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जन्म तो दर्ज, लेकिन मौत पर रजिस्ट्रेशन अब भी अधूरे, जानिए संसद को नया संशोधित कानून क्यों लाना पड़ा?

Birth Death Registration Amended Bill 2026: भारत में जन्म रिकॉर्ड में तेजी से सुधार, लेकिन मृत्यु का रिकॉर्ड अधूरा, सरकार ने की सख्ती, जानिए मृत्यु नागरिक पंजीकरण संशोधन बिल 2026 आने से क्या फायदे?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 04, 2026

Birth Death Registration Civil Amendment Bill

Birth Death Registration Civil Amendment Bill: AI Creative

Birth Death Registration Civil Amendment Bill: भारत डिजिटल गवर्नेंस की ओर तेजी से बढ़ रहा है। जन्म प्रमाणपत्र अब स्कूल, पासपोर्ट, आधार, वोटर लिस्ट और सरकारी नौकरियों तक की पहचान का आधार बन चुका है। लेकिन इसी व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी सामने आई है, देश में जन्म का पंजीकरण लगातार बेहतर हुआ है, जबकि मृत्यु पंजीकरण और खासकर मृत्यु के कारण (Cause of Death) का रिकॉर्ड अब भी अधूरा है। यही वजह है कि केंद्र सरकार को संसद में जन्म-मृत्यु नागरिक संशोधन बिल, 2026 लाना पड़ा, जो देर से होने वाले पंजीकरण को और सख्त बनाता है।

बता दें कि यह केवल प्रमाणपत्र का मामला नहीं है। यह देश के पब्लिक हेल्थ डेटा, महामारी की तैयारी, बजट योजना, बीमा, पेंशन और जनसंख्या नीति से जुड़ा प्रश्न है। अगर सरकार को यह पता ही नहीं होगा कि लोग किस बीमारी से, किस उम्र में और किस जिले में मर रहे हैं, तो स्वास्थ्य नीति कितनी सटीक बनेगी?

सबसे बड़ा सवाल

भारत में जन्म का रिकॉर्ड तेजी से सुधर रहा है, लेकिन क्या मृत्यु का रिकॉर्ड भी उतना ही मजबूत है? यही सवाल संसद तक पहुंचा। इस पर सरकार का तर्क है कि देर से पंजीकरण में फर्जीवाड़े की आशंका रहती है। इसलिए दो वर्ष से अधिक देर से जन्म या मृत्यु दर्ज कराने के लिए अब न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रस्तावित संशोधन) की अनुमति आवश्यक होगी। इसका उद्देश्य लोगों को समय पर पंजीकरण के लिए प्रेरित करना है।

आखिर मौत दर्ज होना इतना जरूरी क्यों?

भारत में हर मृत्यु केवल एक परिवार का नुकसान नहीं होती बल्कि, वह स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक डेटा पॉइंट भी होती है। यदि किसी जिले में अचानक हार्ट अटैक, डेंगू, कैंसर या किडनी रोग से मौतें बढ़ रही हैं तो, सरकार उसी आधार पर डॉक्टर, अस्पताल, दवाइयां और बजट तय करती है।

डिजिटल इंडिया का अगला चरण

2023 के संशोधन के बाद देश में जन्म-मृत्यु का राष्ट्रीय डिजिटल डेटाबेस बनाया जा रहा है। यह डेटा जरूरत पड़ने पर आधार, पासपोर्ट, राशन कार्ड, मतदाता सूची जैसी सरकारी प्रणालियों से जोड़ा जा सकता है। जन्म प्रमाणपत्र को कई सरकारी सेवाओं के लिए एकल प्रमाण के रूप में भी मान्यता दी गई है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी

एक्सपर्ट्स का कहना है कि केवल डिजिटल रिकॉर्ड बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी-

  • कई मौतें घर पर होती हैं।
  • निजी चिकित्सकों से मृत्यु का कारण प्रमाणित नहीं हो पाता।
  • कई परिवार कानूनी प्रक्रिया के डर या जानकारी के अभाव में मृत्यु दर्ज ही नहीं कराते।
  • आदिवासी और दूरदराज क्षेत्रों में पंजीकरण अब भी चुनौती है।
  • यही वजह है कि मृत्यु के कारणों का राष्ट्रीय डेटा कई बार अधूरा रह जाता है।

संसद में नया संशोधन क्यों?

2026 के संशोधन का मुख्य उद्देश्य हैं-

  • दो वर्ष से अधिक देरी पर पंजीकरण को सख्त बनाना।
  • फर्जी जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्रों पर रोक।
  • समय पर रिपोर्टिंग बढ़ाना।
  • राष्ट्रीय डिजिटल रिकॉर्ड को अधिक विश्वसनीय बनाना।

स्वास्थ्य नीति पर सीधा असर

  • अधूरा मृत्यु डेटा होने से महामारी का सही आकलन प्रभावित होता है।
  • कैंसर, हृदय रोग और डायबिटीज जैसी बीमारियों की वास्तविक तस्वीर नहीं मिलती।
  • राज्यों को मिलने वाले स्वास्थ्य संसाधनों का वितरण प्रभावित हो सकता है।
  • जीवन प्रत्याशा और मृत्यु दर के राष्ट्रीय अनुमान कमजोर पड़ सकते हैं।
  • डेटा जितना मजबूत, नीति उतनी बेहतर

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था रियल टाइम नागरिक पंजीयन प्रणाली (Real-Time Civil Registration System) पर आधारित होगी।

यदि जन्म और मृत्यु दोनों का रिकॉर्ड समय पर होगा तो क्या होगा फायदा?

  • महामारी का जल्दी पता चलेगा।
  • स्वास्थ्य बजट अधिक वैज्ञानिक बनेगा।
  • बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में फर्जीवाड़ा घटेगा।
  • जनसंख्या और वृद्धावस्था की योजना अधिक सटीक बनेगी।

प्राइवेसी भी बड़ा सवाल

जब जन्म और मृत्यु का डेटा विभिन्न सरकारी डेटाबेस से जुड़ रहा है, तब डेटा सुरक्षा और निजता की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। डिजिटल डेटा का उपयोग सार्वजनिक हित में हो, लेकिन नागरिकों की गोपनीयता सुरक्षित रहे, यह आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

एक्सपर्ट क्या कहते हैं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि मृत्यु का सही समय पर पंजीकरण नहीं होगा, तो स्वास्थ्य प्रणाली बीमारी के वास्तविक बोझ का आकलन नहीं कर पाएगी। मजबूत नागरिक पंजीयन प्रणाली किसी भी आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।

जानिए भारत में नया क्या बदलेगा?

  • जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण पर सख्ती।
  • दो वर्ष से अधिक देर पर न्यायिक अनुमति का प्रस्ताव।
  • राष्ट्रीय डिजिटल जन्म-मृत्यु डेटाबेस को मजबूत करना।
  • समय पर रिपोर्टिंग बढ़ाने पर जोर।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं के लिए अधिक भरोसेमंद डेटा।

भारत डिजिटल पहचान के दौर में प्रवेश कर चुका है। अब चुनौती केवल हर बच्चे का जन्म दर्ज करने की नहीं, बल्कि हर नागरिक की मृत्यु का भी समय पर और वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करने की है। क्योंकि किसी देश की स्वास्थ्य नीति केवल इस बात से नहीं बनती कि कितने लोग पैदा हुए, बल्कि इससे भी तय होती है कि कितने लोग, कब और किस कारण दुनिया से विदा हुए।