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दिल्ली में नाबालिग कर रहे हत्या! बढ़ते गंभीर अपराध आपकी चिंता का कारण बन रहे हैं? जानें क्या करें

दिल्ली में नाबालिगों द्वारा अपराधों में तेज़ी से बढ़ोतरी एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। हाल ही में उपलब्ध पुलिस आंकड़ों और रिपोर्टों से यह साफ है कि यह समस्या न केवल बढ़ रही है, बल्कि अब हिंसक और संगीन अपराधों की ओर भी बढ़ रही है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
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Delhi Juvenile Crime

दिल्ली में नाबालिग द्वारा गंभीर अपराधों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। (Photo: ChatGpt)

दिल्ली में टीनएजर द्वारा अपराध की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2026 की पहली छमाही (1 जनवरी से 15 जून तक) में नाबालिगों से जुड़े अपराधों की संख्या 1,404 दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में 2025 में यह संख्या 1,080 थी यानी लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि केवल मामूली चोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि डकैती, हत्या के प्रयास, बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों में भी तेज़ी देखी गई है। उदाहरण के लिए, डकैती और चोरी के मामले 104 से बढ़कर 161 हो गए; हत्या के प्रयास 103 से बढ़कर 159; बलात्कार 61 से बढ़कर 86; और हत्या के मामले 80 से बढ़कर 100 हो गए।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'क्राइम इन इंडिया 2024' रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 2024 में नाबालिगों से जुड़े कुल 2,306 अपराध दर्ज किए गए, जो देश के सभी प्रमुख महानगरों में सबसे अधिक है।

क्यों हो रही बढ़ोतरी और क्या हो रहा इसका असर?

नाबालिग अपराधों में बढ़ोतरी का एक कारण यह है कि अपराधी गिरोह अक्सर नाबालिगों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें कानूनी रूप से कम सजा मिलेगी। दिल्ली पुलिस ने Juvenile Justice Board (JJB) से ऐसे नाबालिगों को वयस्कों की तरह मुकदमा चलाने की मांग की है, विशेषकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में, ताकि अपराधों पर अंकुश लगाया जा सके।

वास्तव में, पुलिस ने JJB के समक्ष ऐसे मामलों में आवेदन बढ़ा दिए हैं, जिनमें नाबालिगों को वयस्कों की तरह ट्रायल की अनुमति मांगी गई है। 2025 में इस तरह के 79 आवेदन थे, जो 2025 के अंत तक बढ़कर 176 हो गए यानी 123 प्रतिशत की बढ़ोतरी।

अपराध की प्रकृति में भी आ रहा है गंभीर बदलाव

यह बढ़ता खतरा केवल संख्या में ही नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति में भी दिखाई देता है। POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) के तहत दर्ज मामलों की संख्या भी चिंताजनक है। 2025 और 2026 की पहली तिमाही में दिल्ली में हर महीने औसतन 250 से अधिक POCSO मामले दर्ज हुए, और रोज़ाना लगभग 10 गिरफ्तारियां हो रही हैं।

इन हत्याओं में 15 नाबालिग हैं आरोपित

28 जनवरी 2026 - शास्त्री पार्क इलाके में एक नाबालिग ने दो बालिग साथियों के साथ मिलकर गैंगवार में हाशिम बाबा गिरोह से जुड़े प्रापर्टी डीलर की गोलियां मारकर हत्या की थी।

26 मार्च 2026 - दयालपुर इलाके में 16 साल के नाबालिग की 17 साल के तीन नाबालिगों ने चाकू से ताबड़तोड़ वार करके की हत्या।

26 अप्रैल 2026 - वेलकम थाना क्षेत्र में माचिस न देने पर दो दोस्तों के साथ मिलकर की चाकू से वार करके की व्यक्ति की हत्या।

01 जून 2026 - न्यू उस्मानपुर थाना क्षेत्र इलाके में पुरानी रंजिश में चाकू से ताबड़तोड़ वार करके नाबालिग की 16 से 17 साल के पांच नाबालिगों ने की हत्या।

15 जून 2026 - दयालपुर थाना क्षेत्र में दो नाबालिग शूटरों ने गैंगवार में गोलियां मारकर की घोषित बदमाश की हत्या।

24 जून 2026 - गौतमपुरी इलाके में चाकू से ताबड़तोड़ वार करके तीन नाबालिगों ने की 16 साल के नाबालिग की हत्या।

यह स्थिति आम पाठक, अभिभावक और समाज के लिए क्या मायने रखती है? पहला, यह बताती है कि नाबालिग अपराध अब केवल “अपरिपक्वता” की वजह से नहीं हो रहे, बल्कि इनमें संगीन हिंसा और योजनाबद्धता भी शामिल है। दूसरा, यह दर्शाता है कि पारिवारिक, सामाजिक और शिक्षा संबंधी कमजोरियां (जैसे भावनात्मक संवाद की कमी, हिंसक डिजिटल सामग्री का प्रभाव) इस समस्या को बढ़ा सकती हैं, जैसा कि विशेषज्ञों ने भी इंगित किया है।

तीसरा, कानून-व्यवस्था की प्रतिक्रिया में बदलाव जरूरी है जैसे कि नाबालिगों को वयस्कों की तरह ट्रायल की अनुमति देना, लेकिन साथ ही पुनर्वास और शिक्षा पर भी जोर देना। दिल्ली के उपराज्यपाल ने POCSO कानून के कार्यान्वयन की समीक्षा करते हुए स्कूलों में चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी बनाने और जुलाई को ‘चाइल्ड प्रोटेक्शन मंथ’ घोषित करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है।

क्या हो सकता है अगला कदम?

सबसे पहले, पुलिस और न्याय व्यवस्था को नाबालिगों के अपराधों के रुझान को समझकर रोकथाम पर काम करना होगा, जैसे कि जोखिम में बच्चों की पहचान, शिक्षा और काउंसलिंग, परिवार और समुदाय आधारित पुनर्वास। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने भी इस दिशा में पहल की बात कही है।

दूसरा, JJB और बच्चों की अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि ट्रायल वयस्कों की तरह हो, लेकिन साथ ही बच्चों के मानसिक और सामाजिक हालात को ध्यान में रखते हुए पुनर्वास की योजना भी बने, जैसा कि Juvenile Justice Act के तहत निर्धारित है।

तीसरा, स्कूलों, परिवारों और समाज को मिलकर बच्चों को हिंसा और अपराध से दूर रखने के लिए जागरूकता, संवाद और समर्थन की व्यवस्था बनानी होगी। उपराज्यपाल की पहल इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।

बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए करना होगा ये काम

दिल्ली में नाबालिगों द्वारा अपराधों में बढ़ोतरी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह एक चेतावनी है। यह बताता है कि समाज, परिवार और कानून-व्यवस्था को मिलकर काम करना होगा। न केवल सजा देने के लिए, बल्कि बच्चों को सही राह पर लौटाने और भविष्य सुरक्षित बनाने के लिए। यह समय है कि हम इस खतरे को समझें, रोकें और बच्चों को फिर से सही दिशा में ले आएं।