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एक महिला जिसने भारत की करोड़ों महिलाओं की ज़िंदगी बदल दी, जानिए कौन थीं डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी

डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी ने भारत में महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों के लिए ऐतिहासिक योगदान दिया। जानिए कैसे एक महिला ने अपने साहस और संघर्ष से करोड़ों महिलाओं की ज़िंदगी बदलने में अहम भूमिका निभाई।
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भारत

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Ravi Gupta

Jul 30, 2026

Dr Muthulakshmi Reddy, Birth Anniversary, Women Rights,

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

Inspiring Women Story: डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी का नाम भारतीय इतिहास में महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में दर्ज है। आज, 30 जुलाई 2026 को, हम उनकी जयंती पर उनके जीवन और योगदान को याद करते हैं।

एक ऐसी महिला जिन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, राजनीति और सामाजिक सुधार के कई क्षेत्र में 'पहली महिला' बनकर इतिहास रचा।

उनका जन्म 30 जुलाई 1886 को पुदुक्कोट्टई (तमिलनाडु) में हुआ था। उस समय महिलाओं की शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी लगभग असंभव मानी जाती थी, लेकिन डॉ. रेड्डी ने इन बाधाओं को चुनौती दी।

शिक्षा और चिकित्सा में पहला कदम

उन्होंने महाराजा कॉलेज (पुरुषों के लिए) में प्रवेश पाने वाली पहली लड़की बनकर इतिहास रचा। इसके बाद 1907 में मद्रास मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया और 1912 में स्नातक की डिग्री हासिल कर भारत की पहली महिला मेडिकल ग्रेजुएट बनीं। इसके बाद वे सरकारी प्रसूति एवं नेत्र अस्पताल में पहली महिला हाउस सर्जन बनीं।

राजनीति और सामाजिक सुधार में अग्रणी

1927 में उन्हें मद्रास विधान परिषद में नियुक्त किया गया, जिससे वे ब्रिटिश भारत की पहली महिला विधायक बनीं। उन्होंने देवदासी प्रथा को समाप्त करने का बिल पेश किया और महिलाओं व बच्चों के लिए विशेष अस्पताल की स्थापना की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप ट्रिप्लिकेन में कस्तूरबा अस्पताल बना।

उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों की नियमित चिकित्सा जांच की व्यवस्था की, वेश्यावृत्ति और महिलाओं व बच्चों के यौन शोषण को रोकने के लिए कानून पारित करवाया, और स्लम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की पहल की।

महिला कल्याण संस्थाओं में भूमिका

1917 में उन्होंने महिला इंडियन एसोसिएशन (WIA) की स्थापना में भाग लिया, जो महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था बनी। बाद में वे WIA की अध्यक्ष भी बनीं। उन्होंने ऑल इंडिया वीमेन कॉन्फ्रेंस (AIWC) में भी सक्रिय भूमिका निभाई और महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए काम किया।

स्वास्थ्य क्षेत्र में अमूल्य योगदान

उनकी छोटी बहन कैंसर से मर गई थीं, और उस समय इलाज दूर-दराज के शहरों में ही उपलब्ध था। इस अनुभव ने उन्हें कैंसर अस्पताल खोलने की प्रेरणा दी। 1954 में मद्रास (अब चेन्नई) में एड्यार कैंसर संस्थान की स्थापना हुई, जो दक्षिण भारत का पहला और पूरे देश का दूसरा समर्पित कैंसर केंद्र था। इसके अलावा, उन्होंने 1931 में अव्वई होम की स्थापना की, जो अनाथ और वंचित लड़कियों के लिए आश्रय और शिक्षा का केंद्र बना।

सम्मान और विरासत

1956 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया। 1947 में जब पहला राष्ट्रीय ध्वज लाल किले पर फहराया गया, तो उनके नाम को सम्मान स्वरूप उसमें शामिल किया गया। तमिलनाडु सरकार ने उनके जन्मदिन 30 जुलाई को 'हॉस्पिटल डे' के रूप में मनाने की घोषणा की और मातृत्व लाभ योजना भी उनके नाम पर शुरू की गई।

2019 में गूगल ने उनके 133वें जन्मदिवस पर डूडल के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी।

आज का महत्व

आज, 30 जुलाई 2026 को, जब हम डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी की याद में खड़े हैं, तो यह सिर्फ एक जन्मदिन नहीं है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, शिक्षा और स्वास्थ्य में उनके संघर्ष की याद है। उनके द्वारा स्थापित संस्थान आज भी हजारों महिलाओं और बच्चों की सेवा कर रहे हैं। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि व्यक्तिगत दृढ़ता और सामाजिक प्रतिबद्धता से कैसे व्यापक बदलाव लाया जा सकता है।

उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि असंभव को संभव बनाना सिर्फ एक व्यक्ति की हिम्मत नहीं, बल्कि समाज की दिशा बदलने की क्षमता है। आज के दिन, उनके आदर्शों को आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है — चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या सामाजिक न्याय।

इस तरह, डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी का जीवन हमें प्रेरित करता है कि बदलाव की नींव व्यक्तिगत साहस से ही रखी जाती है — और आज, उनके जन्मदिन पर, यह प्रेरणा और भी जीवंत हो उठती है।