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तेजी से गर्म हो रही धरती! 10 वर्षों में लगभग दोगुनी हुई ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार, वैज्ञानिकों की चेतावनी

नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया कि पृथ्वी का तापमान अब प्रति दशक लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों ने 98 प्रतिशत से अधिक सांख्यिकीय विश्वसनीयता के साथ ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में तेजी की पुष्टि की है।
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Avaneesh Kumar Mishra

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Updated: 2 Nov 2026, 4:25 PM IST

पेरिस समझौते के लक्ष्य पर बढ़ सकती है चुनौती, PC- Chatgpt

जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी है। नए अध्ययन के अनुसार, पिछले एक दशक में पृथ्वी के गर्म होने की रफ्तार में उल्लेखनीय तेजी आई है। जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (पीआईके) के वैज्ञानिकों ने पाया है कि वैश्विक तापमान अब लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। वर्ष 1970 से 2015 के बीच यह दर औसतन 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक से थोड़ी कम थी। वैज्ञानिकों के अनुसार, तापमान बढ़ने की मौजूदा रफ्तार 1880 में आधुनिक रिकॉर्ड शुरू होने के बाद किसी भी पिछले दशक से अधिक है। यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका 'जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स' में 6 मार्च 2026 को प्रकाशित हुआ था।

2015 के बाद ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में तेज बढ़ोतरी

शोधकर्ताओं ने पाया कि वर्ष 2015 के आसपास से वैश्विक तापमान बढ़ने की गति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। अध्ययन के अनुसार, पिछले कई दशकों में पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा था, लेकिन हाल के वर्षों में यह वृद्धि पहले की तुलना में काफी तेज हो गई है। अमेरिकी सांख्यिकी विशेषज्ञ और अध्ययन के सहलेखक ग्रांट फोस्टर के अनुसार, शोध से अब यह स्पष्ट होता है कि 2015 के आसपास से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण तेजी आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष केवल तापमान बढ़ना नहीं, बल्कि उसके बढ़ने की गति का पहले की तुलना में अधिक होना है।

प्राकृतिक बदलावों को अलग करके की गई जांच

वैश्विक तापमान में बदलाव का आकलन करना जटिल प्रक्रिया है। अल नीनो, ज्वालामुखी विस्फोट और सूर्य की गतिविधियों में बदलाव जैसे प्राकृतिक कारक कुछ समय के लिए तापमान को प्रभावित कर सकते हैं। अल नीनो के दौरान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर से वायुमंडल में गर्मी का स्थानांतरण बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक तापमान अस्थायी रूप से ऊपर जाता है। इसके विपरीत, बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों से वायुमंडल में पहुंचने वाले कण सूर्य की कुछ ऊर्जा को परावर्तित करके पृथ्वी को अस्थायी रूप से ठंडा कर सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इन प्राकृतिक प्रभावों का अनुमान लगाकर तापमान संबंधी आंकड़ों में समायोजन किया, ताकि दीर्घकालिक गर्मी बढ़ने की वास्तविक प्रवृत्ति को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

पांच प्रमुख वैश्विक तापमान रिकॉर्ड का किया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने वैश्विक तापमान से जुड़े पांच प्रमुख आंकड़ा समूहों का विश्लेषण किया। इनमें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा, राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए), हैडक्रट, बर्कले अर्थ और ईआरए5 के तापमान रिकॉर्ड शामिल थे। इन आंकड़ों में पृथ्वी के तापमान से जुड़े दीर्घकालिक अवलोकन और विभिन्न वैज्ञानिक विश्लेषण शामिल हैं। अध्ययन में सभी पांच आंकड़ा समूहों से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार बढ़ने के प्रमाण मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, अलग-अलग आंकड़ों और विश्लेषण विधियों का इस्तेमाल करने के बावजूद निष्कर्षों में उल्लेखनीय समानता देखी गई।

98 प्रतिशत से अधिक विश्वसनीयता के साथ सामने आए परिणाम

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ताओं में शामिल स्टीफन राह्मस्टॉर्फ ने बताया कि प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का प्रभाव हटाने के बाद तापमान बढ़ने की रफ्तार में तेजी के प्रमाण अधिक स्पष्ट हो गए। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस बदलाव के पक्ष में 98 प्रतिशत से अधिक सांख्यिकीय विश्वसनीयता मिली। इसका अर्थ है कि सामान्य प्राकृतिक उतार-चढ़ाव की तुलना में तापमान वृद्धि की रफ्तार में बदलाव के लिए मजबूत सांख्यिकीय प्रमाण मौजूद हैं। हालांकि, इस निष्कर्ष को भविष्य के तापमान का निश्चित पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता।

2023 और 2024 सबसे गर्म वर्षों में बरकरार

वैज्ञानिकों ने यह भी जांचा कि वर्ष 2023 और 2024 में दर्ज असाधारण गर्मी कहीं हालिया तापमान वृद्धि को वास्तविकता से अधिक तो नहीं दिखा रही थी। इन वर्षों के तापमान पर अल नीनो और सूर्य की बढ़ी हुई गतिविधियों का भी कुछ प्रभाव था।

इन प्राकृतिक प्रभावों को हटाने के बाद दोनों वर्षों के समायोजित तापमान में मामूली कमी आई। इसके बावजूद 2023 और 2024 अध्ययन में शामिल रिकॉर्ड के दो सबसे गर्म वर्ष बने रहे। शोध में यह भी सामने आया कि तापमान बढ़ने की रफ्तार में बदलाव के संकेत 2013 और 2014 के आसपास ही दिखाई देने लगे थे।

दो अलग-अलग सांख्यिकीय तकनीकों से की पुष्टि

वैज्ञानिकों ने तापमान वृद्धि में तेजी की जांच के लिए दो प्रमुख सांख्यिकीय तकनीकों का इस्तेमाल किया। पहली तकनीक क्वाड्रेटिक ट्रेंड एनालिसिस थी, जिसके माध्यम से यह जांचा गया कि तापमान वृद्धि का ग्राफ स्थिर गति से बढ़ रहा है या उसमें तेजी आ रही है। दूसरी तकनीक पीसवाइज लीनियर मॉडल थी। इसके जरिए अलग-अलग समयावधियों में तापमान बढ़ने की दर की तुलना की गई।

दोनों तरीकों से तापमान बढ़ने की गति में महत्वपूर्ण तेजी के प्रमाण मिले। हालांकि, अध्ययन का उद्देश्य इस तेजी के सभी भौतिक कारणों की पहचान करना नहीं था। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि तापमान वृद्धि की रफ्तार में बदलाव का पता लगाना और उसके सटीक कारण निर्धारित करना दो अलग वैज्ञानिक प्रश्न हैं।

पेरिस समझौते के लक्ष्य पर बढ़ सकती है चुनौती

अध्ययन के अनुसार, यदि पिछले एक दशक जैसी तापमान वृद्धि की रफ्तार जारी रहती है, तो पृथ्वी वर्ष 2030 से पहले ही पेरिस जलवायु समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस की दीर्घकालिक सीमा पार कर सकती है। हालांकि, यह एक सशर्त वैज्ञानिक अनुमान है, निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

पेरिस समझौते का लक्ष्य औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में पृथ्वी कितनी तेजी से गर्म होगी, यह जीवाश्म ईंधनों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने की गति पर भी निर्भर करेगा।