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भारत का हाइड्रोजन प्लान: क्या साकार हो पाएगा हमारा स्वच्छ ऊर्जा का सपना ?

Hydrogen: भारत ने कलपक्कम के IGCAR में परमाणु ऊर्जा की मदद से हाइड्रोजन उत्पादन की नई तकनीक का सफल प्रदर्शन किया है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत नए मानक लागू कर भारत वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बाज़ार में अग्रणी बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
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भारत

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MI Zahir

Aug 08, 2026

India Hydrogen Mission News

स्वच्छ ऊर्जा के नए दौर में हाइड्रोजन भारत की वैश्विक ताकत बनने की ओर बढ़ रहा है। (विजुअल: ChatGPT)

भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य में हाइड्रोजन की भूमिका तेजी से आकार ले रही है। हाल ही में देश ने एक बड़ी तकनीकी सफलता हासिल की है -परमाणु ऊर्जा से हाइड्रोजन उत्पादन की दुनिया की पहली विशेष सुविधा का उद्घाटन। इस उपलब्धि ने भारत को वैश्विक मानकों से जोड़ते हुए यह सवाल खड़ा कर दिया है: भारत हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में किस हद तक वैश्विक मानकों के अनुरूप है? यह पहल केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के पर्यावरण संरक्षण लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में भी एक निर्णायक मोड़ है। यदि भारत इस मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता है, तो विदेशी ईंधन पर निर्भरता काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

भारत ने किया इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र में फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर का उपयोग

भारत ने हाल ही में तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) में फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) से प्राप्त ऊष्मा का उपयोग करते हुए कॉपर–क्लोरीन (Cu–Cl) थर्मोकेमिकल चक्र पर आधारित हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा का उद्घाटन किया है। यह सुविधा तकनीकी प्रदर्शन इकाई के रूप में विकसित की गई है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य परमाणु ऊर्जा से कार्बन-रहित (Zero-Carbon) हाइड्रोजन उत्पादन की व्यावहारिक क्षमता को परखना है। परमाणु रिएक्टरों के सह-उत्पाद के रूप में मिलने वाली ऊष्मा का ऐसा नवोन्मेषी उपयोग वैश्विक अनुसंधान के इतिहास में दुर्लभ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रयोग आने वाले समय में देश के ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह बदल सकता है।

जानिए इस तकनीक की खासियत

इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपेक्षाकृत कम तापमान (लगभग 500°C तक) पर कार्य करती है और पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस की तुलना में इसकी ऊर्जा दक्षता काफी अधिक है। यह अत्याधुनिक सुविधा भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC, मुंबई) ने विकसित की है और IGCAR ने स्थापित की है, और इसका उद्घाटन परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव व परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार मोहंती ने किया। अहम बात यह है कि कम तापमान पर काम करने की वजह से संयंत्र के रखरखाव का खर्च और उपकरणों का क्षरण बहुत कम हो जाता है। साथ ही, इलेक्ट्रोलिसिस के मुकाबले इसमें बिजली की खपत कम होने से उत्पादन लागत में भारी गिरावट संभव है।

भारत ने भी अपनी प्रमाणन योजना शुरू कर दी

वैश्विक स्तर पर, हाइड्रोजन ऊर्जा के लिए मानक और प्रमाणन व्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, ISO स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानक पूरी तरह लागू होने की दिशा में हैं, और भारत ने भी इसी क्रम में अपनी राष्ट्रीय प्रमाणन योजना शुरू कर दी है। इसके अलावा, IEA की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने नवीकरणीय अमोनिया और मीथनॉल के लिए उत्सर्जन सीमाएं निर्धारित की हैं, जो वैश्विक मानकों के बिल्कुल अनुरूप हैं। इन स्पष्ट उत्सर्जन सीमाओं के निर्धारण से विदेशी निवेशकों का भारतीय हरित ऊर्जा बाज़ार में विश्वास मजबूत होगा। साथ ही, घरेलू स्तर पर उत्पादन प्रक्रिया में एकरूपता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

पांच संस्थानों ने मिलकर 34 नए मानक जारी किए

भारत की राष्ट्रीय पहल, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM), ने भी सुरक्षा प्रोटोकॉल और तकनीकी मानकों को मजबूत करने की दिशा में ठोस कार्य किया है। हाल ही में आयोजित भारत–यूके सम्मेलन में BIS, PESO और PNGRB जैसे शीर्ष संस्थानों ने मिलकर हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और अंतिम उपयोग के लिए एकीकृत सुरक्षा ढांचे पर विस्तृत चर्चा की। NGHM के तहत, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS), OISD, PESO, PNGRB और MoRTH जैसे पांच प्रमुख संस्थानों ने मिलकर 34 नए मानक जारी किए हैं, जिन्हें मिलाकर अब कुल 87 मानक तैयार हो चुके हैं। सुरक्षा से जुड़े इन दिशा-निर्देशों का पालन करने से किसी भी प्रकार की औद्योगिक दुर्घटनाओं की आशंका न्यूनतम हो जाएगी। परिवहन और भंडारण क्षेत्र के लिए तय किए गए ये नए नियम उद्योगों को सुरक्षित परिचालन का एक ठोस ढांचा प्रदान करते हैं।

भारत ने ISO जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौते किए

इसके अलावा, भारत ने ISO जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए सात महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठाने में मदद मिल रही है। हालांकि, परीक्षण सुविधाओं की कमी अभी भी एक व्यावहारिक चुनौती बनी हुई है — वर्तमान में तय 87 मानकों में से केवल छह के लिए ही भारत में प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं, और उनमें से भी चार आंशिक रूप से ही आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। जब तक देश भर में विश्वस्तरीय परीक्षण प्रयोगशालाओं का जाल नहीं बिछ जाता, तब तक गुणवत्ता का पूर्ण सत्यापन थोड़ा कठिन रहेगा। इसलिए निजी क्षेत्र और सरकारी विभागों को मिलकर बुनियादी अनुसंधान और ढांचागत विकास में त्वरित निवेश करने की आवश्यकता है।

परमाणु ऊष्मा आधारित हाइड्रोजन उत्पादन तकनीकी उपलब्धियां इसे मजबूत बनाती हैं

भारत की यह निरंतर प्रगति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि देश हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक मानकों के अत्यंत करीब पहुंच रहा है। परमाणु ऊष्मा आधारित हाइड्रोजन उत्पादन जैसी अभूतपूर्व तकनीकी उपलब्धियां भारत के पक्ष को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाती हैं। लेकिन भविष्य की मांग को देखते हुए परीक्षण बुनियादी ढांचे और व्यापक प्रमाणन नेटवर्क को और अधिक विकसित करना अनिवार्य है। यदि भारत वैश्विक मानकों को पूरी तरह अपनाने में सफल रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए भारतीय हाइड्रोजन स्वीकार करना आसान हो जाएगा। इससे भारतीय हरित हाइड्रोजन को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में प्रमुख स्थान प्राप्त होगा।

इसका आपके जीवन पर क्या प्रभाव हो सकता है?

अगर भारत हाइड्रोजन ऊर्जा में वैश्विक मानकों के अनुरूप सफलता प्राप्त करता है, तो इससे आम नागरिकों के लिए स्वच्छ ऊर्जा की लागत कम होगी, भारी उद्योगों में प्रदूषणकारी ईंधन का उपयोग घटेगा और रोजगार के लाखों नए अवसर सृजित होंगे। इसके अतिरिक्त, भारत दक्षिण एशिया और यूरोप को हाइड्रोजन निर्यात करने वाले एक प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में उभर सकता है। सामान की ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन में हाइड्रोजन का इस्तेमाल शुरू होने से पेट्रोल-डीजल की महंगाई से राहत मिलेगी। साथ ही, शहरों में हवा की गुणवत्ता सुधरने से प्रत्यक्ष रूप से आम जनमानस के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।

अब आगे क्या हो सकता है?

भविष्य के रोडमैप के तहत भारत को जल्द से जल्द घरेलू परीक्षण सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition Agreements) को मजबूत करना चाहिए और क्षेत्रीय हाइड्रोजन हब विकसित करने की गति तेज़ करनी चाहिए। इससे न केवल देश की ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होगी, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में एक महाशक्ति के रूप में भारत का दबदबा भी बढ़ेगा। अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना इस पूरी प्रक्रिया को गति देने की मुख्य कुंजी साबित होगा। यदि नीतियां इसी तरह पारदर्शी और दूरदर्शी रहीं, तो भारत सदी के अंत से पहले ही शून्य-कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर लेगा।

अगला कदम है इस आधार को मजबूत करना और वाणिज्यिक स्तर पर लागू करना

बहरहाल, इस तकनीकी सफलता और मानक निर्माण की दिशा में भारत की यह प्रगति एक अत्यंत सकारात्मक संकेत है। अब अगला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है इस मजबूत आधार का विस्तार करना और इसे बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक (Commercial) स्तर पर लागू करना — ताकि हाइड्रोजन ऊर्जा आपके और हमारे दैनिक जीवन में भी एक स्वच्छ, टिकाऊ, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा का व्यावहारिक विकल्प बन सके। सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय प्रोत्साहन योजनाएं और सब्सिडी इस तकनीक को आम उपभोक्ता की पहुंच तक लाने में उत्प्रेरक का काम करेंगी। आम जनता का विश्वास और सहयोग ही इस हरित क्रांति को ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह सफल बनाएगा।