागू हो रहा था।

आज हम "पत्रिका स्पेशल" के इस खास आर्टिकल में समझेंगे क्या वाकई में स्वास्थ्य बीमा जरूरी है

पहला झटका तो तब लगा, जब रिसर्च के नतीजे बिलकुल उलटे निकले

क्रोनिक को उम्मीद थी कि वो दिखा देंगे हेल्थ इंश्योरेंस जरूरी है, वर्ना मौतें बढ़ेंगी। लेकिन उनका 2009 का रिसर्च, हेल्थ सर्विसेज रिसर्च जर्नल में छपा, और उसमें ये निकला कि ज्यादा लोगों को इंश्योरेंस देने से अमेरिका में मौतों की संख्या पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता, या कम से कम इसके बहुत कम सबूत हैं। ये सबको चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की पुरानी स्टडी कह चुकी था कि बिना इंश्योरेंस हर साल 18,000 लोग ज्यादा मर जाते हैं। क्रोनिक ने उस दावे को लगभग गलत बताया।

बाद में क्रोनिक ने कहा, “मुझे पता था कि इससे मुझे पॉलिटिकल दिक्कतें भी आ सकती हैं, लेकिन एक साइंटिस्ट के तौर पर मेरा फर्ज था कि मैं सच सामने लाऊं।

एक दशक बीत गया और मामला और उलझ गया

क्रोनिक उस वक्त ये नहीं दिखा सके कि हेल्थ इंश्योरेंस और डेथ रेट में सीधा-सीधा कोई मजबूत रिश्ता है। वजह भी थी इसमें बहुत सारे और फैक्टर्स घुसे थे। कुछ स्टडीज ने बताया कि जो लोग इंश्योरेंस नहीं लेना पसंद करते थे, उनमें से कई वैसे भी ज्यादा हेल्दी थे और बिना इंश्योरेंस के भी लंबे समय तक जिंदा रहते थे।

हां, ये तो साफ था कि हेल्थ इंश्योरेंस लोगों को मेडिकल कर्ज या दिवालिया होने से बचा सकता है। लेकिन मौत के आंकड़ों पर कोई पक्का सबूत नहीं था।

इस अनिश्चितता ने बहस को और बढ़ा दिया। अब लोग पूछने लगे अगर हेल्थ इंश्योरेंस मौत के आंकड़ों को नहीं बदलता, तो फिर इतना जरूरी क्यों है?

ये जरूर दिखा कि बिना इंश्योरेंस वाले लोग जल्दी मरते हैं, लेकिन ये साबित नहीं हो पाया कि सिर्फ इंश्योरेंस की कमी ही असली वजह है।

फिर आया ACA और अमेरिका बन गया एक बड़ा नेशनल एक्सपेरिमेंट।

ACA कानून बन गया, भले ही तमाम शंकाएं थीं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि Medicaid विस्तार राज्यों के लिए ऑप्शनल रहेगा। करीब आधे राज्यों ने इसे अपनाया ही नहीं। और यहीं से रिसर्चर्स को मिल गया एक और बड़ा मौका अब वो असल वक्त में देख सकते थे कि इंश्योरेंस का क्या असर पड़ता है।

इसके बाद स्टडीज की बाढ़ आ गई और एक बात बार-बार निकलकर सामने आई: हेल्थ इंश्योरेंस सच में जान बचाता है।

हार्वर्ड की एक स्टडी ने बताया कि जिन राज्यों ने Medicaid एक्सपैंड किया, वहां बुजुर्गों की मौत 8% तक कम हो गई। चार सालों में करीब 19,200 मौतें टल गईं।

2017 में IRS से गलती से 40 लाख लोगों को चिट्ठी चली गई — जिसमें लिखा था कि आपने इंश्योरेंस नहीं लिया, जुर्माना भरिए। जिन लोगों को चिट्ठी मिली, उन्होंने इंश्योरेंस ले लिया — और 45 से 64 की उम्र वालों में अगले दो साल में मौतें काफी कम हो गईं।

शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जैकब गोल्डिन कहते हैं इस तरह की स्टडीज़ में कारण और असर पकड़ना आसान हो जाता है।

अब ज्यादातर रिसर्चर्स मानते हैं : हेल्थ इंश्योरेंस जान बचाता है। हां, ये ठीक-ठीक समझ नहीं आया कि ये असर कैसे होता है। गोल्डिन का कहना है शायद इंश्योरेंस मिलते ही लोग छोटी-मोटी दिक्कतों के लिए जल्दी डॉक्टर के पास चले जाते हैं, जो बाद में बड़ी मुश्किलें बन सकती थीं।

कुछ चीजें अब भी उलझी हुई हैं।

2010 की एक स्टडी में जिन लोगों को गोली लगी थी, उनमें बिना इंश्योरेंस वालों की मौत अस्पताल में ज्यादा हुई, भले ही उन्हें सर्जरी उतनी ही मिली हो जितनी इंश्योरेंस वालों को।

2022 की एक रिसर्च में : एक्सीडेंट में घायल बिना इंश्योरेंस व्हीकल ड्राइवर, इमरजेंसी में ज्यादा मर रहे थे। रिसर्चर्स ने कहा, शायद ये लोग ज्यादा रिस्क लेते हैं या उनकी गाड़ियां कम सेफ होती हैं।

इनसे ये साफ हुआ कि हेल्थ इंश्योरेंस, हेल्थ के सोशल डिटरमिनेंट्स पर भी असर डालता है।

तो अब, जब ताजा-तरीन स्टडीज देखी गईं तो ‘एनुअल रिव्यू ऑफ पब्लिक हेल्थ 2025’ में साफ लिखा गया: अब कोई शक नहीं हेल्थ इंश्योरेंस सच में जान बचाता है।

(वाशिंगटन पोस्ट का यह आलेख पत्रिका.कॉम पर दोनों समूहों के बीच विशेष अनुबंध के तहत पोस्ट किया गया है)