
एथलीट्स का मानसिक सेहत: टिप्स
भारत में कॉलेज स्तर के एथलीट्स पर एक हालिया अध्ययन ने पाया कि खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाए रखना, प्रदर्शन का दबाव, चोटें और सामाजिक अपेक्षाएं मिलकर मानसिक तनाव को बढ़ाती हैं। यह शोध बताता है कि कॉलेज एथलीट्स में तनाव का स्तर मध्यम से उच्च तक होता है। इसी तरह, ओस्मानिया विश्वविद्यालय के शोध में चोटिल एथलीट्स में तनाव, प्रतिरोधक क्षमता और मुकाबला रणनीतियों का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पाया गया है।
पूर्व एथलीट और कोच ओलंपियन अंजू बॉबी जॉर्ज ने कहा है कि भारत में खेल संरचना में मानसिक स्वास्थ्य को अभी तक एक मुख्य स्तंभ की तरह नहीं देखा गया है। वे बताती हैं कि एथलीट्स खासकर महिलाएं तनाव, चिंता, बर्नआउट और भावनात्मक असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझते हैं, लेकिन इन्हें अक्सर कमजोरी या अनुशासन की कमी समझ लिया जाता है। यह चुप्पी और असमर्थता की संस्कृति को जन्म देती है, जिससे मदद मांगना मुश्किल हो जाता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की एक टीम ने “एथलेटिक मानसिक ऊर्जा” (AME) की अवधारणा पर शोध किया। इसमें पाया गया कि एथलीट्स की मानसिक ऊर्जा उनके प्रदर्शन और मनोवैज्ञानिक कल्याण के बीच सेतु का काम करती है। अध्ययन में 50 भारतीय एथलीट्स शामिल थे, और यह स्पष्ट हुआ कि AME बेहतर होने से प्रदर्शन और मानसिक संतुलन दोनों में सुधार होता है।
इन शोधों से यह स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि संरचनात्मक समर्थन की कमी का परिणाम है। भारत में अभी तक अधिकांश प्रशिक्षण प्रणालियों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल नहीं हैं, और कोच या स्टाफ को चेतावनी संकेत पहचानने की ट्रेनिंग भी नहीं मिलती, जिससे एथलीट्स अकेले संघर्ष करते हैं।
भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के Cognitive Science Research Initiative (CSRI) के तहत एक चार सप्ताह का “Psychological Capacity Building Program” (PCBP) पूरा हुआ। यह कार्यक्रम पंजाब और हरियाणा के शूटिंग और तीरंदाजी अकादमियों में आयोजित किया गया, जिसमें मानसिक कौशल, प्रेरणा, भावनात्मक नियंत्रण और कल्याण पर ध्यान दिया गया। यह अध्ययन अक्टूबर 2024 में समाप्त हुआ और अब परिणामों का विश्लेषण हो रहा है।
इन सब तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में एथलीट्स की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें अब धीरे-धीरे पहचान में आ रही हैं, लेकिन अभी भी व्यापक और नियमित समर्थन की कमी है।
जब एथलीट्स चोट या प्रदर्शन की गिरावट से जूझते हैं, तो सिर्फ शारीरिक इलाज ही नहीं, बल्कि मानसिक सहारा भी जरूरी होता है। चोटिल एथलीट्स पर हुए शोध से पता चलता है कि तनाव और मुकाबला रणनीतियों का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर होता है। इसलिए, चोट से उबरने के दौरान मानसिक सहारा देना उतना ही जरूरी है जितना फिजिकल रिहैब।
दिल्ली विश्वविद्यालय के AME शोध से यह सीख मिलती है कि मानसिक ऊर्जा को बढ़ाने से एथलीट्स का प्रदर्शन और मानसिक संतुलन दोनों सुधरते हैं। इसका मतलब है कि मानसिक कौशल प्रशिक्षण को नियमित रूप से शामिल करना चाहिए।
वहीं, PCBP जैसे कार्यक्रम यह दिखाते हैं कि चार सप्ताह में ही मानसिक कौशल और भावनात्मक नियंत्रण में सुधार संभव है। इसे अन्य खेलों और राज्यों में विस्तार देना एक व्यावहारिक कदम हो सकता है।
महिला एथलीट्स के लिए विशेष ध्यान जरूरी है। अंजू बॉबी जॉर्ज ने स्पष्ट किया कि महिलाओं पर परिवार, करियर और सामाजिक अपेक्षाओं का अतिरिक्त दबाव होता है, और मातृत्व के बाद मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संस्थागत समर्थन लगभग न के बराबर है। इसलिए, महिला एथलीट्स के लिए जेंडर-संवेदनशील मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम जरूरी हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को जब तक खेल का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना जाएगा, तब तक एथलीट्स की सफलता अस्थिर रहेगी। अब समय है कि हम उन्हें सिर्फ ताकत और तकनीक से नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती और सहारे से भी लैस करें।
Updated on:
30 Jul 2026 03:21 pm
Published on:
30 Jul 2026 03:21 pm
