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बांकीपुर उपचुनाव 2026: भाजपा का गढ़, प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी सियासी परीक्षा, क्यों खास है यह सीट?

बांकीपुर उपचुनाव 2026 बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला माना जा रहा है। भाजपा के मजबूत गढ़ में प्रशांत किशोर की चुनौती ने इस सीट को हाई-प्रोफाइल बना दिया है। जानिए इस चुनाव का महत्व, राजनीतिक समीकरण और किन वजहों से पूरे देश की नजर इस सीट पर टिकी है।
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भारत

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Ravi Gupta

Jul 30, 2026

Bankipur Bypoll 2026, Bankipur Election, Prashant Kishor,

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर “नई राजनीतिक चेहरा” के रूप में उभरे हैं। बांकीपुर उपचुनाव का मुकाबला केवल एक सीट तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में राजनीतिक विकल्पों की संभावनाओं पर भी सवाल खड़ा कर रहा है।

बांकीपुर उपचुनाव की पृष्ठभूमि

सबसे पहले, इस उपचुनाव की पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है। बांकीपुर सीट भाजपा का पुराना गढ़ रही है - 1995 से लगातार भाजपा के कब्जे में रही है। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके बेटे नितिन नवीन ने इसे जीता है। इस बार यह सीट इसलिए खाली हुई क्योंकि नितिन नवीन को राज्यसभा भेजा गया। साथ ही वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने।

जनसुराज पार्टी का फिर जनमत परीक्षण

जनसुराज पार्टी (JSP) के संस्थापक और प्रसिद्ध चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इस उपचुनाव में अपनी पहली चुनावी लड़ाई लड़ी। उन्होंने जान-बूझकर भाजपा के मजबूत गढ़ से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, ताकि बिहार के मतदाताओं को जाति या धर्म से ऊपर उठकर वोट देने का संदेश दिया जा सके। उन्होंने इसे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और नई सरकार के खिलाफ एक जनमत परीक्षण भी बताया।

भाजपा ने किया बदलाव

भाजपा ने शुरुआत में अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया, लेकिन उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद पार्टी ने नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा, जो बूथ-स्तरीय कार्यकर्ता रहे हैं। वहीं, आरजेडी ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया, जिन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव में भी इसी सीट से मजबूत प्रदर्शन किया था।

प्रशांत किशोर ने मैदान में अपनी रणनीति बदलते हुए बड़ी रैलियों की जगह छोटे-छोटे वार्ड स्तर के संवादों और टाउन हॉल बैठकों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने स्थानीय शिकायतों को सीधे जनता तक पहुंचाया और मतदाताओं से “अपने बच्चों के भविष्य के लिए वोट” देने की अपील की।

इस मुकाबले को राजनीतिक विश्लेषकों ने दो विरोधी मॉडल - भाजपा की मजबूत संगठनात्मक ताकत और किशोर की व्यक्तिगत लोकप्रियता - के बीच टकराव के रूप में देखा है। विश्लेषक डॉ. आर.के. वर्मा ने कहा कि भाजपा का संगठनात्मक लाभ अभी भी मजबूत है, जबकि JSP की ताकत किशोर की व्यक्तिगत अपील में निहित है।

इसी बीच, JSP को एक झटका तब लगा जब उसके कई प्रमुख नेता, जिनमें गणितज्ञ के.सी. सिन्हा भी शामिल हैं, भाजपा में शामिल हो गए। यह घटना JSP के संगठनात्मक आधार को कमजोर कर सकती है।

बांकीपुर की सामाजिक बनावट

बांकीपुर की सामाजिक बनावट भी इस लड़ाई में अहम भूमिका निभा रही है। यह सीट कायस्थ समुदाय का गढ़ मानी जाती है, जो भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। किशोर ने इस सामाजिक समीकरण को चुनौती दी और विकास, भविष्य तथा बदलाव जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।

इस उपचुनाव का महत्व केवल एक सीट तक सीमित नहीं है। यह JSP के भविष्य के लिए एक निर्णायक परीक्षा है—क्या एक रणनीतिकार-नेता के रूप में किशोर की लोकप्रियता पार्टी को जीवित रख पाएगी? साथ ही, यह भाजपा के शहरी गढ़ों में संगठन की ताकत की परीक्षा भी है।

अगले चरण के रूप में, 30 जुलाई को मतदान जारी है और 3 अगस्त को परिणाम सामने आएंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या किशोर, नई राजनीति का चेहरा बनकर, इस गढ़ को हिला पाते हैं या भाजपा की मशीनरी एक बार फिर जीत दर्ज करती है।

इस लड़ाई का असर बिहार की राजनीति पर लंबे समय तक रहेगा - चाहे वह नए राजनीतिक विकल्पों को बल देना हो या पुरानी संरचनाओं की मजबूती को फिर से साबित करना। चुनाव परिणाम चाहे जो भी हों, यह मुकाबला बिहार में राजनीतिक बदलाव की दिशा तय करेगा।