
हेल्थकेयर से परिवारों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ (Photo: IANS)
Healthcare New Study: केरल और दिल्ली में घर में मरीजों की देखभाल (Palliative Care) पर किए गए दो अध्ययनों के अनुसार, कैंसर (Cancer) और तंत्रिका संबंधी विकार (Neurological disorders) जैसी गंभीर बीमारियां न केवल रोगियों को प्रभावित करती हैं बल्कि परिवारों पर सामाजिक और आर्थिक बोझ भी डालती हैं। ये दोनों राज्य केरल और दिल्ली में जहां सर्वे किए वे बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए जाने जाने हैं लेकिन वहां बीमारों के देखभाल के लिए परिवार वित्तीय और सामाजिक परिणामों से जूझ रहे हैं।
इन दो राज्यों के अध्ययनों से पता चला है कि परिवारों को अक्सर दवाइयां, भोजन और शिक्षा जैसी ज़रूरी ज़रूरतों को पूरी करने के चलते काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों राज्यों में लगभग एक तिहाई परिवार बीमारी के कारण कर्ज़ में डूब जाता है। जाहिर सी बात है कि स्वास्थ्य से जुड़े बेहतहाशा बढ़ रहे वित्तीय खर्चे और उसके चलते कर्ज बढ़ने से सामाजिक और पारिवारिक तनाव को जन्म दे रहे हैं। यही हालात कमोबेश पूरे देश में बन चुका है।
इस अध्ययन से जुड़े और एसोसिएशन फॉर सोशली एप्लीकेबल रिसर्च (ASAR) में जन स्वास्थ्य शोधकर्ता डॉ. पार्थ शर्मा ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार कहा कि घर पर मरीजों की देखभाल कोई लक्गजरी नहीं है बल्कि इससे परिवारों को कर्ज में फंसने से बचाया जा सकता है।
इस शोध में दिल्ली के 43,000 लोगों का शामिल किया गया। यह बताया जा रहा है कि यह भारत ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा अध्ययन सैंपल साइज है। इस अध्ययन में पाया गया कि प्रत्येक 1,000 लोगों में से दो को घर पर ही उपचारात्मक देखभाल की आवश्यकता होती है।
डॉ. पार्थ शर्मा ने कहा, "दिल्ली को तत्काल एक उपशामक देखभाल नीति (Palliative care policy) की आवश्यकता है। हमारा अनुमान है कि दिल्ली में 50,000 से 75,000 लोगों को घर-आधारित देखभाल की आवश्यकता है। सरकार द्वारा वित्तपोषित नीति इस आबादी की ज़रूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा कर सकती है।"
दिल्ली में अध्ययन में शामिल परिवारों ने बताया कि प्रति व्यक्ति आय का 59 फीसदी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च हो जाता है। इसके चलते दिल्ली में आर्थिक तंगी खास तौर पर उभरकर सामने आ रही है। हर तीन में से एक परिवार पर औसतन ₹1.8 लाख का कर्ज है। मरीजों की देखभाल का 84% बोझ उठाने वाली सबसे ज़्यादा असर पड़ रहा है। दिल्ली में गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गो में से 50 फीसदी को पेंशन नहीं मिल रहा जबकि केरल में ऐसा 37 फीसदी लोगों के साथ है।
वहीं केरल में कैंसर और स्ट्रोक जैसी पुरानी बीमारियों के कारण सबसे ज़्यादा उपशामक देखभाल की ज़रूरत महसूस की गई। हालांकि इसके विपरीत दिल्ली में तंत्रिका संबंधी विकार ज़्यादा पाए गए। केरल के मज़बूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र ने कुछ राहत ज़रूर दी, लेकिन दिल्ली को सहायता की भारी कमी का सामना करना पड़ा, जहाँ आधे मरीज़ों को पेंशन नहीं मिल रही थी।
Published on:
15 Sept 2025 11:56 am
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