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चुनाव आयोग में ‘मतभेद’ से सियासी भूचाल: विपक्ष के निशाने पर CEC ज्ञानेश कुमार, सुप्रीम कोर्ट से दखल और SIR रोकने की मांग

चुनाव आयोग के भीतर के इस मतभेद को बीजेपी सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया बता रही है, जबकि विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग के काम की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। आइए जानते हैं कि कौन-कौन से दल इस विवाद में कूद पड़े हैं और क्या मांग कर रहे हैं।
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Swatantra Mishra

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Sep 24, 2026

SIR CEC

विपक्ष के नेताओं ने CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की। (Photo: ChatGpt)

देश में चुनाव प्रक्रिया को लेकर पहले से जारी राजनीतिक टकराव के बीच चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद सामने आने की रिपोर्ट ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है। विपक्षी दलों ने अब पूरे चुनाव आयोग को निशाना बनाने के बजाय मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर अपना हमला केंद्रित कर दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, चुनाव आयोग के कामकाज की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने और मतदाता सूचियों के Special Intensive Revision (SIR) को रोकने जैसी मांगें उठाई हैं। कुछ नेताओं ने हाल में हुए कुछ चुनावों को दोबारा कराने तक की मांग की है। ये विपक्षी दलों के आरोप और मांगें हैं; चुनावी गड़बड़ी के उनके व्यापक दावों को स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।

आखिर क्यों खड़ा हुआ नया विवाद?

विवाद के केंद्र में The Indian Expressकी एक खोजी रिपोर्ट है। अखबार के मुताबिक चुनाव आयोग के तीन सदस्यों में से चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के विभिन्न कदमों को लेकर रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज की। इन मुद्दों में नए मतदाताओं के लिए Form 6 में बदलाव, SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने और फिर बहाल करने की प्रक्रिया तथा मतदाता डेटाबेस को केंद्रीकृत करने और उसकी कस्टडी से जुड़े सवाल शामिल बताए गए हैं।

यही वह बिंदु है जिसने विपक्ष के राजनीतिक हमले की दिशा बदल दी है। विपक्ष अब आयोग को एक इकाई के रूप में कटघरे में खड़ा करने के बजाय यह तर्क दे रहा है कि यदि दो चुनाव आयुक्त महत्वपूर्ण फैसलों पर असहमति या आपत्ति दर्ज करा रहे थे, तो उन आपत्तियों और फैसले लेने की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि आयोग के सदस्यों के बीच अलग-अलग राय सामने आना इस बात का संकेत भी हो सकता है कि संस्था के भीतर विचार-विमर्श की लोकतांत्रिक प्रक्रिया मौजूद है।

विपक्ष की तीन बड़ी मांगें

इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष की ओर से मुख्य रूप से तीन मांगें सामने आई हैं- CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए, चुनाव आयोग के कामकाज की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच हो और SIR की प्रक्रिया को रोका जाए। कांग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल हटाने और शीर्ष अदालत की निगरानी में जांच की मांग की। वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने हाल के वर्षों में चुनाव आयोग द्वारा लिए गए फैसलों की संसदीय समिति से समीक्षा कराने की बात कही है।

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से मामले का स्वतः संज्ञान लेने की मांग की। वहीं तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी ने भी CEC को हटाने और कोर्ट की निगरानी में जांच कराने की मांग उठाई। DMK नेता एम के स्टालिन ने SIR रोकने के साथ आयोग के भीतर सामने आए पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग की है।

राहुल गांधी के पुराने आरोपों को मिला नया राजनीतिक संदर्भ

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले काफी समय से चुनाव प्रक्रिया को लेकर ‘वोट चोरी’ और चुनाव आयोग की भूमिका से जुड़े आरोप लगाते रहे हैं। ताजा रिपोर्ट के बाद उन्होंने फिर इन आरोपों को दोहराया है। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक विपक्ष के कई नेताओं ने बुधवार को आपस में संपर्क कर आगे की रणनीति पर चर्चा भी की।

यह विवाद अचानक शुरू नहीं हुआ है। जून 2026 में 23 विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर चुनाव प्रक्रिया और आयोग के आचरण को लेकर अपनी चिंताएं जताई थीं। इससे पहले मार्च में राज्यसभा के 63 और लोकसभा के 130 सदस्यों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव दिया था, जिसे दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने 6 अप्रैल को खारिज कर दिया था। 24 अप्रैल को विपक्ष ने राज्यसभा में फिर नोटिस दिया, जो रिपोर्ट के अनुसार अभी लंबित है।

कुछ नेताओं ने उठाई दोबारा चुनाव की मांग

विवाद केवल CEC को हटाने और जांच की मांग तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में SIR से पहले वाली मतदाता सूची के आधार पर नए विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनावों को लेकर सवाल उठाते हुए दोबारा चुनाव की मांग की। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने भी कई राज्यों के पिछले चुनाव रद्द कर फिर चुनाव कराने की मांग रखी। ये मांगें संबंधित नेताओं के राजनीतिक दावों पर आधारित हैं और चुनाव परिणामों की वैधानिक स्थिति में अपने-आप कोई बदलाव नहीं करतीं।

ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे जैसे कुछ नेताओं ने इससे आगे बढ़कर CEC की गिरफ्तारी की भी मांग की है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि आयोग के फैसले बहुमत की सहमति के बिना लिए गए तो उनकी वैधता की समीक्षा होनी चाहिए।

अब नजर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग पर

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राजनीतिक बहस अब चुनाव आयोग की संस्थागत निर्णय प्रक्रिया पर केंद्रित हो गई है। विपक्ष का तर्क है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों की प्रकृति और उन पर हुई कार्रवाई सार्वजनिक जांच का विषय होनी चाहिए। वहीं भाजपा ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए आंतरिक मतभेद को संस्था के लोकतांत्रिक ढंग से काम करने का प्रमाण बताया है।

अब दो स्तरों पर घटनाक्रम महत्वपूर्ण होगा। पहला, चुनाव आयोग अपने भीतर दर्ज इन कथित आपत्तियों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर क्या स्पष्टीकरण देता है। दूसरा, SIR से जुड़े मामले पहले से न्यायिक जांच के दायरे में होने के कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने इन नए तथ्यों को किस तरह उठाया जाता है और अदालत उनका क्या संज्ञान लेती है।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चुनाव आयोग को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई ने नया रूप ले लिया है। बहस अब केवल मतदाता सूची या SIR के किसी एक फैसले तक सीमित नहीं रही, बल्कि आयोग के भीतर फैसले किस तरह लिए गए और तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में असहमति को किस तरह संभाला गया- यह भी केंद्रीय सवाल बन गया है। आने वाले दिनों में विपक्ष की प्रस्तावित राजनीतिक लामबंदी, चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और न्यायिक कार्यवाही इस विवाद की अगली दिशा तय करेंगे।