
Light Pollution Artificial Lights in India: आर्टिफिशियल लाइट के नुकसान झेल रहे प्रकृति और इंसान! (AI Creative)
Light Pollution: जब भी प्रदूषण की बात होती है तो, सबसे पहले हवा, पानी और मिट्टी का ख्याल आता है। लेकिन एक ऐसा प्रदूषण भी है, जो हर रात हमारे शहरों के ऊपर फैल रहा है और चुपचाप इंसानों से लेकर पक्षियों, कीड़ों और अन्य वन्यजीवों तक की जिंदगी बदल रहा है। इसे कहते हैं लाइट पॉल्यूशन (Light Pollution) या प्रकाश प्रदूषण। रात में जगमगाते शहर, एलईडी स्ट्रीट लाइट, ऊंची इमारतों की रोशनी, विज्ञापन बोर्ड और 24 घंटे चमकते औद्योगिक क्षेत्र विकास की पहचान माने जाते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यही कृत्रिम रोशनी अब जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए एक नया पर्यावरणीय संकट बनती जा रही है।
प्रकृति ने दिन और रात का चक्र करोड़ों वर्षों में बनाया है। इसी चक्र के अनुसार इंसानों, जानवरों, पक्षियों और पौधों की जैविक घड़ी काम करती है। लेकिन रात में बढ़ती कृत्रिम रोशनी इस प्राकृतिक व्यवस्था को बिगाड़ रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), कई वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध बताते हैं कि अत्यधिक कृत्रिम रोशनी केवल आसमान को नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रही है।
रात के समय अंधेरा होने पर शरीर मेलाटोनिन नामक हार्मोन बनाता है, जो अच्छी नींद के लिए जरूरी है। लेकिन मोबाइल, एलईडी लाइट और तेज कृत्रिम रोशनी के लंबे संपर्क से इस हार्मोन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई चिकित्सा शोधों के अनुसार लंबे समय तक नींद के प्राकृतिक चक्र में व्यवधान आने से मोटापा, मधुमेह, मानसिक तनाव और हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि लाइट पॉल्यूशन का सबसे गंभीर असर उन जीवों पर पड़ रहा है, जिनका जीवन रात पर निर्भर करता है।
दुनिया के करोड़ों प्रवासी पक्षी रात में तारों और चंद्रमा की मदद से हजारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। लेकिन शहरों की तेज रोशनी उन्हें भ्रमित कर देती है। कई पक्षी ऊंची इमारतों से टकरा जाते हैं या अपनी दिशा बदल देते हैं।
रात में सक्रिय पतंगे और अन्य परागण करने वाले कीट कृत्रिम रोशनी की ओर आकर्षित होकर बड़ी संख्या में मर जाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे परागण प्रभावित हो सकता है, जिसका असर कृषि और प्राकृतिक वनस्पतियों पर भी पड़ सकता है।
चमगादड़ रात में भोजन की तलाश करते हैं, लेकिन अत्यधिक रोशनी वाले क्षेत्रों से वे बचने लगे हैं। इससे उनके शिकार का क्षेत्र और भोजन का पैटर्न बदल रहा है।
समुद्री कछुओं के बच्चे अंडों से निकलने के बाद समुद्र की प्राकृतिक चमक की दिशा में बढ़ते हैं। लेकिन समुद्र तटों पर कृत्रिम रोशनी होने पर वे गलत दिशा में चले जाते हैं, जिससे उनकी मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लगातार बढ़ता प्रकाश प्रदूषण कई जीवों के प्रजनन, भोजन खोजने, प्रवास और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। वहीं एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कुछ संवेदनशील प्रजातियों की आबादी में गिरावट आ सकती है। यही कारण है कि अब प्रकाश प्रदूषण को जैव विविधता संरक्षण की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
भारत में तेजी से फैलते शहर, स्मार्ट एलईडी स्ट्रीट लाइट, एक्सप्रेस-वे, औद्योगिक क्षेत्र और रातभर जगमगाते विज्ञापन बोर्ड कृत्रिम रोशनी बढ़ा रहे हैं। हालांकि भारत में लाइट पॉल्यूशन पर अभी व्यापक राष्ट्रीय नीति नहीं है, लेकिन खगोल वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से इस विषय पर ध्यान देने की जरूरत बता रहे हैं। कुछ स्थानों पर डार्क स्काई क्षेत्रों को विकसित करने की पहल भी शुरू हुई है, ताकि प्राकृतिक रात्रि आकाश और जैव विविधता दोनों की रक्षा की जा सके।
विकास के लिए रोशनी जरूरी है, लेकिन हर जगह और हर समय रोशनी जरूरी नहीं। जैसे स्वच्छ हवा और साफ पानी जीवन के लिए आवश्यक हैं, वैसे ही प्राकृतिक अंधेरा भी पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रकाश प्रदूषण केवल बिजली की बर्बादी का सवाल नहीं है, बल्कि यह इंसानों की नींद, वन्यजीवों के अस्तित्व और जैव विविधता के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले वर्षों में यदि शहरों की रोशनी और बढ़ती रही, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि धरती को बचाने के लिए केवल पेड़ लगाना ही नहीं, बल्कि रात का प्राकृतिक अंधेरा भी बचाना होगा।
Updated on:
03 Aug 2026 02:37 pm
Published on:
03 Aug 2026 02:37 pm
