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सर्पदंश से हर साल 50 हजार मौतें, कर्नाटक ने स्नेकबाइट को नोटिफिएबल माना… देशभर में क्या है स्थिति?

Snakebite Cases in India: सर्पदंश की रिपोर्ट करना अनिवार्य होते ही कर्नाटक में मामलों और मौतों के आंकड़ों में ढाई गुना तक का इजाफा देखा गया। सवाल यह है कि क्या दूसरे राज्यों में भी हजारों मामले अब तक सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंच रहे हैं? जानिए कहां क्या स्थिति?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 04, 2026

Snakebite Case India

Snakebite Case India: भारत में हर साल 50 हजार लोग सर्पदंश का होते हैं शिकार, सबसे ज्यादा मामले कर्नाटक में। (AI Creative)

Snakebite Cases in India: कर्नाटक एक बार फिर सर्पदंश से होने वाली मौतों के मामले में देश में सबसे ऊपर है। पहली नजर में यह राज्य की विफलता लग सकती है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसका एक पहलू और है जो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। कर्नाटक ने फरवरी 2024 में सर्पदंश को 'नोटिफाएबल डिजीज' घोषित कर दिया था। यानी अब सरकारी ही नहीं, निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को भी हर सर्पदंश के मामले और उससे होने वाली मौत की सूचना देना अनिवार्य है। इसके बाद राज्य में दर्ज मामलों और मौतों की संख्या अचानक बढ़ गई। 2024 में शुरू हुए कर्नाटक के इस मॉडल के तहत सर्पदंश के इलाज को भी आयुष्मान के तहत जोड़ा गया। जिसके बाद रिपोर्टिंग के मामलों में सुधार देखा गया।

यहीं से उठा सवाल

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि, क्या कर्नाटक में वास्तव में सबसे ज्यादा सर्पदंश होते हैं, या फिर वह पहला राज्य है जिसने उन्हें ईमानदारी से गिनना शुरू किया है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के कई राज्यों में आज भी बड़ी संख्या में सर्पदंश के मामले सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचते ही नहीं। ग्रामीण इलाकों में कई मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, कई मौतें दूसरे कारणों में दर्ज हो जाती हैं और अनेक घटनाएं स्वास्थ्य प्रणाली से बाहर ही रह जाती हैं।

2025 में सबसे ज्यादा मौतें कर्नाटक में, 2024 में भी था अव्वल

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में देश में सर्पदंश से 431 मौतें दर्ज हुईं, इनमें अकेले कर्नाटक में 157 मौतें हुईं। 2024 में भी कर्नाटक सबसे ऊपर था। लेकिन इन आंकड़ों को देखने का एक दूसरा नजरिया भी है। यदि किसी राज्य में रिपोर्टिंग व्यवस्था मजबूत हो जाए, तो उसके आंकड़े स्वाभाविक रूप से बढ़ेंगे, जबकि कमजोर निगरानी वाले राज्यों में वास्तविक घटनाएं रिकॉर्ड से बाहर रह सकती हैं।

भारत में 'नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज' है सर्पदंश के मामले

भारत में सर्पदंश लंबे समय से 'नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज' माना जाता है। इसका मतलब है कि यह बीमारी हजारों लोगों को प्रभावित करती है, लेकिन नीति और निगरानी के स्तर पर इसे उतनी प्राथमिकता नहीं मिली, जितनी अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं को मिलती है। इसी कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सर्पदंश के मामलों और मौतों को अनिवार्य रूप से रिपोर्ट करने की सलाह दी थी।

अन्य राज्य भी शुरू करें पंजीयन तो बढ़े दिखेंगे आंकड़े

यदि सभी राज्य कर्नाटक की तरह हर मामले का पंजीकरण शुरू कर दें, तो संभव है कि राष्ट्रीय आंकड़े अचानक बढ़े हुए दिखाई दें। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह बुरी खबर नहीं होगी, बल्कि यह पहली बार वास्तविक तस्वीर सामने आने का संकेत होगा। बिना सही डेटा के न तो पर्याप्त एंटी-स्नेक वेनम भेजा जा सकता है, न डॉक्टरों की तैनाती की योजना बन सकती है और न ही सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों की पहचान हो सकती है।

कर्नाटक ने केवल रिपोर्टिंग ही नहीं बढ़ाई, राज्यस्तरीय कार्ययोजना भी लागू की

कर्नाटक ने केवल रिपोर्टिंग ही नहीं बढ़ाई, बल्कि सर्पदंश प्रबंधन के लिए राज्य स्तरीय कार्ययोजना भी लागू की है। इसका उद्देश्य समय पर इलाज, एंटी-वेनम की उपलब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों का प्रशिक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकता बढ़ाना है।

बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी सर्पदंश को 'उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग' की श्रेणी में रखा है। विश्व स्तर पर 2030 तक इससे होने वाली मौतों को आधा करने के लक्ष्य के तहत, भारत सरकार ने National Action Plan for Prevention and Control of Snakebite Envenoming (NAPSE) जारी किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी राज्यों से सर्पदंश को अनिवार्य रूप से रिपोर्ट करने का निर्देश दिया है।

कर्नाटक ने फरवरी 2024 में सर्पदंश को नोटिफाएबल डिजीज घोषित कर देश में पहल की थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को ऐसा करने की सलाह दी। मार्च 2026 तक संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक 8 राज्य यह व्यवस्था लागू कर चुके थे, जबकि जुलाई 2026 तक यह संख्या बढ़कर 12 राज्यों तक पहुंचने की जानकारी भी सामने आई है।

इलाज में देरी से हो जाती है मौत

एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत में ज्यादातर सर्पदंश खेतों, जंगल से लगे गांवों और मानसून के दौरान होते हैं। पीड़ितों का बड़ा हिस्सा किसान, खेतिहर मजदूर और आदिवासी समुदाय से आता है। ऐसे इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं दूर होने के कारण इलाज में देरी होती है, जिससे मौत का खतरा बढ़ जाता है। कई मामलों में मरीज पारंपरिक उपचार के भरोसे समय गंवा देते हैं और अस्पताल पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी होती है।

यही वजह है कि अब बहस केवल इस बात की नहीं रह गई है कि कर्नाटक में सबसे ज्यादा मौतें क्यों दर्ज हुईं। असली सवाल यह है कि क्या बाकी राज्यों में आंकड़े अधूरे हैं? यदि उत्तर 'हां' है, तो देश की सर्पदंश नीति भी अधूरी है। क्योंकि जिस समस्या को ठीक से गिना ही नहीं जाएगा, उसके समाधान की योजना भी पूरी नहीं बन सकेगी।

कर्नाटक ने एक आईना दिखाया है। हो सकता है इस आईने में दिखाई देने वाली तस्वीर बाकी राज्यों को असहज करे, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की दुनिया में सही इलाज की शुरुआत अक्सर सही आंकड़ों से ही होती है। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कर्नाटक आगे क्यों है, बल्कि यह है कि क्या बाकी राज्य अभी भी अपने वास्तविक सर्पदंश आंकड़ों से अनजान है?