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क्लास रूम खाली, कोचिंग हाउसफुल, भारत में अरबों रुपए के ट्यूशन कारोबार की गुलाम हो गई शिक्षा व्यवस्था!

Coaching model Indian Education System: क्लासरूम खाली, कोचिंग हाउसफुल, भारत की शिक्षा व्यवस्था कोचिंग के सहारे, सुबह स्कूल में हाजिरी और दिनभर कोचिंग में पढ़ाई कर रहे हैं स्टूडेंट्स, आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो सवाल लाजमी है आखिर इंडियन एजुकेशन सिस्टम किसकी गुलाम बन गई?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 20, 2026

Indian Education System Coaching Model

Indian Education System Coaching Model: भारतीय शिक्षा व्यवस्था कैसी? (AI Creative)

Coaching model Indian Education System: भारत में स्कूल की कक्षा अब सीखने की जगह से ज्यादा एक पड़ाव बनकर रह गई है। असली तैयारी शाम को कोचिंग सेंटर में शुरू होती है। यह बदलाव अब आंकड़ों में भी साफ दिखता है। जो बताता है कि भारत में स्कूलों में बच्चे सिर्फ हाजिरी लगाने पहुंचते हैं, असल में बेहतर पढ़ाई के लिए उन्हें दिनभर कोचिंग के सहारे रहना पड़ रहा है। पैशन के लिए कहीं ये फैशन का दौर तो नहीं है, जहां कोचिंग इंस्टीट्यूट अरबों की कमाई कर रहे हैं और स्टूडेंट्स मानसिक तनाव झेलकर भविष्य के लिए लड़ते नजर आ रहे हैं।

कितना बड़ा है कोचिंग इकोसिस्टम

IMARC Group के मुताबिक भारत का कोचिंग इंस्टीट्यूट बाजार 2025 में करीब 7.2 अरब डॉलर का था, जिसके 2034 तक बढ़कर 17.8 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इसमें ऑनलाइन कोचिंग का हिस्सा अलग से 2025 में 51 करोड़ डॉलर आंका गया, जो 2034 तक करीब 2 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

यह उछाल सीटों की भारी कमी से जुड़ा है। एक विश्लेषण के मुताबिक 2024 में करीब 12 लाख छात्रों ने IIT-NIT की मात्र 17,385 और 6,500 सीटों के लिए होड़ लगाई, जबकि 23 लाख NEET-UG अभ्यर्थी सिर्फ 1,08,940 MBBS सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। UPSC सिविल सेवा परीक्षा में भी हर साल औसतन 5.5 से 6 लाख उम्मीदवार प्रीलिम्स में बैठते हैं, जबकि चुने जाने वालों की संख्या कुछ सौ ही होती है।

स्कूली शिक्षा पर असर

सरकार के अपने सर्वे में यह असर दर्ज हो चुका है। शिक्षा मंत्रालय के 2025 के व्यापक मॉड्यूलर सर्वे के अनुसार देशभर में लगभग 27% छात्र निजी कोचिंग लेते हैं। कई स्कूल, खासकर JEE-NEET फैक्ट्री बन चुके शहरों में, अब खुद कोचिंग टाइमटेबल के इर्द-गिर्द ढल गए हैं। सुबह स्कूल, बाकी दिन कोचिंग की पढ़ाई। नतीजा यह होता है कि छात्र स्कूल में सिर्फ हाजिरी के लिए मौजूद रहते हैं, जबकि असली एकाग्रता प्रश्न-बैंक और टेस्ट सीरीज पर केंद्रित हो जाती है।

शहर बनाम गांव: पहुंच की खाई

वही सर्वे बताता है कि कोचिंग की पहुंच और खर्च में बड़ा शहरी-ग्रामीण अंतर है। शहरों में 30.7% छात्र कोचिंग लेते हैं, गांवों में यह आंकड़ा 25.5% है। शहरी परिवार हर बच्चे पर औसतन 3,988 रुपए सालाना कोचिंग पर खर्च करते हैं। जो ग्रामीण औसत 1,793 रुपए से दोगुने से भी ज्यादा है और उच्च-माध्यमिक स्तर पर शहरी खर्च बढ़कर लगभग 9,950 रुपए तक पहुंच जाता है। यानी गांव और छोटे शहरों के छात्रों के पास न सिर्फ कम संसाधन हैं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण कोचिंग तक पहुंचने के लिए उन्हें अक्सर घर छोड़कर कोटा, दिल्ली या अन्य बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। इससे परिवार पर आर्थिक और भावनात्मक दोनों तरह का बोझ बढ़ता है।

कोचिंग बनाम क्लासरूम लर्निंग

कोचिंग सिस्टम का सबसे बड़ा तर्क रिजल्ट-ओरिएंटेड पढ़ाई है। तय सिलेबस, बार-बार टेस्ट, रैंक के हिसाब से बैच बांटना। लेकिन इसकी कीमत भी भारी है। कोटा जैसे शहरों में दबाव का सबसे दर्दनाक पहलू छात्रों की मानसिक सेहत पर पड़ने वाला असर है।

2024 में कोटा में 17 कोचिंग छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2023 में यह आंकड़ा 26 था। यह सिलसिला हर साल दोहराया जाता रहा है और प्रशासन को कमरों में 'एंटी-सुसाइड' डिवाइस जैसे कदम उठाने पड़े हैं। इसके उलट स्कूल आधारित क्लासरूम लर्निंग में गति भले धीमी हो, पर वहां समग्र विकास, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां और उम्र के हिसाब से मानसिक सहयोग की गुंजाइश ज़्यादा रहती है। यह सिर्फ रैंक केंद्रित कोचिंग मॉडल में अक्सर पीछे छूट जाती है।

आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की मुख्यधारा शिक्षा व्यवस्था अब काफी हद तक कोचिंग मॉडल पर निर्भर हो चुकी है। स्कूल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की जगह ले नहीं पाए, इसीलिए कोचिंग उद्योग अरबों डॉलर का हो गया। सवाल यह नहीं कि कोचिंग खत्म हो, बल्कि यह है कि क्या स्कूली शिक्षा को इतना सक्षम बनाया जा सकता है कि छात्रों को दोहरी पढ़ाई और उससे जुड़े मानसिक दबाव से राहत मिल सके। वहीं छोटे शहरों-गांवों के छात्रों को भी बराबर मौका मिले।