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जलवायु परिवर्तन का कृषि पर हो रहा बुरा असर, जानें मानसूनी चुनौतियों से निपटने के उपाय

क्या आप जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर कृषि पर पड़ रहा है। कुछ स्मार्ट तकनीकें और वैज्ञानिक उपाय किसानों के लिए बनी जलवायु परिवर्तन की चुनौती को कम कर सकते हैं।
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भारत

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Vinay Shakya

Aug 08, 2026

Climate change effect on agriculture

सांकेतिक इमेज (File Photo- IANS)

जलवायु परिवर्तन का असर भारत के कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण किसान अब केवल मौसम का इंतजार नहीं कर सकते हैं, बल्कि उन्हें तैयारी करनी होगी। हालांकि, अग्रिम तैयारी से खेती में स्थिरता लाना संभव है। लगातार बदल रहे मौसम के प्रभाव से निपटने के लिए वर्तमान में वैज्ञानिक और सरकारी स्तर पर प्रयास जारी हैं। आइए जानते हैं कि वैज्ञानिक और सरकारी स्तर पर कौन-कौन सी रणनीतियां अपनाई जा रही हैं और भारतीय किसान अपने खेतों में कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं?

अग्रिम तैयारी: विविधता और समय में बदलाव

कई अध्ययनों से पता चलता है कि फसल विविधीकरण (Crop diversification), बुवाई का समय बदलना, फसल चक्र (Crop rotation) और तनाव-प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग सबसे प्रभावी और किफायती उपाय हैं। उदाहरण के लिए, धान में ट्रांसप्लांटिंग का समय बदलने, दूरी कम करने और नाइट्रोजन प्रबंधन से फसल की पैदावार 37.5% से 168% तक बढ़ सकती है। इसी तरह, सूखा-प्रतिरोधी और कम अवधि वाली मूंगफली की किस्मों ने कर्नाटक में बड़े स्तर पर पैदावार बढ़ी है।

सरकारी योजनाएं और संस्थागत समर्थन

सरकार ने कई मिशन और कार्यक्रम शुरू किए हैं, जो किसानों को मौसम के अनुकूल खेती की ओर ले जा रहे हैं। इनमें प्रमुख है नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (NMSA), जो वर्षा-आश्रित क्षेत्रों, जल प्रबंधन और मिट्टी स्वास्थ्य पर केंद्रित है। इसके अलावा, ICAR द्वारा 2011 में शुरू की गई नेशनल इनोवेशन्स इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर (NICRA) पहल में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, मिट्टी स्वास्थ्य, फसल उत्पादन और पशुपालन जैसे चार स्तंभ शामिल हैं।

स्मार्ट तकनीकें और मिट्टी का संरक्षण

बदलते जलवायु के प्रभाव से निपटने के लिए स्मार्ट तकनीकें, मिट्टी का संरक्षण और फसल चक्र जैसे प्रयास फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जल संरक्षण, मिट्टी में कार्बन बढ़ाना, बचे हुए फसल अवशेषों का उपयोग, सूखा और बाढ़ सहनशील किस्मों की खेती और क्षेत्र-विशिष्ट खेती इन प्रयासों में शामिल है। इसके साथ ही चावल की खेती में 'ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग' तकनीक से मीथेन उत्सर्जन 40 से 50% तक कम किया जा सकता है और ड्राई डायरेक्ट-सीडिंग से यह 70 से 75% तक घट सकता है। कार्बन सिंक के रूप में मिट्टी में कार्बन जमा करने से भी दीर्घकालिक लाभ मिलते हैं।

प्राकृतिक खेती: मिट्टी की ताकत और पानी की बचत

आंध्र प्रदेश में प्राकृतिक खेती का उदाहरण है, जहां गाय के मूत्र और गुड़ जैसे जैविक तत्वों से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ी और तूफानों में भी पानी जमीन में समा गया। हालांकि, इस पद्धति को बढ़ावा देने के लिए बजट और आपूर्ति शृंखला की कमी एक चुनौती बनी हुई है।

उन्नत बीज और वैज्ञानिक समर्थन

ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम अस्थिर हो रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने जलवायु-प्रतिरोधी बीज विकसित किए हैं, जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देते हैं और रोग-प्रतिरोधी होते हैं। लेकिन इन बीजों की उपलब्धता, किसानों को जानकारी और प्रशिक्षण देना उतना ही जरूरी है, जितना इन्हें विकसित करना।

सैटेलाइट और डेटा आधारित हस्तक्षेप

विश्वविद्यालयों और शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट डेटा का उपयोग कर खेती के लिए जलवायु-संबंधित हस्तक्षेपों को बेहतर ढंग से लक्षित करने की दिशा में काम शुरू किया है। इससे यह समझना आसान होगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी तकनीक या उपाय सबसे प्रभावी होंगे।

किसान के लिए मौसम परिवर्तन बड़ी चुनौती

मौसम परिवर्तन अब केवल भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती है। यदि किसान विविधीकरण, जल प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, जलवायु-प्रतिरोधी बीज और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग करें, तो वे खेती को अधिक स्थिर और लाभदायक बना सकते हैं। किसानों को कृषि विभाग या स्थानीय कृषि वैज्ञानिक से संपर्क करके, उपलब्ध योजनाओं और तकनीकों की जानकारी लेना और उन्हें अपने खेत में आजमाना चाहिए।

किसानों के लिए व्यावहारिक तैयारी

  • फसल विकल्प बदलें: कम पानी में तैयार होने वाली तिल, उड़द, मूंग, मड़ुआ, मक्का जैसी फसलों पर ध्यान दें।
  • धान की तैयारी में सावधानी बरतें: कम अवधि वाली या हाइब्रिड किस्में चुनें, और बारिश पर निर्भरता कम करें।
  • फार्म पॉन्ड बनाएं: बारिश का पानी इकट्ठा करें, सिंचाई, मत्स्य पालन और भूजल संरक्षण के लिए उपयोग करें।
  • समय पर सिंचाई करें: मिट्टी की नमी और मौसम पूर्वानुमान के आधार पर प्रोटेक्टिव इरिगेशन अपनाएं।
  • बुवाई रणनीति बदलें: क्षेत्र कम करें, बीज मात्रा बढ़ाएं, अंतरफसली खेती अपनाएं।