
महात्मा गांधी 9 जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे।
Mahatma Gandhi South Africa journey : मोहनदास करमचंद गांधी वकील के बतौर अपना करियर बनाने अप्रैल 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए। उन्हें दक्षिण अफ्रीका के डरबन की दादा अब्दुला एंड कंपनी के लिए कानूनी पैरवी के लिए एक साल का अनुबंध मिला। यह एक भारतीय कारोबारी दादा अब्दुल्ला हाजी आदम झावेरी नाम के एक कारोबारी की कंपनी थी। इस कंपनी के कानूनी पैरवी के दौरान उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद और अन्याय महसूस किया और उनके मन में सत्याग्रह की नींव पड़ी।
दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी रेलगाड़ी के प्रथम श्रेणी डिब्बे में सफर करते थे। 7 जून 1893 को पीटरमैरिट्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन पर उनको नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा और उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे से धक्का देकर निकाल दिया गया। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया और उनके मन में सत्याग्रह आंदोलन की नींव इसी घटना के चलते पड़ी।
ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उतारे जाने के बाद भी गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में लगभग दो दशक (1893-1914) बिताए। गांधी ने खुद के साथ हुए बुरे बर्ताव के बाद वहां भारतीयों के साथ हो रहे भेदभाव को महसूस करना शुरू किया और उन कुरीतियों के खिलाफ सत्याग्रह (अहिंसक प्रतिरोध) करना शुरू किया। दरअसल, गांधीजी आंदोलन को एक तत्कालिक घटनाओं की प्रतिक्रिया के रूप में सिर्फ नहीं देखते थे। वह आंदोलन को एक दर्शन के तौर पर विकसित करते थे। यही वजह है कि गांधीजी के अहिंसक तरीकों का आंदोलनकारी आज भी अनुसरण करते थे। गांधीजी के अहिंसा के प्रयोग के लिए भारत में गांधीगिरी जैसे शब्द चलन में आए। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में कई सफल आंदोलन चलाए। उदाहरण के तौर पर ट्रांसवाल एशियाई अध्यादेश के खिलाफ भारतीय समुदाय को संगठित किया।
गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में 'इंडियन ओपिनियन' पत्रिका शुरू की। फिनिक्स और टॉल्स्टॉय फार्म स्थापित किए। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए एक सफल अभियान का नेतृत्व किया और जिसके चलते वहां भारतीय राहत अधिनियम पारित हुआ। गांधीजी 9 जनवरी 1915 को भारत लौट आए।
मोहनदास करमचंद गांधी के मन में नस्लभेद, गैरबराबरी और छूआछूत जैसे गंदे विचारों के खिलाफ विद्रोह की बातें उठने लगी। उन्होंने खुद ही लिखा है कि आश्रम की नींव का विचार उनके मन में दक्षिण अफ्रीका में सबसे पहले उठी थी। वे जब भारत आए तब उन्होंने गोपालकृष्ण गोखले से अपने मन की बात कही। उनके गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सबसे पहले भारत भ्रमण करने की सलाह दी। इस समय गांधीजी की उम्र 45 से थोड़ी ज्यादा हो चुकी थी। पत्रकार सोपान जोशी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'गोपालकृष्ण गोखले के कहने पर गांधीजी ने एक साल तक घूम-घूम कर भारत को देखा और समझा। यही वजह है कि दक्षिण अफ्रीका से आया हुआ यह 45 साल का कार्यकर्ता भारत की सच्चाई यहां रहने वाले नेताओं से बेहतर जान पाया।'
गांधी विचार विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे और वर्तमान समय में बिहार प्रदेश किसान कांग्रेस के अध्यक्ष प्रोफेसर विजय बताते हैं कि गांधीजी के जीवन में भारत भ्रमण के दौरान बहुत बदलाव आए। गांधीजी के संत या महात्मा बनने की प्रक्रिया भारत भ्रमण के दौरान शुरू हो गई, जिसे वह जीवन भर चलाते रहे।
गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद बिहार की यात्रा पर गए। मुजफ्फरपुर में उनका स्वागत आचार्य जे. बी. कृपलानी ने किया। वहां से वह चंपारण की यात्रा पर गए। एक नदी के किनारे गांधीजी ने एक औरत को देखा, जिनके तन पर काफी कम कपड़े थे। गांधी ने उसी वक्त अपना वस्त्र उतारकर उस स्त्री को दे दिया और आजीवन घुटने तक की धोती में जीवन बिताया। रिचर्ड एटनबरो द्वारा निर्देशित गांधी फिल्म में इस घटना को दिखाया गया है। हालांकि गांधीवादी साहित्य में पश्चिमी चंपारण के कोलभील इलाके में इस घटना के घटित होने के साक्ष्य मिलते हैं।
क्या गांधी के मन में कपड़ा त्यागने का विचार को उनकी करूणा या समता के विचार के रूप में देखा जाना चाहिए? इस सवाल के जवाब में प्रो. विजय गांधीजी से जुड़ी एक कहानी बताते हैं। गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ एक गरीब बस्ती में पहुंचे। उन्होंने कस्तूरबा को एक झोपड़ी के अंदर भेजा और कहा कि घर के सदस्यों से कहो कि गांधी उनसे मिलना चाहते हैं। कस्तूरबा झोपड़ी से बाहर निकली और कहा कि महिलाएं आपसे नहीं मिल सकती हैं। उन्होंने पूछा कि क्या मैं पुरुष हूं इसलिए वह मुझसे नहीं मिल सकती? इसपर कस्तूरबा ने कहा- नहीं ऐसा नहीं है। कस्तूरबा ने कहा कि दरअसल उनके पास एक ही धोती है और घर की दूसरी महिला उसे पहनकर कहीं बाहर गई हुई है। झोपड़ी में इस समय मौजूद महिला के पास पहनने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वह बाहर नहीं आ सकती। गांधीजी यह सबकुछ सुनकर सन्न रह गए। प्रो. विजय बताते हैं कि गांधीजी ने खुद ही लिखा है कि वह उस पूरी रात खड़े रहे। एक भी पल के लिए सो नहीं पाए। गांधी इस बारे में लिखते हैं- 'पूरे हिन्दुस्तान में जितने कपड़े का उत्पादन होता है, मेरा हिस्सा इतना ही है। अगर मैं इससे ज्यादा कपड़ा पहनूंगा तो देश के किसी व्यक्ति के हिस्से के तन से कपड़ा कम हो जाएगा।'
प्रो. विजय कहते हैं कि गांधीजी के मन में कपड़ा त्यागने का विचार सिर्फ करूणा या दयाभाव के चलते नहीं आया था। यह उनके खिलाफ एक किस्म का दुष्प्रचार है। गांधी जी के मन में यह विचार अपनी जनता या भारतीयों के साथ समानता बनाने के विचार से आया था।
बिहार के मधुबनी जिले में खादी का उत्पादन 1925 में अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना से पहले भी होता था। अंग्रेजों की रणनीति के चलते मधुबनी में खादी का उत्पादन बहुत कम या लगभग खत्म सा हो गया था। दरअसल गांधीवादी साहित्य से पता चलता है कि गांधी के मन में खादी का विचार इन्हीं इलाकों में घूमते हुए आया और उनके चरखा से सूत कातने के आंदोलन ने फिर से खादी उद्योग को यहां जिंदा कर दिया। प्रो. विजय बताते हैं कि गांधीजी ने अपने पूरे जीवन में सिर्फ एक संस्था अखिल भारतीय चरखा संघ की अध्यक्षता खुद मांगकर ली थी। इस संस्था के अलावा गांधीजी किसी भी संस्था के अध्यक्ष कभी भी नहीं रहे। गांधीजी ढाका से चरखा लेकर आए और उसपर सूत कातना सीखा और अपना वस्त्र खुद से तैयार कर भारतीयों को पहनने की प्रेरणा दी।
ब्रह्मचर्य के बारे में पूछे जाने पर हर व्यक्ति संभोग से दूरी बनाने की बात कहता है। लेकिन गांधीजी ब्रह्मचर्य के बारे में खुद लिखते हैं - 'संतान उत्पत्ति के लिए पति और पत्नी के बीच संभोग पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य के अंतर्गत आता है।' इस बारे प्रो. विजय बताते हैं कि दरअसल गांधीजनों ने ही गांधी के विचारों को लेकर ऐसा माहौल बना दिया कि युवा पीढ़ी उनके करीब जाने से डरती है। दरअसल, गांधीजन खुद को महान बताने या महान दिखने के लिए उनके विचार का प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहते हैं।
गांधीजी सार्वजनिक जीवन जीने के आदी हो गए और उन्होंने अपने बारे में दुनिया को सबकुछ बताया। यही वजह है कि नेताजी सुभाष बोस ने उन्हें महात्मा कहकर पुकारना शुरू कर दिया और इस नाम से ही वह पूरी दुनिया में प्रतिष्ठित हो गए।
Updated on:
09 Jan 2026 10:42 am
Published on:
09 Jan 2026 06:00 am
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