5 अगस्त 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

5 अगस्त का इतिहास: 61 साल पहले पाकिस्तान की एक चाल से भड़का था 1965 का भारत-पाक युद्ध

5 अगस्त 1965 भारतीय सैन्य इतिहास की एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन पाकिस्तान ने ऑपरेशन गिब्राल्टर के तहत कश्मीर में घुसपैठ शुरू की, जिसने आगे चलकर 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का रूप लिया। जानिए इस अभियान, युद्ध के प्रमुख मोर्चों, युद्धविराम और इसके ऐतिहासिक महत्व की पूरी कहानी।
4 min read
Google source verification

भारत

image

Ravi Gupta

Aug 05, 2026

India Pakistan War 1965

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

तारीख 05 अगस्त 1965, आज से 61 साल पहले जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी बनकर भारत में घुसपैठ की और युद्ध छिड़ गया। आज के इतिहास में वॉर स्टोरी को विस्तार से पढ़ते हैं।

ऑपरेशन गिब्राल्टर की शुरुआत

5 अगस्त 1965 को, पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन गिब्राल्टर' के तहत कश्मीर में घुसपैठ शुरू की। बायजूज़ (UPSC नोट्स) के अनुसार, इस ऑपरेशन के पीछे तत्कालीन विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का समर्थन था, और इसमें करीब 40,000 विशेष प्रशिक्षित अनियमित सैनिकों को शामिल करने की योजना थी, ताकि भारत को कश्मीर मुद्दे पर बातचीत की मेज़ पर लाया जा सके।

पाकिस्तानी सैनिकों ने स्थानीय कश्मीरी वेशभूषा में उस समय की युद्धविराम रेखा (Ceasefire Line - जिसे बाद में 1972 के शिमला समझौते के बाद 'नियंत्रण रेखा' कहा जाने लगा) पार की।

डेली एक्सेल्सियर की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त 1965 की रात पाकिस्तानी सेना ने राजौरी, पुंछ, उरी, टीटवाल, गुरेज़ और कारगिल को छूने वाली 470 किमी लंबी युद्धविराम रेखा पर गोलीबारी और गोलाबारी शुरू कर दी थी।

मोहम्मद दीन जागीर की बहादुरी

सदाश्री की रिपोर्ट के अनुसार, गुलमर्ग के पास तोसा मैदान में एक गुज्जर चरवाहे मोहम्मद दीन जागीर ने घुसपैठियों की पहचान कर पुलिस को सूचित किया था, जिसके चलते सेना ने तुरंत कार्रवाई कर सात घुसपैठियों को मार गिराया; इस बहादुरी के लिए उन्हें बाद में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

युद्ध की शुरुआत पर मतभेद

भारत का मानना है कि युद्ध की शुरुआत 5 अगस्त को हुई, जबकि पाकिस्तान इसे 6 सितंबर से मानता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान हर साल 6 सितंबर को एक बड़े दुश्मन के खिलाफ अपनी रक्षा की याद में विजय दिवस के रूप में मनाता है, क्योंकि उस दिन भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया था जिसे पाकिस्तान "बिना उकसावे" का कदम बताता है।

मुख्य मोर्चे और युद्ध का विस्तार

ऑपरेशन गिब्राल्टर की विफलता के बाद, पाकिस्तान ने 1 सितंबर को 'ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' शुरू किया। गाकबे कॉलेज स्टडी मटेरियल के अनुसार, इसका लक्ष्य जम्मू के अखनूर शहर पर कब्ज़ा करना था। इसके जवाब में, भारत ने 6 सितंबर को पंजाब में सीमा पार कर पाकिस्तान में मोर्चा खोला।

विकिपीडिया पर दर्ज युद्ध के विवरण के अनुसार, 10 सितंबर 1965 को सियालकोट सेक्टर में भारत की पहली बख्तरबंद डिवीजन ने पाकिस्तान की छठी बख्तरबंद डिवीजन पर हमला किया, और तीन दिनों के भीतर पाकिस्तान को 67 टैंकों का नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा, जबकि भारत को सिर्फ 6 सेंचुरियन टैंकों का नुकसान हुआ। इसी दौरान असल उत्तर की लड़ाई में भी भारत को सफलता मिली।

संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता और युद्धविराम

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 20 सितंबर 1965 को प्रस्ताव 211 पारित किया। यह प्रस्ताव 10 पक्ष और 0 विपक्ष मतों से पारित हुआ था, जिसमें जॉर्डन ने मतदान से परहेज़ किया। प्रस्ताव में 22 सितंबर 1965 को सुबह 7 बजे (GMT) से युद्धविराम लागू करने और दोनों सेनाओं को 5 अगस्त से पहले की स्थिति में लौटने का निर्देश दिया गया।

हालांकि, IDSA (मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन संस्थान) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने वास्तव में 23 सितंबर 1965 की सुबह 3:30 बजे से युद्धविराम प्रभावी किया - यह फैसला प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 20 सितंबर की शाम को रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन. चौधरी और रक्षा सचिव पी.वी.आर. राव के साथ बैठक में लिया था।

पीआईबी (भारत सरकार) के एक हालिया लेख के अनुसार, युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने पश्चिमी क्षेत्र में लगभग 4,000 उड़ानें भरीं और लाहौर, सरगोधा तथा पेशावर के पाकिस्तानी हवाई अड्डों पर सटीक हमले कर पाकिस्तान वायुसेना की क्षमता को बड़ा झटका दिया।

युद्ध का परिणाम और प्रभाव

1965 का युद्ध निर्णायक नहीं रहा। दोनों पक्षों ने कुछ क्षेत्रों पर कब्जा किया, लेकिन कोई स्पष्ट विजेता नहीं बना। ताशकंद घोषणा के अनुसार, दोनों देशों के बीच शांति समझौता 10 जनवरी 1966 को सोवियत संघ के ताशकंद शहर में सोवियत नेता अलेक्सी कोसिगिन की मध्यस्थता में हुआ, जिस पर भारत की ओर से लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान की ओर से मोहम्मद अयूब खान ने हस्ताक्षर किए।

आज का ऐतिहासिक संदर्भ

5 अगस्त 1965 की घटना आज भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। UPSC/PCS परीक्षार्थियों और राजनीति में रुचि रखने वालों के लिए यह घटना कश्मीर संघर्ष, सैन्य रणनीति और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की समझ के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

क्या यह सिर्फ इतिहास है, या आज भी इसका असर?

आज भी कश्मीर मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का मुख्य कारण बना हुआ है। 1965 के युद्ध ने यह स्पष्ट किया कि सीमाओं पर तनाव कितनी जल्दी बड़े संघर्ष में बदल सकता है।

इस ऐतिहासिक दिन से हमें यह सीख मिलती है कि सीमाओं पर सतर्कता और संवाद दोनों जरूरी हैं। आज के दिन का महत्व सिर्फ इतिहास तक सीमित नहीं है - यह हमें वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने की याद दिलाता है।