
सांकेतिक इमेज (सोर्स-chatgpt)
शिक्षा मंत्रालय ने भारत की समृद्ध भाषाई और साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने तथा उसे आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन के लिए पांच ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (उत्कृष्टता केंद्र) स्थापित करने को मंजूरी दे दी है। शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की भाषा प्रभाग द्वारा 1 अक्टूबर 2026 को यह मंजूरी दी है। शनिवार यानि 3 अक्टूबर 2026 को आधिकारिक जानकारी साझा करते हुए मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ये केंद्र शास्त्रीय असमिया, शास्त्रीय बंगाली, शास्त्रीय मराठी, शास्त्रीय पाली और शास्त्रीय प्राकृत भाषाओं पर उच्च-स्तरीय शैक्षणिक शोध, संरक्षण, डिजिटलीकरण और ज्ञान के व्यापक प्रसार पर केंद्रित होंगे।
ये 5 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस देश के अलग-अलग उच्च शिक्षण संस्थानों में स्थापित किए जाएंगे। शास्त्रीय असमिया के लिए असम स्थित तेजपुर विश्वविद्यालय, शास्त्रीय बंगाली के लिए पश्चिम बंगाल का विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शास्त्रीय मराठी के लिए महाराष्ट्र के पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी), शास्त्रीय पाली के लिए ओडिशा का सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ ओडिशा तथा शास्त्रीय प्राकृत के लिए गुजरात का सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात चुने गए हैं। इन केंद्रों की स्थापना से संबंधित राज्यों में उच्च शिक्षा, शोध और स्कॉलरशिप का क्षेत्रीय इकोसिस्टम मजबूत होगा।
शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन केंद्रों का मुख्य उद्देश्य शैक्षणिक शोध और स्कॉलरशिप को मजबूत करना, भाषाई-साहित्यिक विरासत का संरक्षण एवं डिजिटाइजेशन, शास्त्रीय भाषाओं की विरासत का व्यापक प्रसार तथा क्षेत्रीय शैक्षणिक तंत्र को सुदृढ़ बनाना है। ये सेंटर संबंधित शास्त्रीय भाषाओं में एडवांस्ड रिसर्च, स्कॉलरली कार्यों और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए समर्पित संस्थागत प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएंगे। साथ ही, भाषाई और साहित्यिक संसाधनों के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और डिजिटलीकरण में मदद करेंगे। इसके जरिए भारत की समृद्ध लिखित विरासत लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी। इनके माध्यम से भाषाई, साहित्यिक और ज्ञान परंपराओं तक पहुंच आसान बनेगी तथा उनका प्रसार व्यापक स्तर पर हो सकेगा। गौरतलब है कि असमिया, बंगाली, मराठी, पाली और प्राकृत को अक्टूबर 2024 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इन 5 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने को 3 अक्टूबर 2024 को मंजूरी दी थी, जिसके बाद 4 अक्टूबर 2024 को राजपत्र अधिसूचना जारी हुई। इससे पहले भारत में तमिल (2004), संस्कृत (2005), तेलुगु और कन्नड़ (2008), मलयालम (2013) तथा ओडिया (2014) को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त था। अब कुल 11 भाषाएं इस श्रेणी में शामिल हैं। शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के लगभग दो साल बाद इन पांच भाषाओं के लिए समर्पित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना से संस्थागत सहयोग मजबूत होगा।
सरकार के इस फैसले का राज्यों ने स्वागत किया है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह ओडिशा के लिए गर्व का क्षण है और भारत की समृद्ध भाषाई विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ ओडिशा में शास्त्रीय पाली के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस पाली भाषा के अध्ययन, संरक्षण और संवर्धन को मजबूत करेगा, जो भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी इसे हर असमिया के लिए गर्व का क्षण बताया और कहा कि असमिया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने के बाद राज्य सरकार लगातार समर्पित केंद्र की मांग कर रही थी। उन्होंने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह केंद्र असमिया भाषाई और साहित्यिक विरासत के शोध, डिजिटलीकरण, संरक्षण और प्रसार को मजबूत करेगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी डेक्कन कॉलेज में शास्त्रीय मराठी केंद्र की मंजूरी का स्वागत किया।
तेजपुर विश्वविद्यालय में पहले से ही असमिया अध्ययन केंद्र सक्रिय है, जिसने हजारों पुरानी पांडुलिपियों और दुर्लभ ग्रंथों का डिजिटलीकरण किया है। नए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस से इस कार्य को और गति मिलेगी। विश्व-भारती विश्वविद्यालय रवींद्रनाथ टैगोर की विरासत से जुड़ा है, जहां बंगाली भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन होता रहा है। डेक्कन कॉलेज पुणे भाषाविज्ञान और प्राच्य अध्ययन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्थान है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ ओडिशा और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात भी संबंधित भाषाओं के अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं।
शिक्षा मंत्रालय ने जोर दिया है कि ये केंद्र भारत की शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन, अनुसंधान और संरक्षण के लिए संस्थागत इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इनसे न केवल शोधकर्ताओं और छात्रों को नई सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि आम लोगों तक भी इन भाषाओं की समृद्ध विरासत पहुंच सकेगी।
डिजिटलीकरण के माध्यम से प्राचीन पांडुलिपियां, ग्रंथ और साहित्यिक सामग्री सुरक्षित रहेंगी तथा ऑनलाइन उपलब्ध कराई जा सकेंगी। क्षेत्रीय स्तर पर उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा मिलने से युवा पीढ़ी इन शास्त्रीय भाषाओं से जुड़ सकेगी। शिक्षा मंत्रालय का यह फैसला भारत की बहुभाषी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने और उसे आधुनिक शैक्षणिक ढांचे से जोड़ने का सराहनीय प्रयास है।
Updated on:
03 Oct 2026 07:38 pm
Published on:
03 Oct 2026 07:38 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
