
पहलवानों के आरोप से कोर्ट के फैसले तक, जानिए बृजभूषण शरण सिंह केस की पूरी कहानी। (फोटो: ChatGPT)
Brij Bhushan Acquitted : भारतीय खेल इतिहास में जनवरी 2023 का महीना एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मोड़ लेकर आया। देश को अंतरराष्ट्रीय पटल, राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों और ओलंपिक में पदक दिलाकर गौरवान्वित करने वाले भारत के शीर्ष पहलवानों ने किसी खेल नीतियां या सुविधाओं के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने ही खेल संघ के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह धरना प्रदर्शन केवल एक प्रशासनिक विरोध नहीं था, बल्कि यह खेल परिसरों के भीतर महिला एथलीटों की सुरक्षा, शक्ति के दुरुपयोग (Abuse of Power), और संस्थागत जवाबदेही पर उठाया गया एक बड़ा सवाल बन गया। इस पूरे विवाद के केंद्र में थे भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के तत्कालीन अध्यक्ष और तत्कालीन भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह। यह मामला न केवल सड़कों से लेकर संसद तक गूंजा, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) और दिल्ली की निचली अदालतों की दहलीज तक पहुंचा।
उल्लेखनीय है कि भारतीय खेल इतिहास के सबसे बहुचर्चित, संवेदनशील और राजनीतिक रूप से गर्माए कानूनी विवादों में से एक भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों की ओर से दर्ज कराए गए यौन उत्पीड़न के मामले में सोमवार, 3 अगस्त 2026 को दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। एडिशनल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार की अदालत ने पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को छह महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और आपराधिक धमकी से जुड़े सभी आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया है।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन की अगुवाई देश के कई नामचीन पहलवानों ने की। हालांकि, जब बात कानूनी आपराधिक शिकायतों (Criminal Complaints) की आई, तो कुल सात महिला पहलवानों ने दिल्ली पुलिस में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आधिकारिक लिखित शिकायतें दर्ज कराईं।
कानूनी और सामाजिक सुरक्षा के तहत, सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के अनुसार किसी भी यौन उत्पीड़न की पीड़िता या शिकायतकर्ता का नाम उजागर करना गैर-कानूनी है (BNS धारा 72 / IPC धारा 228A)। इसलिए, इन शिकायतकर्ताओं को पुलिस और अदालती दस्तावेजों के आधार पर इस प्रकार वर्गीकृत किया गया:
शिकायतकर्ता 1 (नाबालिग पहलवान): प्राथमिक शिकायतों में एक नाबालिग महिला पहलवान शामिल थी, जिसने बृजभूषण शरण सिंह पर अपनी शक्ति और पद का गलत इस्तेमाल करते हुए यौन उत्पीड़न करने का गंभीर आरोप लगाया।
शिकायतकर्ता 2 से 7 (छह वयस्क महिला पहलवान): छह अन्य बालिग महिला पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह और WFI के तत्कालीन सहायक सचिव विनोद तोमर पर गंभीर आरोप लगाए।
महिला पहलवानों की शिकायतें और कोर्ट केस का विवरण जानें । ( विजुअल: Google Gemini AI )
क) पॉक्सो मामला (POCSO Act Case) - पहले ही बंद
शिकायत: अप्रैल 2023 में एक नाबालिग पहलवान के पिता की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने बृजभूषण सिंह के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की थी।
क्लोजर रिपोर्ट: 16 जून 2023 को दिल्ली पुलिस की एसआईटी ने जांच में पर्याप्त सबूत न मिलने और शिकायतकर्ता द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत आरोप वापस लेने के बाद क्लोजर/कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की थी।
अदालती मोहर: 27 मई 2025 को पटियाला हाउस कोर्ट की पॉक्सो अदालत ने दिल्ली पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए पॉक्सो मामले को औपचारिक रूप से बंद कर दिया था।
ख) आईपीसी मामला (IPC Case) - 3 अगस्त 2026 को फैसला
चार्जशीट: 15 जून 2023 को दिल्ली पुलिस ने राऊज एवेन्यू कोर्ट में छह बालिग महिला पहलवानों की शिकायतों पर 1500 से अधिक पन्नों का आरोप पत्र दाखिल किया था।
तय की गई धाराएं: आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना), 354A (यौन उत्पीड़न), 354D (पीछा करना) और 506(1) (आपराधिक धमकी)।
ट्रायल और फैसला: 10 मई 2024 को कोर्ट ने आरोप तय किए। अभियोजन पक्ष ने कुल 32 गवाहों के बयान दर्ज कराए। 2 जुलाई 2026 को दोनों पक्षों की अंतिम बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया, और 3 अगस्त 2026 को अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
तारीखों, घटनाओं के क्रम और स्थानों को लेकर कई महत्वपूर्ण विरोधाभास
अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर के खिलाफ लगाए गए आरोपों को 'संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में विफल रहा। अदालत ने अपने निष्कर्ष में यह भी पाया कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में तारीखों, घटनाओं के क्रम और स्थानों को लेकर कई महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद थे। कोर्ट की कार्रवाई के अनुसार 3 साल से अधिक समय (1,133 दिन और 127 से अधिक सुनवाइयों) तक चली इस लंबी कानूनी लड़ाई के समापन के साथ ही भारतीय कुश्ती संघ से जुड़े आपराधिक मुकदमे का यह अध्याय पूरा हो गया है।
सर्वोच्च न्यायालय की ओर से निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ (2018) मामले में जारी कड़े निर्देशों और भारतीय न्याय संहिता (BNS धारा 72) के कानूनी प्रावधानों के तहत किसी भी यौन उत्पीड़न या आपराधिक शिकायतकर्ता महिला की पहचान उजागर करना कानूनन संज्ञेय अपराध है। इसीलिए, इस रिपोर्ट में भी छह शिकायतकर्ता पहलवानों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी गई है और उन्हें केवल कानूनी दस्तावेजों के अनुरूप "शिकायतकर्ता पहलवान A, B, C…" के रूप में ही संदर्भित किया गया है।
राउज एवेन्यू अदालत ने 3 अगस्त 2026 को इन आधारों पर फैसला दिया:
सुबूतों का अभाव और विरोधाभास (Contradictions in Statements)
अदालत ने माना कि गवाहों और शिकायतकर्ताओं के बयानों में आपस में तथा पुलिस को दी गई प्राथमिक शिकायतों में कई तकनीकी और तथ्यात्मक विसंगतियां थीं। विशेष रूप से घटनाओं के समय, स्थान और प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी को लेकर अभियोजन पक्ष कोई मजबूत साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
क्रिमिनल ज्यूरिसप्रूडेंस (आपराधिक न्यायशास्त्र) का मूल नियम है कि जब तक आरोप पूरी तरह से निर्विवाद रूप से साबित न हों, तब तक आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है। अदालत ने इसी आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी करने का आदेश जारी किया।
इस विवाद की शुरुआत जनवरी 2023 में हुई थी, जब देश के शीर्ष और पदक विजेता पहलवानों ने दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू किया। पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर पद और शक्ति के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए।
अनुचित शारीरिक स्पर्श (Unwanted Physical Contact): नेशनल कैंप्स, WFI कार्यालय तथा विदेशी दौरों के दौरान सांस जांचने या ट्रेनिंग के बहाने गलत तरीके से छूना।
व्यावसायिक अनुग्रह के बदले उत्पीड़न (Harassment for Favors): राष्ट्रीय टीम में चयन, ट्रायल और प्रतियोगिताओं में भाग लेने की अनुमति के बदले यौन अनुग्रह की मांग करना।
धमकाना और डराना (Criminal Intimidation): बात न मानने पर खेल करियर को नुकसान पहुंचाने और नेशनल कैंप्स से बाहर करने की धमकी देना।
दो अलग-अलग मामले: POCSO और IPC केस का अंतिम निष्कर्ष
बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कानूनी कार्यवाही दो अलग-अलग पटरियों पर चली थी, जिनमें से दोनों में अब विधिक निष्कर्ष निकल चुका है:
25 अप्रैल 2023: पहलवानों की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा था कि शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई।
28 अप्रैल 2023: पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया और उसी दिन दो एफआईआर दर्ज कीं।
4 मई 2023: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि चूंकि एफआईआर दर्ज हो चुकी है और पीड़ितों को सुरक्षा दे दी गई है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट का काम पूरा हुआ। आगे के ट्रायल के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट या हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाए।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने केवल एफआईआर और सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त किया था, जबकि ट्रायल और अंतिम फैसले का कार्य दिल्ली की निचली ट्रायल कोर्ट (राऊज एवेन्यू कोर्ट) द्वारा पूरा किया गया।
भले ही अदालत ने सबूतों के अभाव में बृजभूषण शरण सिंह को बरी कर दिया है, लेकिन इस साढ़े तीन साल लंबे आंदोलन और कानूनी लड़ाई ने भारतीय खेल जगत और संस्थागत ढांचे को हमेशा के लिए बदल दिया है:
इस घटनाक्रम के बाद भारत सरकार और भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) ने देश के सभी राष्ट्रीय खेल महासंघों (NSFs) में पॉश अधिनियम (POSH Act - Sexual Harassment at Workplace) के तहत निष्पक्ष और स्वतंत्र आंतरिक शिकायत समितियों (Internal Complaints Committees - ICC) के गठन को अनिवार्य व सक्रिय कर दिया।
विवाद के चलते बृजभूषण शरण सिंह को भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था और WFI की दैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए एड-हॉक कमेटी तथा बाद में नए चुनाव कराए गए।
बहरहाल,3 अगस्त 2026 को दिल्ली की अदालत की ओर से सुनाया गया यह फैसला बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर के लिए एक बड़ी कानूनी राहत लेकर आया है। जहां पॉक्सो मामला पहले ही क्लोजर रिपोर्ट के माध्यम से बंद हो चुका था, वहीं IPC की धाराओं के तहत चल रहा ट्रायल भी अब आरोपियों के बरी होने के साथ समाप्त हो गया है। कानूनी रूप से आपराधिक कार्यवाही भले ही यहां समाप्त हो गई हो, लेकिन खेल प्रशासन, एथलीटों की सुरक्षा और खेल परिसरों में शक्ति के सही इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।
Updated on:
03 Aug 2026 02:57 pm
Published on:
03 Aug 2026 02:14 pm
