
Deep Sea Microplastics Indian Pacific Ocean : भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए ये खतरनाक संकेत। (AI Creactive)
Deep Sea Microplastics: अब प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ समुद्र की सतह तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों को पहली बार भारतीय और प्रशांत महासागर में 2,000 मीटर से ज्यादा गहराई में रहने वाले घोंघों (snails) और मसल्स (mussels) के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं। इस खोज को खतरा मान रहे वैज्ञानिक के माथे चिंता के बल पड़ गए हैं। क्योंकि जिन जीवों का अध्ययन किया गया है, वे हाइड्रोथर्मल वेंट (Hydrothermal Vents) जैसे पृथ्वी के सबसे अलग-थलग और चरम समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में रहने वाले हैं। वे हैरान हैं और सोच रहे हैं कि आखिर दुनिया की सबसे सुरक्षित जगहों में से एक समुद्र की हजारों मीटर की गहराई तक प्लास्टिक पहुंचा कैसे?
बता दें कि वैज्ञानिको को शोध में 92% जीवों में माइक्रोप्लास्टिक मिला। औसतन हर जीव में 3.42 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। इससे संकेत मिलता है कि इंसानों द्वारा बनाया गया प्लास्टिक अब उन गहराइयों तक पहुंच चुका है, जहां का वातावरण कभी प्रदूषण से लगभग अछूता माना जाता था।
बता दें कि भारतीय महासागर से भी जीवों लिए गए जीवों में माइक्रोप्लास्टिक मिला है। इन पर किए गए अध्ययन का सबसे बड़ा निष्कर्ष चौंकाने वाला है। दरअसल इस महासागर से लिए गए जीवों में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर प्रशांत महासागर की तुलना में शरीर के वजन के हिसाब से 14.7 गुना तक ज्यादा पाया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका से समुद्र में पहुंचने वाला प्लास्टिक का कचरा, औद्योगिक गतिविधियां और समुद्री धाराएं महत्वपूर्ण कारण हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हाइड्रोथर्मल वेंट पृथ्वी के सबसे अनोखे समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों में गिने जाते हैं। यहां रहने वाले जीव अत्यधिक तापमान और दबाव में जीवन जीते हैं। यदि ऐसे संवेदनशील जीवों तक भी माइक्रोप्लास्टिक पहुंच गया है, तो इसका अर्थ है कि प्लास्टिक प्रदूषण का दायरा हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है।
बता दें कि यह अध्ययन सीधे मानव स्वास्थ्य पर नहीं था, लेकिन वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक समुद्री खाद्य श्रृंखला (Marine Food Chain) में नीचे से ऊपर तक पहुंच सकता है। छोटे जीवों को खाने वाली बड़ी मछलियां और अंततः समुद्री भोजन खाने वाले इंसान भी इस श्रृंखला का हिस्सा बन सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस विषय पर अभी और ज्यादा शोध की आवश्यकता है।
गहरे समुद्र में जहां ये घोंघे और मसल्स रहते हैं, वहां सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुंचती। यहां का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) पर नहीं, बल्कि Chemosynthesis पर आधारित होता है। यानी बैक्टीरिया समुद्र के तल से निकलने वाले सल्फाइड और अन्य रसायनों से ऊर्जा बनाते हैं और उसी पर उनका पूरा खाद्य जाल टिका होता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्लास्टिक के सूक्ष्म कण केवल समुद्र की सतह पर नहीं रहते। समुद्री धाराएं, डूबते जैविक कण (Marine Snow) और तलछट (Sediment) उन्हें धीरे-धीरे समुद्र की गहराइयों तक पहुंचा देती हैं।
समुद्र में ऊपर से लगातार मृत प्लवक (Plankton), जैविक अवशेष और धूल जैसे कण नीचे गिरते रहते हैं। इसे Marine Snow कहा जाता है। माइक्रोप्लास्टिक अक्सर इन्हीं कणों से चिपककर गहरे समुद्र तक पहुंच जाता है।
हाइड्रोथर्मल वेंट्स के आसपास रहने वाले कई जीवों की वृद्धि और प्रजनन दर सामान्य समुद्री जीवों की तुलना में धीमी होती है। इसलिए यदि उनका आवास प्रदूषित हो जाए तो उसकी भरपाई में बहुत लंबा समय लग सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक की सतह पर भारी धातुएं (Heavy Metals), जहरीले रसायन और सूक्ष्मजीव भी चिपक सकते हैं। इसलिए चिंता केवल प्लास्टिक कणों की नहीं, बल्कि उनके साथ पहुंचने वाले प्रदूषकों की भी है।
भारतीय महासागर में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर अधिक मिलने का मतलब यह नहीं कि केवल भारत जिम्मेदार है। इस महासागर में कई देशों की नदियां और समुद्री धाराएं मिलती हैं, इसलिए यह पूरे क्षेत्र के लिए एक साझा पर्यावरणीय चुनौती है।
यदि माइक्रोप्लास्टिक हाइड्रोथर्मल वेंट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में लगातार जमा होता रहा, तो इससे उन जीवों के साथ-साथ वहां रहने वाले सूक्ष्मजीव समुदाय भी प्रभावित हो सकते हैं। ये सूक्ष्मजीव समुद्र में पोषक तत्वों के चक्र (Nutrient Cycling) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अब तक माइक्रोप्लास्टिक पर्वतों की बर्फ, वर्षा, मानव रक्त, प्लेसेंटा और समुद्र की सतह पर मिल चुका था। यह अध्ययन बताता है कि पृथ्वी के सबसे गहरे और अलग-थलग समुद्री पारिस्थितिक तंत्र भी इससे नहीं बचे हैं।
भारतीय महासागर में प्रदूषण का स्तर अधिक मिलना भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के लिए गंभीर संकेत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बेहतर कचरा प्रबंधन, नदियों में प्लास्टिक की रोकथाम और एकल-उपयोग प्लास्टिक में कमी समुद्री प्रदूषण घटाने के लिए जरूरी है।
अब शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या माइक्रोप्लास्टिक इन गहरे समुद्री जीवों की वृद्धि, प्रजनन और पूरे हाइड्रोथर्मल वेंट पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। यह भविष्य के समुद्री संरक्षण के लिए अहम सवाल होगा।
गौरतलब है कि यह अध्ययन केवल समुद्री जीवों की कहानी भर नहीं रह गया, बल्कि मानव गतिविधियों के वैश्विक प्रभाव का आईना है। यदि पृथ्वी के सबसे गहरे समुद्री जीव भी माइक्रोप्लास्टिक से अछूते नहीं रहे, तो यह संकेत है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक पारिस्थितिक संकट बन चुका है।
Updated on:
05 Aug 2026 10:31 am
Published on:
05 Aug 2026 10:31 am
