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कावेरी जल विवाद सुलझेगा या आएगा नया मोड़? जानिए कर्नाटक और तमिलनाडु में पानी की जंग में छिपा ‘राजनीति का कड़वा सच’

क्या आप जानते हैं कि कावेरी नदी (Cauvery River) के पानी के पीछे सिर्फ जल का मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीति का जहर भी छिपा है? जानिए कैसे सूखे की आड़ में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच टकराव ने एक नई करवट ली है…
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भारत

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Vinay Shakya

Jul 31, 2026

Cauvery River Water Dispute

कावेरी जल विवाद (सांकेतिक इमेज- AI)

Cauvery River Water Dispute: कावेरी नदी जल विवाद, इन दिनों फिर से सुर्खियों में है। इस बार हालात और भी जटिल हो गए हैं। कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य के बीच पानी के बंटवारे को लेकर हालिया घटनाक्रम ने इस विवाद को एक नए राजनीतिक मोड़ पर ला दिया है।

जल विवाद में नवीनतम मोड़ और राजनीतिक स्थिति

CWRC का आदेश और कर्नाटक की प्रतिक्रिया: कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने 28 जुलाई 2026 से 15 दिनों के लिए कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक्स पानी छोड़ने का निर्देश दिया है। कर्नाटक सरकार ने इस आदेश को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। कर्नाटक का कहना है कि मौजूदा सूखा और जलाशयों में कम जल स्तर के कारण वह यह पानी नहीं छोड़ सकता है।

सूखा और जलाशयों की स्थिति

कर्नाटक ने CWRC को बताया कि जून में कावेरी बेसिन के जलाशयों में लगभग कोई जल प्रवाह नहीं हुआ है और जुलाई में हुई बारिश से भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की 53वीं बैठक में तमिलनाडु के प्रतिनिधि ने बताया कि जून 1 से जुलाई 19 तक उन्हें सिर्फ 3.442 TMC पानी मिला, जबकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार उन्हें 28.337 TMC पानी मिलना चाहिए था। यह मात्र 12.15% है। वहीं, कर्नाटक ने बताया कि 4 प्रमुख जलाशयों में कुल मिलाकर 48.979 TMC पानी है, जबकि 30-वर्ष औसत 81.528 TMC है। यह केवल 38.79% है।

राजनीतिक पहल और बातचीत की संभावना

25 जुलाई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बीच बातचीत की संभावना सामने आई, जिसमें मेकेदातु बांध परियोजना और जल साझा करने पर चर्चा हो सकती है। इसके बाद 3 अगस्त को बेंगलुरु में दोनों मुख्यमंत्रियों की मुलाकात तय हुई है, जिसमें मेकेदातु, महादयी और अन्य जल परियोजनाओं पर चर्चा होगी।

तमिलनाडु की प्रतिक्रिया

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने मई में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मेकेदातु परियोजना को खारिज करने की अपील की थी, क्योंकि उनका मानना है कि इससे निचले राज्यों को तय जल आपूर्ति प्रभावित होगी। इसके अलावा, उन्होंने उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ रणनीति तैयार की है ताकि कर्नाटक के प्रस्ताव का विरोध किया जा सके।

कर्नाटक में सूखा और आपात स्थिति

18 जुलाई को मुख्यमंत्री शिवकुमार ने सूखा की गंभीरता को देखते हुए 20 जुलाई को आपात कैबिनेट बैठक बुलाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल जलाशयों का पानी केवल पीने के लिए आरक्षित है, और कृषि या अन्य उपयोगों के लिए तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक पर्याप्त जलाशयों में पानी नहीं आ जाता।

क्या राजनीति की रगों में है जहर?

यह विवाद केवल पानी का नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता, क्षेत्रीय दबाव और संसाधन नियंत्रण का भी मामला बन चुका है। कर्नाटक में सूखे का हवाला देकर पानी रोकना, तमिलनाडु में राजनीतिक नेतृत्व द्वारा केंद्र से हस्तक्षेप की मांग और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बातचीत, ये सभी मुद्दे संकेत देते हैं कि कावेरी जल विवाद का मामला अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन गया है।

क्या आगे क्या हो सकता है?

3 अगस्त की मुलाकात इस विवाद में एक नया मोड़ ला सकती है। अगर दोनों राज्य बातचीत के जरिए समझौता कर लेते हैं तो यह एक सकारात्मक संकेत होगा। अगर कर्नाटक सुप्रीम कोर्ट या CWRC के आदेश को चुनौती देता है तो मामला फिर से अदालत या केंद्र सरकार तक जा सकता है। हालांकि, यह जानना महत्वपूर्ण है कि अब कावेरी जल विवाद सिर्फ पानी की कमी का नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णयों और राज्यों के बीच संतुलन का भी मामला है। 3 अगस्त की मुलाकात और उसके बाद की कार्रवाई पर नजर रखना जरूरी है। यह मुद्दा सीधे तौर पर आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।